सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया । दिल दीवाना हो गया, दिल दीवाना हो गया ॥ एक तो तेरे नैन तिरछे, दूसरा काजल लगा । तीसरा नज़रें मिलाना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे होंठ पतले, दूसरा लाली लगी । तीसरा तेरा मुस्कुराना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे हाथ कोमल, दूसरा मेहँदी लगी । तीसरा मुरली बजाना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे पाँव नाज़ुक, दूसरा पायल बंधी । तीसरा घुंगरू बजाना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे भोग छप्पन, दूसरा माखन धरा । तीसरा खिचडे का खाना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे साथ राधा दूसरा रुक्मण खड़ी । तीसरा मीरा का आना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तुम देवता हो, दूसरा प्रियतम मेरे । तीसरा सपनों में आना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया । दिल दीवाना हो गया, दिल दीवाना हो गया ॥
साई राम साई श्याम भजन || Sai ram sai shyam bhajan lyrics in hindi
साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान, करुणा के सागर दया निधान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साईं चरण की धुल को, माथे जो लगाओगे, पुण्य चारों धाम का, शिरडी में ही पाओगे, होगा तुम्हारा वही कल्याण, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । कोई शहंशाह उनको कहे, शिव का ही तो रूप है, छाया हैं वो धर्म की, कर्म की वो धुप है, पढ़के जो आये हैं वेद पुराण, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । मानवता के साई रवि, दया के साई चाँद हैं, साँची प्रेम की डोर से, रहे वो सबको बांध हैं, मंदिर मस्जिद एक सामान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । सबको समझते वो एक सा, राजा हो या रंक हो, भेद और भाव के, मिटा रहे कलंक को, सबको समझते निज संतान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई के द्वार हर घड़ी, सत्य की बरखा हो रही, झूठे इस जहान के, पाप काले धो रही, करते है शंका का समाधान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । बैर रहित कशिश भरी, साई से निर्मल प्रीत लो, दुश्मनी जो कर रहे, उनके दिल भी जीत लो, सब पे चलाते प्रेम के बाण शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई हमें सीखा रहे, सबका मालिक एक है, एक सी नज़र से वो, रहे सभी को देख है, करते न सहते जो अभिमान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई के द्वार शीश धर, दो घडी जो सो गए, नफरतों के नाग भी, विष रहित वह हो गए, हर एक मुश्किल वो करते आसान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई के दर असर होता, हर दिली फ़रियाद का, बेऔलाद पा गए, सुख वहां औलाद का, बेजान भी वहां पा गए जान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । दूर अँधेरे कर रही, साई भजन की रोशनी, रोग शोक हर रही, साई नाम संजीवनी, श्रद्धा सबुरी का देते है दान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साफ़ शुद्ध होती है, जिन दिलो की भावना, पूरी होती उनकी ही, साई के द्वार कामना, कष्ट मिटाते कष्ट निधान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई की धूलि से कभी, तुम भभूत ले भी लो, हर बला से लड़ने की, दिव्य शक्ति ले भी लो, जग में बढ़ाते भक्तों की शान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । आस्था में भीग के, साई को जो है पुकारते, साई खिवैया बनके ही, उनकी नैया तारते, मन की दशा वो लेते है जान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । चमत्कार साई बाबा ने, जब निराले थे किये, दिव्य अनोखे पानी से, जल गए थे सब दिए, पल में किया चूर था अभिमान शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । जिन क्रूर दुष्टों ने, डर दिलो में भर दिया, सीधे सादे संत ने, सही मार्ग उनको दिखा दिया, दया धरम का वो देते है ज्ञान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई के द्वार जो झुके, मेल मन का साफ कर, कसूर सबके साई ने, माफ़ किये उनको अपनाकर, कहता सही है सारा जहान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । दुनिया भर की नेमते, साई जी के पास है, मांग ले जो है मांगना, फिर क्यों इतना उदास है, सबको ही सुख का देंगे वरदान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । निश्चय वृक्ष को यहाँ, फलते हमने देखा है, खोटे सिक्को को भी तो, चलते हमने देखा है, श्रद्धा का देते सदा वरदान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । मीठी वाणी का सदा, रस यहाँ मांगिये, कीर्ति और सम्मान संग, यश यहाँ से मांगिये, विनती वो लेते भक्तों की मान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साईं जी से योग का, कुछ तो ज्ञान लीजिये, आत्मा को सत्य की, कुछ खुराक दीजिये, घर बैठे पाओगे तुम भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साईं के द्वार मिल गयी, जिनको साची नौकरी, साईं दया से उनकी तो, सात पुस्ते तर गयी, देते अलौकिक खुशियों का दान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । जिस किसी ने साईं का, जाप दिल से कर लिए, रहमतों से उसने ही, अपने घर को भर लिया, रहने न देते दुःख का निशान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । अल्ल्हा, ईशू, सतगुरु, प्रभु के तीनो रूप हैं, तोनो को मिला बना, साईं का ये स्वरूप है, पूजा जिनकी करता जहाँ, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । दूर करलो मन से तुम, पहले ये दुर्भावना, प्रीत अगर तुम्हारी सच्ची हो, पूर्ण होगी कामना, छल वल लेते पहचान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साईं सुधा से अंत हो, पाप और संताप का, साईं ने सीखा दिया, गुर हैं पश्चाताप का, अज्ञानी को देते हैं ज्ञान, शिर्डी
ॐ नम: शिवाय मंत्र अर्थ सहित || Om namah shivaay mantra with meaning
ऊंं- मैं मना आत्मा। नम:— नमस्कार। शिवाय्- शिव परमात्मा। ऊॅं नम: शिवाय्- मैं आत्मा शिव परमात्मा को नमस्कार करता हूं। इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से चिंतामुक्त जीवन मिलता है। यह मंत्र जीवन में शांति और शीतलता प्रदान करता है। शिवलिंग पर जल व बिल्वपत्र चढ़ाते हुए यह शिव मंत्र बोलें व रुद्राक्ष की माला से जप भी करें। तीन शब्दों का यह मंत्र महामंत्र है।
मां लक्ष्मी से जुड़ी मान्यताएं क्या हैं? शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है!
शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है! मां लक्ष्मी से जुड़ी अन्य मान्यताएं क्या हैं? शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है! मां लक्ष्मी से जुड़ी अन्य मान्यताएं क्या हैं? शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी और मां संतोषी की पूजा की जाती है। शास्त्रों में लक्ष्मी को चंचला कहा गया है। चंचला का अर्थ है एक ऐसी देवी जिसे लंबे समय तक एक स्थान पर नहीं रहना पड़ता है। पूजा करने वाले और भक्ति में लीन रहने वाले लोग शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में धन की वर्षा होती है। हिंदू धर्म में शुक्रवार को मां लक्ष्मी का दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है। इसलिए जो लोग आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं वे शुक्रवार के दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इस दिन व्रत रखने की भी व्यवस्था है। हिंदू धर्म में, सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवता या देवी को समर्पित होता है। शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी और मां संतोषी की पूजा की जाती है। शास्त्रों में लक्ष्मी को चंचला कहा गया है। चंचला का अर्थ है एक ऐसी देवी जिसे लंबे समय तक एक स्थान पर नहीं रहना पड़ता है। वे चंचल होते हैं, इसलिए एक ही स्थान पर ज्यादा न रुकें। इसलिए कहा जाता है कि पैसा, आज आपके पास बहुत कुछ है, कल नहीं हो सकता। यह भी पड़े : – https://www.devotionalnetwork.com/laxmi-mata-ki-aarti/ हिंदू धर्म में लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। इसलिए धन को स्थायी बनाने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा कर उन्हें प्रसन्न रखा जाता है, जिससे वे कहीं नहीं जाते। इसके लिए हिंदू धर्म में कई उपाय, पूजा और मंत्र हैं। श्रद्धा : लक्ष्मी पूजा से जुड़ी कुछ मान्यताएं हैं, जिनका पालन करके देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार लक्ष्मी समुद्र मंथन में निकली थीं। मंथन से पहले, सभी देवता गरीब थे और धन से वंचित थे। समुंदर मंथन में लक्ष्मी के प्रकट होने के बाद, इंद्र महालक्ष्मी की स्तुति करते हैं। इसके बाद उन्हें महालक्ष्मी की कृपा से धन की प्राप्ति हुई। ऐसा माना जाता है कि ऋषि विश्वामित्र के सख्त आदेश के अनुसार लक्ष्मी साधना को गुप्त और दुर्लभ रखा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी की पूजा गुप्त रखी जानी चाहिए। शास्त्रों में महालक्ष्मी के आठ रूपों का उल्लेख है। मातृत्व के इन रूपों को जीवन का आधार माना जाता है।
तीर्थंकरों के नाम और कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां || Names of tirthankaras and some important information
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थकर हुए। इनमें ऋषभदेव पहले तीर्थंकर एवं महावीर अंतिम तीर्थंकर थे। ऋग्वेद में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव तथा 22वें तीर्थंकर अरिष्ठनमि का उल्लेख मिलता है। ऋषभदेव कोआदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है। ऋषभदेव ने कैलाश पर्वत पर अपना शरीर त्यागा। 22वें तीर्थंकर अरिष्टनेमि को वासुदेव कृष्ण का भाई बताया जाता है। यद्यपि महावीर स्वामी जैन धर्म के संस्थापक नहीं थे किंतु उन्होंने जैन धर्म को सुव्यवस्थित आधार प्रदान किया और व्यापक लोकप्रिय बनाया। अतः जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक महावीर स्वामी को माना जाता है। 24 तीर्थंकरों के नाम – 1. ऋषभदेव जी ऋषभदेव जी जैन धर्म के पहले तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में उत्तरषाढ़ा नक्षत्र में हुआ था। इनको आदिनाथ या वृषभनाथ के नाम से भी जाना जाता है। इनके पिता का नाम नाभिराज व माता का नाम मरूदेवी था जो कि इश्वाकू वंश से थे। इनकी 2 पत्नियाँ थी जिनसे उनको 100 पुत्र व 2 पुत्रियाँ हुई। इनका चिन्ह वृषभ (बैल) को माना जाता हैं। ऋषभदेव जी को मोक्ष कैलाश पर्वत में वट वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 2. अजितनाथ जी अजितनाथ जी जैन धर्म के दूसरे तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम जीतशत्रु व माता का नाम विजयादेवी था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह हाथी था। अजितनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखरजी में सर्पपर्ण वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 3.सम्भवनाथ जी सम्भवनाथ जी जैन धर्म के तीसरे तीर्थकर थे जिनका जन्म श्रावस्ती में पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम जितारी व माता का नाम सेनारानी था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह घोड़ा था। सम्भवनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में शाल वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 4. अभिनन्दन जी अभिनन्दन जी जैन धर्म के चौथे तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम संवर व माता का नाम सिद्धार्था था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह बंदर था। अभिनन्दन जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में देवदा वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 5. सुमतिनाथ जी सुमतिनाथ जी जैन धर्म के पांचवे तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में मद्या नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम मेघरथ व माता का नाम सुमंगला था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह चकवा था। सुमतिनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में प्रियंगु वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 6. पद्मप्रभ जी पद्मप्रभ जी जैन धर्म के छठे तीर्थकर थे जिनका जन्म कौशाम्बीपुरी में चित्रा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीधर धरण राज व माता का नाम सुसीमा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह कमल था। पद्मप्रभ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में प्रियंगु वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 7. सुपार्श्वनाथ जी सुपार्श्वनाथ जी जैन धर्म के सांतवे तीर्थकर थे जिनका जन्म काशीनगरी में विशाखा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम सुप्रतिष्ठ व माता का नाम पृथ्वी था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह साथिया था। सुपार्श्वनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में शिरीष वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 8. चंद्रप्रभु जी चंद्रप्रभु जी जैन धर्म के आठवें तीर्थकर थे जिनका जन्म चंद्रपुरी में अनुराधा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम महासेन व माता का नाम लक्ष्मणा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह चंद्रमा था। चंद्रप्रभु जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में नाग वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 9. सुविधिनाथ जी सुविधिनाथ जी जैन धर्म के नौवे तीर्थकर थे जिनका जन्म काकंदी में मूल नक्षत्र में हुआ था। इन्हें पुष्पदंत के नाम से भी जाना जाता है। इनके पिता का नाम सुग्रीव व माता का नाम रामा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह मगर था। सुविधिनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में साल वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 10. शीतलनाथ जी शीतलनाथ जी जैन धर्म के दसवे तीर्थकर थे जिनका जन्म भद्रिकापुरी में पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम दृढरथ राज व माता का नाम सुनंदा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह कल्पवृक्ष था। शीतलनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में प्लक्ष वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 11. श्रेयांसनाथ जी श्रेयांसनाथ जी जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थकर थे जिनका जन्म सारनाथ में वण नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम विष्णु राज व माता का नाम विष्णुद्री था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह गैंडा था। श्रेयांसनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में तेंदुका वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 12. वासुपूज्य जी वासुपूज्य जी जैन धर्म के बारहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म चम्पापुरी में शतभिषा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम वासुपूज्य व माता का नाम जया था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह भैंसा था। वासुपूज्य जी को मोक्ष चम्पापुरी में पाटला वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 13.: विमलनाथ जी विमलनाथ जी जैन धर्म के तेरहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म काम्पिल्य में उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम कृतवर्मन व माता का नाम श्यामा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह शूकर (जंगली सूअर) था। विमलनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में जम्बू वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 14. अनंतनाथ जी अनंतनाथ जी जैन धर्म के चौदहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में रेवती नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम सिंहसेन व माता का नाम सुयशा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह सेही था। अनंतनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में पीपल वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 15. धर्मनाथ जी धर्मनाथ जी जैन धर्म के पंद्रहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म रत्नपुरी में पुष्य नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम भानुराजा व माता का नाम सुव्रता था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह वज्रदंड था। धर्मनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में दधिपर्ण वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 16. शांतिनाथ जी शांतिनाथ जी जैन धर्म के सौलहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म हस्तिनापुर में भरणी नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम विश्वसेन व माता का नाम अचिरा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह हिरण था। शांतिनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में नंद वृक्ष के नीचे प्राप्त
ईद त्योहार के बारे में जानकारी || Information about eid festival
ईद की शुरुआत सुबह दिन की पहली प्रार्थना के साथ होती है। इसके बाद पूरा परिवार कुछ मीठा खाता है। वैसे ईद पर खजूर खाने की परंपरा है। फिर नए कपड़ों में सजकर लोग ईदगाह के लिए एक बड़े खुले स्थान पर जाते हैं, जहां पूरा समुदाय एक साथ ईद की नमाज़ अदा करता है। प्रार्थना के बाद, ईद की बधाईयां दी जाती है। उस समय ईद-मुबारक कहा जाता है। ये एक दूसरे के प्यार और आपसी भाईचारे को दर्शाता है। ईद-उल-फितर के मौके पर एक खास दावत तैयार की जाती है। जिसमें खासतौर से मीठा खाना शामिल होता है। इसलिए इसे भारत और कुछ दक्षिण एशियाई देशों में मीठी ईद भी कहा जाता है। ईद-उल-फितर पर खासतौर से सेवइयां यानी गेहूं के नूडल्स को दूध के साथ उबालकर बनाया जाता है और इसे सूखे मेवों और फलों के साथ परोसा जाता है। ईद भाई चारे व आपसी मेल का तयौहार है ईद के दिन लोग एक दूसरे के दिल में प्यार बढाने और नफरत को मिटाने के लिए एक दूसरे से गले मिलते हैं। ईद का त्योहार सबको साथ लेकर चलने का संदेश देता है। ईद पर हर मुसलमान चाहे वो आर्थिक रुप से संपन्न हो या न हो, सभी एकसाथ नमाज पढ़ते हैं और एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस्लाम में चैरिटी ईद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हर मुसलमान को धन, भोजन और कपड़े के रूप में कुछ न कुछ दान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जकात यानी दान को हर मुसलमान का फर्ज कहा गया है। ये गरीबों को दिए जाने वाला दान है। मुस्लिम अपनी संपत्ति को पवित्र करने के रूप में अपनी सालाना बचत का एक हिस्सा गरीब या जरूरतमंदों को जकात के रूप में देते हैं।
अजमेर शरीफ़ दरगाह का इतिहास || History of ajmer sharif dargah
राजस्थान राज्य के अजमेर में स्थित ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यह दरगाह, पिंकसिटी जयपुर से करीब 135 किलोमीटर दूर, चारों तरफ अरावली की पहाड़ियों से घिरे अजमेर शहर में स्थित है। अजमेर शरीफ की दरगाह के नाम से यह पूरे देश में प्रसिद्ध है। इस दरगाह से सभी धर्मों के लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। इसे सर्वधर्म सद्भाव की अदभुत मिसाल भी माना जाता है। ख्वाजा साहब की दरगाह में हर मजहब के लोग अपना मत्था टेकने आते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी ख्वाजा के दर पर आता है कभी भी खाली हाथ नहीं लौटता है, यहां आने वाले हर भक्त की मुराद पूरी होती है। ख्वाजा की मजार पर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, बीजेपी के दिग्गत नेता स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी, देश की पहली महिला पीएम इंदिरा गांधी, बराक ओबामा समेत कई नामचीन और मशहूर शख्सियतों ने अपना मत्था टेका है। इसके साथ ही ख्वाजा के दरबार में अक्सर बड़े-बड़े राजनेता एवं सेलिब्रिटीज आते रहते हैं और अपनी अकीदत के फूल पेश करते हैं एवं आस्था की चादर चढ़ाते हैं। ऐसा माना जाता है, लाखों धर्मों की आस्था से जुड़ी अजमेर शरीफ की दरगाह का निर्माण सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने करवाया था इसके बाद मुगल सम्राट हुमायूं समेत कई मुगल शासकों ने इसका विकास करवाया। मान्यता है की कोई भी इनके दरबार से खाली हाथ नहीं जाता। यही कारण है की यहाँ सभी धर्मों के लोग अपनी फ़रियाद लेकर आते हैं। अजमेर शरीफ दरगाह के दर्शन के लिए उर्स का त्यौहार सर्वोत्तम समय का माना जाता है। उर्स के मौके पर लाखों की संख्या में लोग अजमेर शरीफ जाते हैं। इस उत्सव के अवसर पर यह पवित्र मजार 24 घंटे श्रद्धालु के लिए खुला रहता है।
महावीर स्वामी का जीवन परिचय || Biography of mahavir swami
• महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर थे। वे बुद्ध के बाद भारतीय गास्तिक आचार्यों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। महावीर का जन्म 540 बी.सी.ई में वैशाली के कुण्डाग्राम में हुआ था। • महावीर के पिता का नाम सिद्धार्थ था, जो वण्जिसंघ के एक राज्य कुण्डाग्राम के ज्ञातृक क्षत्रिय थे। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान (महावीर स्वामी) पहले ऋषभदत्त नामक ब्राह्मण की पत्नी देवनंदा के गर्भ में आयो परंतु चूंकि अभी तक सारे तीर्थंकर क्षत्रिय वंश के थे। • कल्पसूत्र के अनुसार ज्योतिषियों महावीर के लिए भी चक्रवर्ती राजा था महान सन्यायी बनाने की भविष्यवाणी की थी। महावीर के पुत्री का नाम प्रियदर्शना (अणोज्जी) था। • महावीर के दामाद जामालि था, जिसे महावीर स्वामी ने स्वयं दीक्षिण किया था। इस प्रकार संभवतः जामालि महावीर स्वामी का प्रथम शिष्य था। • महावीर के केवल्य (ज्ञान) प्राप्ति के 14वें वर्ष में जामालि ने विद्रोह किया और एक अलग बहुतरवाद चलाया। विद्रोह का कारण कियमाणकृत सिद्धांत कार्य होते ही पूरा हो जाना था। अतः जामालि ने बहुतरवाद चलाया। जामाति के दो वर्षों बाद तीसगुप्त ने जैन धर्म में दूसरा विद्रोह किया। • महावीर ने 30 वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई राजा नदिवर्धन से आशा लेकर गृह त्याग किया और कठिन तपस्या की। •. कल्पसूत्र एवं आचरंग सूत्र में महावीर के कठोर तपश्चर्या एवं कायावलेश का वर्णन है। कल्पसूत्र से पता चलता है कि प्रारम्भ में महावीर ने 1 वर्ष 1 माह तक वस्त्र धारण कर तपस्या किया और उसके पश्चात् वस्त्र त्यागकर नंगे रहने लगे एवं भोजन हथेली पर लेना शुरू किया। • तपस्वी वेश में महावीर भ्रमण करते हुए नालन्दा पहुंच जहाँ उनकी मुलाकात गवस्खलिगोशाल से हुई। यह महावीर का शिष्य बन गया, किंतु 6 वर्षों के बाद गोशाल ने उनका साथ छोड़कर एक अलग आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना की। • 12 वर्ष कठोर तपस्या के बाद 42वें वर्ष में जन्धिका ग्राम में समीप हजुपालिका नदी के तट पर साल के वृक्ष केनीचे वर्धमान को केवल्प (ज्ञान) प्राप्त हुआ। •. केवल्य (ज्ञान) की प्राप्ति के बाद वे केवलिन कहलाए, अपनी समस्त इन्द्रियों को जीतने के कारण जन कहलाए तथा अतुल पराक्रम दिखाने के कारण वे महावीर कहे गए। बौद्ध धर्म के ग्रंथों में महावीर स्वामी को ‘निगण्ठनाथपुत्र कहा गया है।
बौद्ध धर्म की विशेषताएँ || Features of buddhism
* बौद्ध धर्म ईश्वर और आत्मा को नहीं मानता है । इस बात को हम भारत के धर्मों के इतिहास में क्रांति कह सकते हैं । बौद्ध धर्म शुरू में दार्शनिक वाद-विवादों के जंजाल में फँसा नहीं था इसलिए यह सामान्य लोगों को भाया । यह विशेष रूप से निम्न वर्णों का समर्थन पा सका क्योंकि इसमें वर्ण व्यवस्था की निंदा की गई है । * बौद्ध संघ का दरवाजा हर किसी के लिए खुला रहता था चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो । संघ में प्रवेश का अधिकार स्त्रियों को भी था जिससे उन्हें पुरुषों की बराबरी प्राप्त होती थी । ब्राह्मण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अधिक उदार और अधिक जनतांत्रिक था । * बौद्ध धर्म वैदिक क्षेत्र के बाहर के लोगों को अधिक भाया और वे लोग आसानी से इस धर्म में दीक्षित हुए । मगध के निवासी इस धर्म की ओर तुरंत उन्मुख हुए, क्योंकि कट्टर ब्राह्यण उन्हें नीच मानते थे और मगध आर्यों की पुण्य भूमि आर्यावर्त्त अर्थात आधुनिक उत्तर प्रदेश की सीमा के बाहर पड़ता था । अभी भी उत्तर बिहार के लोग गंगा के दक्षिण मगध में मरना पसंद नहीं करते हैं । * बुद्ध के व्यक्तित्व और धर्मोपदेश की प्रणाली दोनों ही बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक हुए । वे भलाई करके बुराई को भगाने तथा प्रेम करके घृणा को भगाने का सयास करते थे । निंदा और गाली से उन्हें क्रोध नहीं आता था । * कठिन स्थितियों में भी वे धीर और शांत बने रहते थे और अपने विरोधियों का सामना चातुर्य और प्रत्युत्पन्नमति से करते थे । कहा जाता है कि एक बार एक अज्ञानी व्यक्ति ने उन्हें गालियाँ दीं । वे चुपचाप सुनते रहे ।उस व्यक्ति का गाली देना बंद हुआ तो उन्होंने पूछा ”वत्स, यदि कोई दान को स्वीकार नहीं करे तो उस दान का क्या होगा ?” विरोधी ने उत्तर दिया, ”वह देने वाले के पास ही रह जाएगा ।” तब बुद्ध ने कहा, ”वत्स, में तुम्हारी गालियाँ स्वीकार नहीं करता ।” * जनसाधारण की भाषा पालि को अपनाने से भी बौद्ध धर्म के प्रचार में बल मिला । इससे आम जनता बौद्ध धर्म सुगमता से समझ पाई । गौतम बुद्ध ने संघ की स्थापना की जिसमें हर व्यक्ति जाति या लिंग के भेद के बिना प्रवेश कर सकता था । * भिक्षुओं के लिए एक ही शर्त थी कि उन्हें संघ के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना होगा । बौद्ध संघ में शामिल होने के बाद इसके सदस्यों को इंद्रियनिग्रह अपरिग्रह (धनहीनता) और श्रद्धा का संकल्प लेना पड़ता था । * इस प्रकार बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख अंग थे: बुद्ध, संघ और धम्म । संघ के तत्त्वावधान में सुगठित प्रचार की व्यवस्था होने से बुद्ध के जीवनकाल में ही बौद्ध धर्म ने तेजी से प्रगति की । मगध कोसल और कौशांबी के राजाओं अनेक गणराज्यों और उनकी जनता ने बौद्ध धर्म को अपना लिया । * बुद्ध के निर्वाण के दो सौ साल बाद प्रसिद्ध मौर्य सम्राट् अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया । यह युग-प्रवर्त्तक घटना सिद्ध हुई । अशोक ने अपने धर्मदूतों के द्वारा इस धर्म को मध्य एशिया पश्चिमी एशिया और श्रीलंका में फैलाया और इसे विश्व धर्म का रूप दिया । * आज भी श्रीलंका बर्मा और तिब्बत में तथा चीन और जापान के कुछ भागों में बौद्ध धर्म प्रचलित है । अपनी जन्मभूमि से तो यह धर्म लुप्त हो गया परंतु दक्षिण एशिया दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया के देशों में जीता-जागता है ।
जैन धर्म के ग्रंथ || Scriptures of jainism
जैन धर्म सहित्यिक रूप से बहुत धनी था। अनेक धार्मिक ग्रंथ लिखे गए हैं। ये ग्रंथ संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में लिखे गए थे । केवल ज्ञान, मनपर्यव ज्ञानी, अवधि ज्ञानी, चतुर्दशपूर्व के धारक तथा दशपूर्व के धारक मुनियों को आगम कहा जाता था तथा इनके द्वारा दिए गए उपदेशों को भी आगम नाम से संकलित किया गया। दिगम्बर जैनों द्वारा समस्त 45 आगम ग्रंथों को चार भाग में विभाजित किया गया है – प्रथमानुयोग, करनानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग। दिगम्बरों का मानना है कि आगम ग्रंथ समय के साथ-साथ अलग-अलग होते गए हैं। श्वेतांबर जैनों का प्रमुख ग्रंथ कल्पसूत्र माना जाता है। साथ ही आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित ‘तत्वार्थ सूत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जो सभी जैनों द्वारा स्वीकृत है। इसमें 10 अध्याय तथा 350 सूत्र हैं। दिगम्बरों के प्राचीन साहित्य की भाषा शौरसेनी थी, जो एक प्रकार की अपभ्रंश ही थी।आदिकालीन साहित्य में सबसे प्रमाणिक रूप में जैन ग्रंथ ही प्राप्त होते हैं। जैन कवियों द्वारा अनेक प्रकार के ग्रंथ रचे गए।उन्होंने पुराण काव्य, चरित काव्य, कथा काव्य, रास काव्य आदि विविध प्रकार के ग्रंथ रचे। स्वयंभू, पुष्प दंत, हेमचंद्र, सोमप्रभ सूरी, जिनधर्म सूरी आदि मुख्य जैन कवि हैं। स्वयंभू को हिन्दी का प्रथम कवि भी स्वीकार किया जाता है जिनकी प्रमुख रचना ‘पउमचरिउ’ है जिसमें रामकथा का वर्णन है। अधिकतर जैन ग्रंथों का आधार हिन्दू कथाएं ही बनी।