राजेश्वरी धाम में दुर्गा अष्टमी पर किया विशाल भजन संध्या का आयोजन जालंधर : राजेश्वरी धाम देवी राज रानी वैष्णो मन्दिर बस्ती नौ (बस्ती शेख रोड) जालंधर के दरबार में दुर्गा अष्टमी पर मां अम्बे जी की विशाल भजन संध्या आयोजित की गई। भजन संध्या के पूर्व मां भगवती की पुजा अर्चना की गई। भजन संध्या करने के लिए पहुंची भजन मंडलीया पंकज ठाकुर एंड पार्टी,पवन पुजारी एंड पार्टी और दीपक सरगम एंड पार्टी ने पहुंच कर मां का गुणगान किया भजन संध्या का प्रारंभ दीपक सरगम द्वारा गणेश वंदना गा कर किया गया। इस भजन संध्या में पूर्व सिनियर डिप्टी मेयर कमलजीत सिंह भाटिया तथा अन्य भक्तजनों के इलावा बाला जी के परम भक्त जालंधर सेंट्रल से विधायक रमन अरोड़ा ने विशेष रुप से पहुंच कर माता जी का आशीर्वाद प्राप्त किया तथा अपने गाए भजनों से संगत को झूमने पर विवश कर दिया। मन्दिर कमेटी के प्रधान कैलाश बब्बर तथा उनके सदस्यों द्वारा आए हुए अतिथियों को देवी राज रानी से मां की चुनरी तथा स्मृति चिन्ह दिलवा कर सम्मानित किया गया। उन्होंने बताया कि हर महीने दुर्गा अष्टमी को मन्दिर में लंगर का आयोजन किया जाता है।देवी राज रानी जी द्वारा अपने प्रवचनों द्वारा संगत को आशीर्वाद स्वरुपी प्रशाद बांटा गया। उन्होंने दुर्गाष्टमी की बधाइयां देते हुए कहा कि जो भक्त सच्चे मन से निस्वार्थ भाव से माता दुर्गा शक्ति की अराधना करता है मां उसका कभी अहित नहीं होने देती तथा मां के चरणों से जुड़ा भक्त संसार रुपी भवसागर से पार हो जाता है। इस अवसर पर राजेश्वरी धाम वेलफेयर ट्रस्ट के प्रधान कैलाश बब्बर व सदस्य विजय दुआ, एस एम नय्यर, सुरेंद्र अरोड़ा, रामकृष्ण नानू, ज्योति बब्बर, अमन बत्रा, जतिन बब्बर, युद्राज सिंह, राजीव सहदेव, सतीश बब्बर, मनमोहन अरोड़ा, जतिन मिंटू, टिम्मी अरोड़ा, किशन अरोड़ा, पंकज अरोड़ा, विजय बेगोवाल, लकी कपूरथला, पवन नागपाल एवं अन्य सदस्य उपस्थित थे। दुर्गा अष्टमी पर राजेश्वरी धाम वेल्फेस ट्रस्ट की ओर से विशाल भंडारे तथा छबील का आयोजन भी किया गया।
कैसे श्रीकृष्ण ने तोड़ा इंद्र का अभिमान? How Shri Krishna broke Indra’s pride?
गांव के सभी लोग किसी कार्यक्रम के लिए तैयार हो रहे थे। शायद कोई पूजा होने वाली थी। भगवान कृष्ण ने जाकर नंद बाबा से पूछा कि गांव के लोग कौन से समारोह की तैयारी कर रहे हैं। नंद बाबा ने श्रीकृष्ण को बताया, “हम लोग हर साल वर्षा के देवता भगवान इंद्र की पूजा करते हैं। पशु ही हमारे धन हैं और उनके भोजन के लिए हमें ताजी घास की आवश्यकता होती है। वह घास वर्षा होने पर ही पहाड़ों पर उगती है। सही समय पर वर्षा हो, इसलिए हम भगवान इंद्र की पूजा करते हैं। वे हमारी पूजा से प्रसन्न होकर सही समय पर वर्षा करते हैं, जिससे चारों ओर हरियाली फैल जाती है।” भगवान कृष्ण अपने पिता नंद बाबा की बात सुनकर संतुष्ट नहीं हुए। वे बोले, “पिता जी, वर्षा होना तो एक प्राकृतिक घटना है। इसमें इंद्र देवता का क्या श्रेय हो सकता है? यह गोवर्धन पर्वत अपनी हरी घास से हमारी गौओं का पेट भरता है। हमें तो इंद्र देवता के बजाय गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा करनी चाहिए?” भगवान कृष्ण की बातें सुनकर सभी लोग आश्चर्य चकित रह गए। वे काफी देर तक इस बारे में वाद-विवाद करते रहे। लेकिन कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सका। अंततः श्रीकृष्ण ने गांव वालों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि उन्हें भगवान इंद्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “मीठे और नमकीन-कई तरह के व्यंजन तैयार करो। भोग के लिए सारा दूध एकत्र कर लो। वेद-पाठ करने में निपुण पंडितों को बुलावा भेजा जाए। गरीबों को भोजन करवाने का प्रबंध किया जाए। गौओं को उनका पेट भरने तक हरी घास का चारा दिया जाए।” भगवान कृष्ण के कथनानुसार गांव वालों ने वैसा ही किया। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को प्रसाद चढ़ाया और माथा टेका। उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि गोवर्धन पर्वत ने बड़ी मात्रा में चढ़ाए गए भोग को स्वीकार कर लिया। दरअसल, यह चमत्कार भगवान कृष्ण का था, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत की विशाल आत्मा का रूप लेकर भोग का प्रसाद ग्रहण किया था। उधर स्वर्ग में जब भगवान इंद्र ने यह सब देखा, तो उनके गुस्से की सीमा न रही। उन्होंने बादलों के एक झुंड से कहा, “देखो, अब ग्वालों की जाति मुझे अनदेखा कर रही है। उन्होंने आज गोवर्धन पर्वत को प्रसाद चढ़ाया है।” भगवान इंद्र क्रोध और द्वेष के मारे बौखला गए। वे भगवान कृष्ण के दिव्य रूप को भूल गए और निश्चय किया कि वे गांव वालों का नाश करने के लिए एक तूफान भेजेंगे। उन्होंने बादलों को आदेश दिया, “जाओ, गोवर्धन पर्वत पर घनघोर वर्षा करके ग्वालों की जाति का नाश कर दो। मैं तुम्हारे पीछे आ रहा हूं।” भगवान इंद्र के आदेशानुसार गोवर्धन पर्वत पर मूसलाधार वर्षा होने लगी। वर्षा के साथ-साथ बादल गरज रहे थे और बिजली कड़क रही थी। तेज हवा पेड़ों को उखाड़ने लगी। गाय भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं। गांव वाले भी डर के मारे अपने घरों की ओर भागे। दोपहर का समय था, लेकिन तूफान के कारण चारों ओर अंधेरा-सा छा गया था। सूरज कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। गांव वालों ने भगवान कृष्ण से विनती की, “भगवान इंद्र कुपित हो गए हैं। हमने तो वही किया, जो आपने कहा था। अब कृपा करके इस घनघोर वर्षा से हमारी रक्षा करें।” भगवान कृष्ण ने गांव वालों को दिलासा दिया, “हमने गोवर्धन पर्वत की पूजा की है। यही हमारा रक्षक है। अब यही हमारी रक्षा करेगा।” इतना कहकर भगवान कृष्ण पहाड़ की तलहटी में चले गए। उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि वे लोग अपने पशुओं को लेकर पहाड़ की ओट में आ जाएं। जब सभी लोग अपने पशुओं सहित गोवर्धन पर्वत के निकट खड़े हो गए, तो अचानक भगवान कृष्ण ने एक करिश्मा किया। उन्होंने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर छतरी की तरह सबके ऊपर तान दिया। पूरे सात दिनों तक लगातार वर्षा होती रही और भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत को उठाए खड़े रहे। भगवान इंद्र श्रीकृष्ण की शक्ति देखकर हैरान हो गए और उन्होंने बादलों को वापस आने का आदेश दे दिया। जब वर्षा रुक गई, तो सभी लोग वहां से निकलकर अपने घरों की ओर चल दिए। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उसके मूल स्थान पर रख दिया। यह देखकर भगवान इंद्र आश्चर्य चकित हो गए। वे इस बात का यकीन नहीं कर सके कि कोई बालक ऐसा करिश्मा कर सकता है। तभी भगवान इंद्र को एहसास हुआ कि भगवान विष्णु ने ही भगवान कृष्ण के रूप में धरती पर जन्म लिया है। उन्होंने सोचा, ‘मैं भी कितना मूर्ख था। भगवान कृष्ण तो दैवीय शक्तियों से भरपूर हैं। मैंने अपने क्रोध और द्वेष के कारण महाप्रभु को चुनौती दे दी।’ तत्पश्चात भगवान इंद्र धरती पर आए और भगवान कृष्ण के आगे हाथ जोड़कर अपने किए की माफी मांगने लगे। उन्होंने प्रभु का स्तुति गान किया, जिससे वे प्रसन्न हो गए। दयालु भगवान कृष्ण ने उन्हें स्नेह से अपने गले लगा लिया। इस तरह भगवान कृष्ण ने भगवान इंद्र का अहंकार तोड़ दिया तथा उन्हें विनम्रता और दयालुता का पाठ पढ़ाया। भगवान इंद्र भगवान कृष्ण को नहीं पहचान पाए। उन्होंने वर्षा और तूफान के साथ उनका अपमान करना चाहा। लेकिन भगवान कृष्ण ने गांव वालों की रक्षा करके यह दिखा दिया कि वे अपनीछोटी उंगली पर संपूर्ण ब्रह्माण्ड को संभाल सकते हैं। तभी से भगवान कृष्ण ‘गिरधारी’ के नाम से भी जाने जाते हैं। यही नहीं, वे ‘गिरधर’ और ‘गोवर्धनधारी’ भी कहलाते हैं, क्योंकि उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। उस दिन गांव वालों को यह शिक्षा मिली कि उन्हें डर के मारे किसी भी देवी-देवता की पूजा नहीं करनी चाहिए। पूजा का संबंध प्रेम से होता है। भक्ति और आस्था के साथ किया गया पूजन ही सफल होता है। आडंबर से की जाने वाली पूजा सफल नहीं मानी जाती। प्रेम, त्याग और समर्पण द्वारा की गई पूजा को ही प्रभु ग्रहण करते हैं।तभी से गांव वाले हर वर्ष गोवर्धन पर्वत की उसी तरह पूजा करने लगे, जिस तरह भगवान कृष्ण ने उन्हें सिखाया था। लेकिन भगवान इंद्र ने फिर कभी गांव वालों को अपना रौद्र रूप नहीं दिखाया। अब गांव वालों के लिए
इस दिन गणेश जी की पूजा करने से मिलेंगे ये लाभ || Worshiping ganesha on this day will give these benefits
पार्वती जी के स्नेही पुत्र एवं सभी देवताओं में प्रथम आराध्य भगवान गणपति की पूजा के लिए बुधवार का दिन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वे रिद्धि-सिद्धि के दाता हैं और उनकी आराधना से हर कार्य बिना विघ्न के पूर्ण हो जाता है। मान्यता है कि बुधवार के दिन श्री गणेश जी की विधि-विधान से पूजा अर्चना करने पर शुभ फल की प्राप्ति होती है और सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने से पूर्व भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा भी चली आ रही है। गणपति जी खुशी के देवता भी कहे जाते हैं। उनका प्रिय भोग मोदक है। हाथी के मस्तक वाले भगवान गणेश जी का वाहन चूहा है। उनकी दो पत्नियां रिद्धि एवं सिद्धि हैं। ये भी मान्यता है कि श्री गणेश का सच्चे मन से स्मरण करने से ही जीवन से जुड़ी सभी बाधाओं का नाश होने लगता है। गणपति जी की उपासना मात्र से ही उनके प्रसन्न होने पर रिद्धि-सिद्धि, सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होने लगती है। गणपति पूजन के ये हैं 5 बड़े लाभ – – रिद्धि-सिद्धि के दाता की साधना करने पर करियर-कारोबार में फायदा मिलता है. व्यापार में भी लाभ पहुंचता है. – गणपति जी की प्रतिदिन साधना करने से जीवन के दु:ख और दरिद्रता दूर होने लगती है. – लंबोदर की पूजा करने से माता लक्ष्मी की भी कृपा प्राप्त होने लगती है. प्रथम आराध्य के आशीर्वाद से धन का सदुपयोग होने लगता है. – गजानन की सच्चे मन से साधना करने पर उनके दिव्य दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त होता है. – बुधवार के दिन गणपति आराधना से मन की इच्छा शीघ्र पूरी हो जाती है.
गणेश चतुर्थी की कहानी || Story of ganesh chaturthi
एक बार की बात है सभी देवता बहुत ही मुश्किल में थे। इसलिए सभी देव गण शिवजी के शरण में अपनी मुश्किलों के हल के लिए पहुंचे। उस समय भगवान शिवजी के साथ गणेश और कार्तिकेय भी वहीँ बैठे थे तो देवताओं की मुश्किल को देखकर शिवजी नें गणेश और कार्तिकेय से प्रश्न पुछा – तुममें से कौन देवताओं की मुश्किलों को हल करेगा और उनकी मदद करेगा। जब दोनों भाई मदद करने के लिए तैयार हो गए तो शिवजी नें उनके सामने एक प्रतियोगिता रखी। इस प्रतियोगिता के अनुसार दोनों भाइयों में जो भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा वही देवताओं की मुश्किलों में मदद करेगा। जैसे ही शिवजी नें यह बात कही – कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर बैठ कर पृथ्वी की परिक्रमा करने चले गए। परन्तु गणेश जी वही अपनी जगह पर खड़े रहे और सोचने लगे की वह मूषक की मदद से पुरे पृथ्वी का चक्कर कैसे लगा सकते हैं? उसी समय उनके मन में एक उपाय आया। वे अपने पिता शिवजी और माता पारवती के पास गए और उनकी सात बार परिक्रमा करके वापस अपनी जगह पर आकर खड़े हो गए। कुछ समय बाद कार्तिकेय पृथ्वी का पूरा चक्कर लगा कर वापस पहुंचे और स्वयं को विजेता कहने लगे। तभी शिवजी नें गणेश जी की ओर देखा और उनसे प्रश्न किया – क्यों गणेश तुम क्यों पृथ्वी की परिक्रमा करने नहीं गए? तभी गणेश जी ने उत्तर दिया – “माता पिता में ही तो पूरा संसार बसा है?” चाहे में पृथ्वी की परिक्रमा करूँ या अपने माता पिता की एक ही बात है। यह सुन कर शिवजी बहुत खुश हुए और उन्होंने गणेश जी को सभी देवताओं के मुश्किलों को दूर करने की आज्ञा दी। साथ ही शिवजी नें गणेश जी को यह भी आशीर्वाद दिया कि कृष्ण पक्ष के चतुर्थी में जो भी व्यक्ति तुम्हारी पूजा और व्रत करेगा उसके सभी दुःख दूर होंगे और भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी।
हनुमान जी की पूजा मंगलवार को ही क्यों होती है? Why is Hanuman ji worshiped only on Tuesday?
भक्तों के लिए अपने भगवान को याद करने और उनकी आराधना करने के लिए वैसे तो हर दिन ही समान होता है, लेकिन हफ्ते के सातों दिन किसी न किसी भगवान को समर्पित किए गए हैं ।मंगलवार (Tuesday) का दिन भगवान राम के परमभक्त और पवन पुत्र बजरंगबली (BajrangBali) का दिन माना जाता है। इस दिन हनुमान जी की पूजा करने से मनोकामना पूर्ण होती है और उत्तम फल की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि बजरंगबली की जो भी भक्त मंगलवार को उपासना करता है तो उसके हनुमानजी सारे कष्ट हर लेते हैं। कई बार दिमाग में यह सवाल आता है कि आखिर मंगलवार ही क्यों हनुमान जी का दिन विशेष है और इसी दिन क्यों उनकी पूजा होती है. अगर आपके मन में भी कभी ये सवाल आया है तो जानें कि आखिर ऐसा क्यों होता है – स्कंद पुराण के अनुसार मंगलवार के दिन ही हनुमानजी का जन्म हुआ था। इसी वजह से यह दिन उनकी पूजा के लिए समर्पित कर दिया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कठोर नियमपूर्वक बजरंगबली की पूजा करने से वे जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की समस्त मनोकामना को पूर्ण कर देते है। इतना ही नहीं भक्तों पर आने वाले संकटों को भी हनुमानजी हर लेते हैं। इस वजह से हनुमानजी का एक नाम संकटमोचन भी पड़ा। हनुमानजी को मंगल ग्रह का नियंत्रक माना जाता है, इस वजह से भी मंगलवार को हनुमानजी की पूजा करने का विधान है। इस दिन भक्तों द्वारा हनुमान चालीसा का पाठ और सुंदरकांड का पाठ करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है।
शिव और सती की कहानी || Story of shiv and sati in hindi
ब्रह्मा के बेटे दक्ष की सती नाम की बेटी थी जो शिवजी से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी। दक्ष अपने आप को शिव से बड़ा मानते थे, इसीलिए उन्होंने सती की बात नहीं मानी। शिव और सती ने दक्ष की इच्छा के बिना ही विवाह कर लिया। एक दिन एक समारोह ने शिव ने दक्ष के सामने खड़े होकर उन्हें प्रणाम नहीं किया। दक्ष ने बहुत अपमान महसूस किया। उन्होंने बदला लेने की ठान ली। दक्ष ने एक यज्ञ कराया और उसने शिव को छोड़कर सारे देवताओं को आमंत्रित किया। सती को बहुत बुरा लगा। वह अपने पिता से मिलने पहुंच गई। दक्ष ने सबके सामने शिव का अपमान किया। सती यह नहीं सह पाई और उसने यज्ञ की आहुति में कूदकर अपनी जान दे दी। क्रोधित होकर शिव ने समूचे ब्रह्मांड को नष्ट करने के लिए विनाशकारी नृत्य तांडव शुरू कर दिया। ब्रह्मा ने प्रकट होकर शिव से क्षमा मांगी। शिव मान तो गए लेकिन उन्होंने दक्ष को शाप दे दिया कि उनका सिर हमेशा बकरी का रहेगा। बाद में सती ने पार्वती के रूप में फिर से जन्म लिया।
भगवान कार्तिकेय की कहानी || Story of lord karthikeya in hindi
एक बार की बात है तारकासुर नाम के एक असुर ने बड़ी कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वरदान दिया कि उसे सिर्फ शिव जी का पुत्र ही मार पाएगा।इस शक्तिशाली वरदान को पाकर तारकासुर बहुत घमंडी हो गया। और उसने स्वर्ग लोक और पृथ्वी लोक पर उपद्रव मचाना शुरू कर दिया। उसके उत्पाद से देवता परेशान हो गए। उन्हें शिवजी से तारकासुर को रोकने का अनुरोध किया उस समय तक शिवजी को कोई पुत्र नहीं था। पुत्र बनाने के लिए शिव ने छह चेहरे बनाए। हर चेहरे पर एक तीसरा नेत्र भी था। इन आंखों से चिंगारियां निकली और उनसे 6 बच्चे बन गए। शिव की पत्नी पार्वती बहुत प्रसन्न हुई और सभी बच्चों को गोद में लेकर गले से लगाने लगी। उन्होंने इन बच्चों को इतने जोर से गले लगाया कि 6 बच्चे मिलकर 6 सिर वाले 1 बच्चे में बदल गए। इस बच्चे का नाम कार्तिकेय रखा गया। इस प्रकार शिवपुत्र कार्तिकेय ने देवताओं की सेना लेकर तारकासुर से लड़ाई लड़ी और उसे मार डाला। तभी से कार्तिकेय को युद्ध का देवता कहा जाने लगा।
अपनी मेहर कर || Apni mehar kar
अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, सभे जीअ समाल सभे जीअ समाल, सभे जीअ समाल अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर अन्न पाणी मुच उपाय, मुच उपाय अन्न पाणी मुच उपाय, मुच उपाय दुख दालद भन्न तर, दुख दालद भन्न तर दुख दालद भन्न तर, दुख दालद भन्न तर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, अपनी मेहर कर सभे जीअ समाल, आपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर अरदास सुणी दातार, सुणी दातार हाहाहा.. अरदास.. सुणी दातार अरदास सुणी दातार.. सुणी दातार अरदास सुणी दातार, सुणी दातार अरदास सुणी दातार, सुणी दातार होई सिसट ठर, होई सिसट ठर होई सिसट ठर, होई सिसट ठर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, अपनी मेहर कर सभे जीअ समाल, आपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर लेवहु कंठ लगाय, कंठ लगाय लेवहु कंठ लगाय, कंठ लगाय अपदा सभ हर, अपदा सभ हर अपदा सभ हर, अपदा सभ हर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, अपनी मेहर कर सभे जीअ समाल, आपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर नानक नाम धियाए, नाम धियाए नानक नाम.. नानक नाम धियाए नानक नाम.. नानक नाम.. नानक नाम धियाए नानक नाम धियाए, नाम धियाए प्रभ का सफल घर, प्रभ का सफल घर प्रभ का सफल घर, प्रभ का सफल घर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, अपनी मेहर कर सभे जीअ समाल, आपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर आपणी मेहर कर, आपणी मेहर कर आपणी मेहर कर, आपणी मेहर कर https://youtu.be/CVXrLTViyGI
मनुष्य की कीमत की कहानी || story of man’s worth in hindi
आरव नाम का एक लड़का था । उसके पिता की लोहे की दुकान थी । आरव अपने पिता के साथ लोहे की दुकान में मदद करता था । एक दिन उसने अपने पिता से पूछा की पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की कीमत क्या होती है ? अपने छोटे से बच्चे के इस सवाल से पिताजी हैरान रह गए । वो सोचने लगे की आखिर इस बालक को ऐसा सवाल क्यों हुआ । पिताजीने अपने बेटे को कहा की बेटा किसी भी मनुष्य की कीमत को आंकना बहुत ही मुश्किल होता है क्योकि उसकी कीमत अनमोल होती है । बेटे ने पूछा वह कैसे पिताजी ? अगर सभी मनुष्य की कीमत अनमोल होती है तो फिर कोई अमीर तो फिर कोई गरीब क्यों होता है ? किसी को कम Respect मिलती है , तो किसी को ज्यादा क्यों मिलती है ? पिताजी ने अपने बेटे को समझाने के लिए कहा की तुम Store Room में जो लोहे का बड़ा सा टुकड़ा पड़ा है वो लेकर आओ । बेटे ने कहा जी पिताजी । वो लोहे का टुकड़ा लेकर आता है । पिताजी उससे पूछते है की बताओ इस लोहे के टुकड़े की क्या कीमत होगी ? आरव बताता है की 500 रूपये । पिताजी अब उससे पूछते है की अगर में इस टुकड़े के छोटे छोटे कील बना दू तो फिर उसकी क्या कीमत होगी ? वो थोड़ा सोच कर बताता है की पिताजी ऐसा करने से उसकी कीमत बढ़ जाएगी । तब तो ये और भी महंगा बिकेगा लगभग 1500 रुपयों में । पिताजी अब उसे पूछते है की बेटा अगर में इस लोहे के टुकडे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो ? आरव कहता है की पापा फिर तो इससे और भी ज्यादा पैसे मिलेंगे । पिताजी अपने बेटे को समजाते हुए बोलते है की ठीक इस लोहे के टुकडे की तरह ही मनुष्य की कीमत होती है । मनुष्य की कीमत भी इसमे नही होती है की अभी वो क्या है, बल्की इसमे होती है कि वो अपने आप को क्या बना सकता है। आरव अब समज चूका था की उसके पिता क्या कहना चाहते है । हम भी अपनी कीमत आंकने में कई बार गलती कर देते है । हम अपने Present Status को देखकर अपने आप को Valueless और Meaningless मानने लगते है । हम ये नहीं सोचते है की हम अपने आप को क्या बना सकते है और हम अभी क्या है उससे अपने आप की कीमत आंक लेते है । हमें हमेशा अपने आप को Improve करते रहना चाहिये और अपनी सही कीमत प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिये ।
थोड़ा ध्यान लगा साईं दौड़े दौड़े आएंगे || Thoda dhyan laga sai daude daude ayenge
थोड़ा ध्यान लगा, साईं दौड़े दौड़े आएंगे, थोड़ा ध्यान लगा, साईं दौड़े दौड़े आएंगे, तुझे गले से लगाएंगे। अखियाँ मन की खोल, तुझको दर्शन वो कराएंगे, अखियाँ मन की खोल, तुझको दर्शन वो कराएंगे, तुझे गले से लगाएंगे॥ हैं राम रमिया वो, हैं कृष्ण कन्हैया वो, वही मेरा साईं है। सत्कर्म राहों पे चलना सिखाते वो, वही जगदीश हैं। प्रेम से पुकार तेरे पाप को जलाएंगे, तुझे गले से लगाएंगे॥ थोड़ा ध्यान लगा… किरपा की छाया में बिठाएंगे तुझको, कहाँ तुम जाओगे। उनकी दया दृष्टि जब जब पड़ेगी तुम यह भव तर जाओगे। ऐसा है विशवास मन में ज्योत जगायेंगे, तुझे गले से लगाएंगे॥ थोड़ा ध्यान लगा… मुनिओं ने ऋषिओं ने, गुरु शिष्य महिमा का, किया गुणगान है। साईं के चरणो में, झुकती सकल सृष्टि, झुके भगवान है। महिमा है अपार, सत्य की राह वो दिखलाएंगे, तुझे गले से लगाएंगे॥ थोड़ा ध्यान लगा…