शनि देव की कथा शनि, भगवान सूर्य तथा छाया के पुत्र हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्मपुराण के अनुसार, बचपन से ही शनिदेव भगवान श्रीकृष्ण के भक्त थे। बड़े होने पर इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से किया गया। इनकी पत्नि सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थीं। एक बार पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से वे इनके पास पहुचीं पर ये श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न थे। इन्हें बाह्य जगत की कोई सुधि ही नहीं थी। पत्नि प्रतिक्षा कर थक गयीं तब क्रोधित हो उसने इन्हें शाप दे दिया कि आज से तुम जिसे देखोगे वह नष्ट हो जाएगा। ध्यान टूटने पर जब शनिदेव ने उसे मनाया और समझाया तो पत्नि को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ, किन्तु शाप के प्रतिकार की शक्ति उसमें ना थी। तभी से शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके द्वारा किसीका अनिष्ट हो। शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण इन्द्रनीलमणी के समान है। वाहन गीध तथा रथ लोहे का बना हुआ है। ये अपने हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। यह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं। यह मकर व कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। इनका सामान्य मंत्र है – “ऊँ शं शनैश्चराय नम:” इसका श्रद्धानुसार रोज एक निश्चित संख्या में जाप करना चाहिए। शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते हैं परंतु श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारम्भ करना अति मंगलकारी है । इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए। शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवन्ती का फूल, तिल, तेल, गुड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए। शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए। शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए। इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए। शनि की अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टि है । शनि अच्छे कर्मो के फलदाता भी है। शनि बुर कर्मो का दंड भी देते है। जय जय श्री शनि देव जी महाराज
गणेश जी के जन्म की कहानी
एक दिन पार्वती माता स्नान करने के लिए जा रही थी लेकिन वहां पर उनके लिए कोई भी रक्षक उपस्थित नहीं था| इसलिए उन्होंने चंदन के पेस्ट से एक लड़के को अवतार दिया और उसका नाम गणेश रखा. माता पार्वती नें गणेश को आदेश देते हुए कहा की उनकी अनुमति के बिना वो किसी को भी घर के अंदर ना आने दें| उस समय माता पार्वती के पति प्रभु शिव जी किसी काम से कही बाहर गए हुए थे. जब शिवजी वापस लौटे तो उन्होंने देखा की द्वार पर एक बालक खड़ा है, उन्होंने सोचा शायद खेलते-खेलते वहाँ युही आ गया हो| जब वे अन्दर जाने लगे तो उस बालक नें उन्हें रोक लिया और नहीं जाने दियायह देख शिवजी क्रोधित हुए और अपने सवारी बैल नंदी को उस बालक से युद्ध करने को कहाँ पर युद्ध में उस छोटे बालक नें नंदी को हरा दिया. अक्सर कहानियों मे आपने सुना ही होगा की शिव जी को जल्दी क्रोध आ जाता था और गणेश को जीतता हुआ देख कर भगवान शिवजी को फिर से क्रोध आ गया और उन्होंने उस बाल गणेश के सर धड़ से अलग कर काट दिया. इतने में माता पार्वती वापस लौटी तो वो बच्चे का सिर अलग हुआ देख बहुत दुखी हुई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी| शिवजी को जब पता चला की वह उनका स्वयं का पुत्र था तो उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हुआ. शिवजी नें पार्वती को बहुत समझाने की कोशिश की पर वह नहीं मानी और गणेश का नाम लेते लेते और दुखित होने लगी| पत्नी को दुखी देख शिवजी भी दुखी हो गए. अंत में माता पार्वती नें क्रोधित होकर शिवजी को अपनी शक्ति से गणेश को दोबारा जीवित करने के लिए कहा| शिवजी बोले – “हे पार्वती में गणेश को जीवित तो कर सकता हूँ पर किसी भी अन्य जीवित प्राणी के सीर को जोड़ने पर ही|” माता पार्वती रोते-रोते बोल उठी की मुझे अपना पुत्र किसी भी हाल में जीवित चाहिए| अब भला पत्नी की बात का वो मान कैसे नहीं रखे और तभी उन्होंने नंदी को आदेश दिया – जाओ नंदी इस संसार में जिस किसी भी जीवित प्राणी का सीर तुमको मिले काट लाना| जब नंदी सीर खोज रहा था तो सबसे पहले उससे एक हाथी दिखा तो वो उसका सीर काट कर ले आया. भगवान शिव नें उस सीर को गणेश के शरीर से जोड़ दिया और गणेश को जीवन दान दे दिया. शिवजी नें इसीलिए गणेश जी का नाम गणपति रखा और बाकि सभी देवताओं नें उन्हें वरदान दिया की इस दुनिया में जो भी कुछ नया कार्य करेगा पहले ! जय श्री गणेश
जैन धर्म का इतिहास
जैन धर्म का इतिहास जैन मत भारत की श्रमण परम्परा से निकला प्राचीन मत और दर्शन है। जैन अर्थात् कर्मों का नाश करनेवाले ‘जिन भगवान’ के अनुयायी। सिन्धु घाटी से मिले जैन अवशेष जैन मत को सबसे प्राचीन मत का दर्जा देते है। उदयगिरि की रानी गुम्फा सम्मेदशिखर, राजगिर, पावापुरी, गिरनार, शत्रुंजय, श्रवणबेलगोला आदि जैनों के प्रसिद्ध तीर्थ हैं। पर्यूषण पर्व या दशलक्षण, दीपावली, श्रुत पंचमीऔर रक्षाबंधन इनके मुख्य त्यौहार हैं। अहमदाबाद, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बंगाल आदि के अनेक जैन आजकल भारत के अग्रगण्य उद्योगपति और व्यापारियों में गिने जाते हैं। जैन धर्म का उद्भव की स्थिति अस्पष्ट है। जैन ग्रंथो के अनुसार धर्म वस्तु का स्वाभाव समझाता है, इसलिए जब से सृष्टि है तब से धर्म है, और जब तक सृष्टि है, तब तक धर्म रहेगा, अर्थात् जैन धर्म सदा से अस्तित्व में था और सदा रहेगा। इतिहासकारो द्वारा जैन धर्म का मूल भी सिंधु घाटी सभ्यता से जोड़ा जाता है जो हिन्द आर्य प्रवास से पूर्व की देशी आध्यात्मिकता को दर्शाता है। सिन्धु घाटी से मिले जैन शिलालेख भी जैन धर्म के सबसे प्राचीन धर्म होने की पुष्टि करते है। अन्य शोधार्थियों के अनुसार श्रमण परम्परा ऐतिहासिक वैदिक धर्म के हिन्द-आर्य प्रथाओं के साथ समकालीन और पृथक हुआ। जैन ग्रंथो (आगम्) के अनुसार वर्तमान में प्रचलित जैन धर्म भगवान आदिनाथ के समय से प्रचलन में आया। यहीं से जो तीर्थंकर परम्परा प्रारम्भ हुयी वह भगवान महावीर या वर्धमान तक चलती रही जिन्होंने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था। भगवान महावीर के समय से पीछे कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं। उनके अनुसार यह धर्म बौद्ध धर्म के पीछे उसी के कुछ तत्वों को लेकर और उनमें कुछ ब्राह्मण धर्म की शैली मिलाकर खडा़ किया गया। जिस प्रकार बौद्धों में २४ बुद्ध है उसी प्रकार जैनों में भी २४ तीर्थंकर है। जैन शब्द जिन शब्द से बना है। जिन बना है ‘जि’ धातु से जिसका अर्थ है जीतना। ”जिन अर्थात जीतने वाला” जिसने स्वयं को जीत लिया उसे जितेंद्रिय कहते हैं।
जन्म के समय लखदाता जी का नाम क्या रखा गया था…
जन्म के समय लखदाता जी का नाम सय्यद अहमद सुलतान रखा गया, आप के सभी नामों में से सखी सरवर नाम ज्यादा प्रचलित है क्योंकि आप इतने जयादा दरिया दिल थे जो भी आप के पास आता कैसी भी मुराद ले के आता, चाहे वो धर्म के प्रति होती चाहे दुनियादारी की मुश्किल होती आप सभी मुश्किलों का हल एक ही पल में कर देते थे । लखदाता जी का एक किस्सा बहुत मशहूर है, जब लखदाता जी की शादी हुई और आप को जो भी दहेज़ में मिला वो सब आपने गरीबों और जरुरतमंदो में बाँट दिया आप बहुत ऊँचे खयालों और गरीबों का धयान रखने वाले पीर थे यां यूँ कहो की दानशीलता और रूहानियत आप में कूट – कूट कर भरी हुई थी । जो भी जरूरतमंद आप के पास आता आप उस की आस मुराद जरुर पूरी करते । इसी लिए आप का नाम सखी सरवर पड़ा । यह बात उस समय से लेकर आज तक अट्टल है कोई भी सवाली, चाहे किसी भी मजहब का हो अगर सच्चे दिल से कोई भी मुराद लेकर आप के दरबार में आता है तो उस की आस-मुराद जरुर पूरी होती है । लखदाता जी ने अपने जीवन का काफी समय धौंकल में गुजारा और बाद में आप शाहकोट आ गए और यहीं पर आपने सय्यद अब्दुल रज़ाक जी की बेटी से शादी की और आप के एक बेटा भी हुआ जिस का नाम सय्यद सिराजुदीन रखा था । उसके बाद आपने दूसरी शादी मुल्तान के राजा घणो पठान जी की बेटी से की । लखदाता जी कई साल अपने पिता जी सय्यद जैनुल आबिदीन, माता आइशा जी और भाईओं के साथ शाहकोट में ही रहे और दीन-दुखियों की सेवा करते रहे । यहीं पर आप के पिता जी, माता जी और भाई अल्ला को प्यारे हो गए और उनके मजार शाहकोट में ही स्थित हैं । एक के बाद एक करके आप के सभी रिश्तेदार अल्ला को प्यारे हो गए तो आप ने शाहकोट को छोड़ने का मन बना लिया और एक दिन आप ने शाहकोट छोड़ दिया और गॉव निगाहा की तरफ रवाना हो गए, जो मुल्तान से लगभग 60 (साठ) कोह की दुरी पर है । जब आप निगाहे की तरफ रवाना हुए तो उस वक़्त आपके साथ आप की पत्नी बीबी बाई जी, आप का बेटा सय्यद सिराजुदीन जो सय्यद राज के नाम से भी प्रसिद्ध है वो और आप के छोटे भाई खान ढोढा जी भी आप के साथ थे । इनके इलावा आप के साथ आप के चार साथी भी थे, वही चार साथी जो चार यार – मियां नूर जी, मियां मुहमद इसहाक जी, मियां उस्मान जी और मियां अली जी – वो भी आप के साथ निगाहा चल दिए । लखदाता जी ने जब शाहकोट छोड़ा तो उन्होंने अपना सब कुछ वही छोड़ दिया था यहाँ तक की सारे खेत खलियान सब ऐसे ही छोड़ कर निगाहा आ गए थे । लखदाता जी ने गॉव निगाहा में आकर डेरा जमा लिया और यहीं पर एक झोंपड़ी बना कर बाकी की सारी जिंदगी खुदा की इबादत करते हुए गरीबों, मजलूमों और जरूरतमंदों की सेवा करते हुए अपना जीवन नौछावर कर दिया । एक बार लखदाता जी ने कुछ राहगीरों को अपने मुखारबिंद से वचन किया था की चाहे कोई फ़क़ीर हो यां चोर , राजा हो यां रंक एक दिन सब को यह दुनिया छोड़ कर जाना है बस फर्क सिर्फ इतना होता है की इंसान का जीना और मरना होता है पर जो पूर्ण पीर फ़क़ीर, संत, गुरु होते है उनका आना जाना होता है वो अपनी मर्ज़ी से आते है और अपनी मर्ज़ी से जाते है उन्हें कोई मार नहीं सकता वो अमर होते है । सखी सरवर जी, लखदाता जी, लालां वाली सरकार अपने मुरीदों में खैरातें बांटते हुए इस नाशवान दुनिया को अलविदा कह कर सचखंड में जा विराजे । लखदाता जी ने अपने मुरीदों से वचन किया की हमारे इस दुनिया छोड़ देने के बाद भी सब की मुरादें पूरी होंगी, अगर कोई भी इंसान, किसी भी मजहब का हो अगर उन्हें सच्चे दिल से याद करेगा तो लखदाता जी उसकी आस – मुराद जरुर पूरी करेंगे । समय के हुकुमरानों ने देश का बंटवारा तो कर दिया लेकिन वो लखदाता जी के मुरीदों की श्रद्धा का बंटवारा नहीं कर सके । इसी लिए आज भी दोनों देशो (हिंदुस्तान और पाकिस्तान ) में लखदाता जी के नाम के मेले लगते है और चिराग रोशन होते है
चिड़िया के बच्चे..जब महाभारत का युद्ध प्रारम्भ हो रहा था……
चिड़िया के बच्चे.. जब महाभारत का युद्ध प्रारम्भ हो रहा था, इधर से पांड़वो की सेना तैयार थी उधर से कौरवों की सेना तैयार थी। दोनों सेनाएं आपस में टकराने के लिए बिल्कुल तैयार थी तो उस समय युद्ध क्षेत्र बीच में एक चिड़िया के अंडे पड़े हुए थे। उस चिड़िया ने अभी-अभी वो अंडे दिए थे और उसकी आँखों में आँसू थे, वो रो रही थी कि दोनों तरफ से सेनाएं आपस मे टकराएंगी और मेरे ये बच्चे तो संसार में आने से पहले ही खत्म हो जाएंगे। उस चिडिया ने इस दु:ख की घडी मे भगवान से विनती की “हे प्रभु ! जिसकी कोई नहीं सुनता उसकी तो आप सुनते हो।” उस छोटी सी चिड़िया ने भगवान से प्रार्थना की प्रभु अब तो आप ही कुछ कर सकते है और उसी समय युद्ध प्रारम्भ हुआ। दोनों सेनाएं परस्पर टकराई, महा भयंकर युद्ध हुआ। बडे-बडे महारथी युद्ध मे मारे गये। चारों तरफ सैनिकों के लाशों के ढ़ेर थे। महाभारत युद्ध के उपरांत अर्जुन के रथ को लेकर श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की भूमि से निकलकर जा रहे है, पांडव युद्ध जीत चुके है। भगवान अर्जुन के रथ को लेकर जा रहे है तो नीचे भूमि पर एक रथ का घंटा पड़ा हुआ है। भगवान के हाथ में घोड़ो को हांकने वाला चाबुक है। भगवान ने उस पड़े हुए घंटे पे जोर से चाबुक को मारा तो वो घंटा पलट गया और जैसे ही वो घंटा पलटा तो उसके अंदर से चिड़िया के नन्हे बच्चे फुदकते हुए बाहर निकले और उड़कर वहाँ से चले गए। ये देखकर अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ और अर्जुन भगवान से बोले “केशव ! ये मैं क्या देख रहा हूँ ? इतना भीषण युद्ध जो ना पहले कभी हुआ और ना आगे शायद होगा। ऐसा ये भीषण महाभारत युद्ध जिसमे भीष्म पितामह, कर्ण और गुरु द्रौण, जैसे योद्धा नहीं बचे। जिस युद्ध में दुर्योधन जैसे बलशाली नहीं बचे। ऐसे भीषण संग्राम में इन चिड़िया के बच्चों की रक्षा किसने की ?” भगवान मुस्कुराने लगे और बोले “अर्जुन ! अभी भी नहीं समझा ? अरे पगले जिसने तुझे बचाया है, उसने ही तो इनको बचाया है
जीवनगाथा पीर सखी सरवर – लखदाता जी
जीवनगाथा पीर सखी सरवर – लखदाता जी अरब देश के बग़दाद शहर में बहुत ही करनी वाले फ़क़ीर हुऐ हैं, उनमें से एक फ़क़ीर हुऐ हैं, सय्यद उमरशाह जी । जिन्होंने 40 साल तक “रसूले करीम सल्लाह अल्ला वस्सलहम” जी के रोज़ा मुबारक पर सेवा की । उनके 4 बेटे थे – स य्यद जैनुल आबिदीन, सय्यद हस्सन, सय्यद अली और सय्यद जफ़र । एक दिन सय्यद उमरशाह जी अकाल चलाना कर गए, उन के बाद उनकी गद्दी पर उनके बड़े बेटे सय्यद जैनुल आबिदीन जी को बैठाया गया । सय्यद जैनुल आबिदीन जी ने बग़दाद शरीफ में गरीबो, मजबूरों और जरुरत मंदो की 22 साल तक सेवा की, और इसी दौरान उनकी शादी बग़दाद शरीफ की बीबी अमीना जी (जिन्हे लोग बीबी फातिमा जी के नाम से भी याद करते हैं) से हुई । इनके 3 बेटे हुए सय्यद दाऊद, सय्यद महमूद और सय्यद सहरा । 22 साल की सेवा निभाने के बाद एक दिन सय्यद जैनुल आबिदीन जी अपने रूहानी गुरु जी के हुकम से बग़दाद शरीफ छोड़ कर मुल्तान (अब पाकिस्तान) के पास पड़ते गॉव शाहकोट (अब पाकिस्तान) में परिवार समेत आकर अपना डेरा जमाया । यहाँ आये अभी थोड़ा समय ही बीता था की बीबी अमीना (फातिमा) जी स्वर्ग सिधार गईं । उनकी मौत के बाद वहाँ के नम्बरदार पीर अरहान ने अपनी बेटी आइशा जी की शादी सय्यद जैनुल आबिदीन जी से करदी । इस शादी से आप के 2 बेटे पैदा हुए बड़े बेटे का नाम सय्यद अहमद सुलतान (लखदाता जी) और छोटे बेटे का नाम सय्यद अब्दुल गनी खान ढोढा रखा गया । जब लखदाता जी का जन्म होने वाला था तो दाई नूरां को बुलाया गया जो कई सालों से आँखों से अंधी थी । जब लखदाता जी का जन्म हुआ उस वक़्त एक बहुत अजीबो गरीब करिश्मा हुआ जैसे ही दाई नूरां ने आप को छुआ आप की छो प्राप्त होते ही अंधी दाई नूरां की आंखों की रोशनी आ गई और उसे सब दिखाई देने लग पड़ा और उसकी अँधेरी जिंदगी फिर से रोशन हो गई । दाई नूरां ने सय्यद जैनुल आबिदीन जी से कहा हज़ूर आप के घर खुद अल्ला ने जन्म लिया है । माता आईशा जी के कहने पर सय्यद जैनुल आबिदीन जी ने दाई नूरां को जुवार का भरा घड़ा बधाई के रूप में दिया । घड़ा सिर पर उठा दाई नूरां ख़ुशी – ख़ुशी घर की तरफ चल पड़ी, रास्ते में ख्याल आया क्यूँ ना जुवार बेच कर घर का राशन ले लूं । यही सोच कर दाई नूरां बनियें की दूकान पर गई और जैसे ही उसने घड़ा सिर से उतार कर जमीन पर रखा तो दाई नूरां और बनियां हैरानी से घड़े की तरफ देखते ही रह गए जो घड़ा जुवार से भरा हुआ था उस में से सतरंगी रौशनी निकल रही है और उनकी रोशनी से सारी दूकान जगमगा उठी यानि जुवार के दाने लाल (हीरे – ज्वाहरात) बन गए और उसी दिन से आपका नाम लालां वाला पीर पड़ गया । रूहानियत की शिक्षा आपने अपने पिता जी से हासिल की और आगे की शिक्षा आपने लाहौर के सय्यद मोहम्मद इसहाक जी से प्राप्त की । लखदाता जी ने फैज़ (रेहमत) की शिक्षा तस्वूफ की दुनिया के तीन बड़े सिलसिलों से यानि कादरीयों, चिश्तीयों और सुहरवर्दीयों से हासिल की ।
बाबा बालकनाथ जी की कहानी
बाबा बालकनाथ जी की कहानी बाबा बालकनाथ अमर कथा में पढ़ी जा सकती है, ऐसी मान्यता है, कि बाबाजी का जन्म सभी युगों में हुआ जैसे कि सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग और वर्तमान में कल युग और हर एक युग में उनको अलग-अलग नाम से जाना गया जैसे “सत युग” में “ स्कन्द ”, “ त्रेता युग” में “ कौल” और “ द्वापर युग” में “महाकौल” के नाम से जाने गये। अपने हर अवतार में उन्होंने गरीबों एवं निस्सहायों की सहायता करके उनके दुख दर्द और तकलीफों का नाश किया। हर एक जन्म में यह शिव के बड़े भक्त कहलाए। द्वापर युग में, ”महाकौल” जिस समय “कैलाश पर्वत” जा रहे थे, जाते हुए रास्ते में उनकी मुलाकात एक वृद्ध स्त्री से हुई, उसने बाबा जी से गन्तव्य में जाने का अभिप्राय पूछा, वृद्ध स्त्री को जब बाबा जी की इच्छा का पता चला कि वह भगवान शिव से मिलने जा रहे हैं तो उसने उन्हें मानसरोवर नदी के किनारे तपस्या करने की सलाह दी और माता पार्वती, (जो कि मानसरोवर नदी में अक्सर स्नान के लिए आया करती थीं) से उन तक पहुँचने का उपाय पूछने के लिए कहा। बाबाजी ने बिलकुल वैसा ही किया और अपने उद्देश्य, भगवान शिव से मिलने में सफल हुए। बालयोगी महाकौल को देखकर शिवजी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बाबाजी को कलयुग तक भक्तों के बीच सिद्ध प्रतीक के तौर से पूजे जाने का आशिर्वाद प्रदान किया और चिर आयु तक उनकी छवि को बालक की छवि के तौर पर बने रहने का भी आशिर्वाद दिया। कलयुग में बाबा बालकनाथ जी ने गुजरात, काठियाबाद में “देव” के नाम से जन्म लिया। उनकी माता का नाम लक्ष्मी और पिता का नाम वैष्णो वैश था, बचपन से ही बाबाजी ‘आध्यात्म’ में लीन रहते थे। यह देखकर उनके माता पिता ने उनका विवाह करने का निश्चय किया, परन्तु बाबाजी उनके प्रस्ताव को अस्विकार करके और घर परिवार को छोड़ कर ‘ परम सिद्धी ’ की राह पर निकल पड़े। और एक दिन जूनागढ़ की गिरनार पहाडी में उनका सामना “स्वामी दत्तात्रेय” से हुआ और यहीं पर बाबाजी ने स्वामी दत्तात्रेय से “ सिद्ध” की बुनियादी शिक्षा ग्रहण करी और “सिद्ध” बने। तभी से उन्हें “ बाबा बालकनाथ जी” कहा जाने लगा। बाबाजी के दो पृथ्क साक्ष्य अभी भी उप्लब्ध हैं जो कि उनकी उपस्थिति के अभी भी प्रमाण हैं जिन में से एक है “ गरुन का पेड़” यह पेड़ अभी भी शाहतलाई में मौजूद है, इसी पेड़ के नीचे बाबाजी तपस्या किया करते थे। दूसरा प्रमाण एक पुराना पोलिस स्टेशन है, जो कि “बड़सर” में स्थित है जहाँ पर उन गायों को रखा गया था जिन्होंने सभी खेतों की फसल खराब कर दी थी, जिसकी कहानी इस तरह से है कि, एक महिला जिसका नाम ’ रत्नो ’ था, ने बाबाजी को अपनी गायों की रखवाली के लिए रखा था जिसके बदले में रत्नो बाबाजी को रोटी और लस्सी खाने को देती थी, ऐसी मान्यता है कि बाबाजी अपनी तपस्या में इतने लीन रहते थे कि रत्नो द्वारा दी गयी रोटी और लस्सी खाना याद ही नहीं रहता था। एक बार जब रत्नो बाबाजी की आलोचना कर रही थी कि वह गायों का ठीक से ख्याल नहीं रखते जबकि रत्नो बाबाजी के खाने पीने का खूब ध्यान रखतीं हैं। रत्नो का इतना ही कहना था कि बाबाजी ने पेड़ के तने से रोटी और ज़मीन से लस्सी को उत्त्पन्न कर दिया। बाबाजी ने सारी उम्र ब्रह्मचर्य का पालन किया और इसी बात को ध्यान में रखते हुए उनकी महिला भक्त ‘गर्भगुफा’ में प्रवेश नहीं करती जो कि प्राकृतिक गुफा में स्थित है जहाँ पर बाबाजी तपस्या करते हुए अंतर्ध्यान हो गए थे।
नानक झिरा साहिब का इतिहास || History of nanak jhira sahib
गुरूद्वारा नानक झिरा साहिब कर्नाटक राज्य के बीदर जिले में स्थित है। यह सिक्खों का पवित्र और ऐतिहासिक तीर्थ स्थान है। यह उस पठार के किनारे से थोडी दूरी पर है, जहां बीदर स्थित है। गुरूद्वारा की रोड़ से नीचे उतरने पर मैदान के व्यापक दृश्य दिखते है। प्रति वर्ष लगभग 4-5 लाख यात्री और पर्यटक लोग गुरूद्वारा नानक झिरा साहिब के दर्शन करने आते है। यहां प्रमुख आयोजनों और त्यौहारों के मेलों, के अलावा मार्च में होली, अक्टूबर में दशहरा और नवंबर में गुरू नानक जी की प्रकाश दिवस बडी धूमधाम से मनाया जाता है। इन अवसरों पर झिरा साहिब में यात्रियों की संख्या और अधिक बढ़ जाती है। अपनी दक्षिण भारत की दूसरी धर्म प्रचार यात्रा के दौरान सिक्खों के प्रथम गुरू , गुरू नानक देव जी ने नागपुर और खंडवा के अपने पड़ाव के बाद नर्मदा नदी पर प्राचीन हिन्दू मंदिर ओंकारेश्वर के दर्शन किए और नादेड़ पहुंचे। नांदेड़ से वह हैदराबाद और गोलकोंडा की ओर बढ़ गए, जहां वे मुस्लिम संतो से मिले और फिर जलालुद्दीन तथा याकूब अली से मिलने बीदर आए। गुरू साहिब अपने साथ भाई मरदाना के साथ बीदर के बाहरी इलाके में रूके जहां अब नानक झिरा गुरूद्वारा स्थित है, पास ही में मुस्लिम फकीरों की झोपडियां थी जो गुरू देव से शिक्षा और उपदेश लेने के लिए अति उत्सुक थे। शीघ्र ही यह खबर पूरे बीदर तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में फैल गई और उत्तर के पवित्र संत तथा लोग भारी संख्या में गुरू देव के पास आने लगे। बीदर के क्षेत्र में पीने के पानी की भारी कमी थी। लोगों ने पानी के लिए अनेक कुएँ खोदे लेकिन उनके सारे प्रयास विफल हो चुके थे। कुएँ से पानी निकलता भी था तो वह भी पीने लायक नहीं होता था। लोगों की इस दयनीय स्थिति ने गुरू नानक देव जी को द्रवित कर दिया। होठों पर दैवीय नाम और ह्रदय में दया से गुरू नानक देव जी ने अपने पैर से पहाड़ी को छुआ और उस स्थान से पत्थर को हटाया। पत्थर के हटाते ही सारे लोग आश्चर्य चकित हो गये। उस पत्थर के हटते ही उस स्थान से ठंडे और मिठे पानी की धारा निकलने लगी। शीघ्र ही उस स्थान को नानक झिरा कहा जाने लगा। उस धारा के किनारे एक सुंदर गुरूद्वारा बनवा दिया गया। अब उस धारा का पानी सफेद संगमरमर से बने एक छोटे अमृत कुंड में एकत्रित होता है। यहां एक रसोईघर जहाँ गुरू का लंगर तैयार होता है। जहां दिन रात चौबीस घंटे यात्रियों को मुफ्त भोजन दिया जाता है। गुरू नानक देव जी का जन्म दिवस और होली के उत्सव पर पूरे भारत से भारी संख्या में भक्त यहां आते है। वह स्थान जहां पर धारा निकलती है, वहां पर प्रबंधन ने भक्तों के योगदान से अमृत कुंड बनवा दिया है। धारा के जल से भरे पवित्र सरोवर मे भक्त डुबकी लगाते है। कहते है की झीरा साहिब सरोवर में स्नान करने से अधिकांश बिमारियों से मुक्ति मिलती है। श्री नानक झिरा साहिब का प्रबंधन अब यहा मुफ्त अस्पताल, इंजीनियरिंग कॉलेज, पालीटेक्निक और स्कूल भी संचालित करता है।
तख्त श्री हरमंदिर साहिब जी का इतिहास || History of takhat shri harmandir sahib ji
पटना का इतिहास हमेशा से ही गौरवशाली रहा है। इस धरती पर अनेकों महापुरुषों ने जन्म लेकर पटना की धरती को गौरान्वित करने का कार्य किया है। यह भूमि चाणक्य और आर्यभट्ट की रही है। यह स्थल ऋषियों मुनियों की जन्म भूमि और कर्मभूमि रही है। जिन्होंने इस स्थल पर अवतरित होकर समाज को सन्मार्ग पर चलना सिखाया। उन्ही महापुरुषों में गुरु गोबिन्द सिंह जी का नाम आता है। तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब के नाम से भी जाना जाता है। पटना साहिब सिखों के लिए अति पावन एतिहासिक धर्म-स्थल में से एक है। सिक्ख समुदाय के कुल पाँच प्रमुख तख्त हैं। इन तख्तों में गुरुद्वारा पटना साहिब की गिनती सिक्खों के दूसरे सबसे पवित्र तख्त के रूप में की जाती है। जैसा की हम जानते हैं की यह गुरुद्वारा सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु गुरुगोविंद सिंह जी को समर्पित है। इस गुरुद्वारा में गुरु गोविंद सिंह से जुड़ी हुई अनेक वस्तुएं रखी गयी है। यह वस्तुएं सिक्ख समुदाय और पर्यटक के आकर्षण का केंद्र बिंदु है। यह स्थान पटना जंक्शन से करीब 4 की मी की दूरी पर पटना सिटी इलाके में स्थित है। उन्हीं के नाम पर पटना सिटी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पटना साहिब रख दिया गया है। यही पर सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ था। उनका जन्म 26 दिसम्बर 1666 ईस्वी में शनिवार के दिन हुआ था। उनके बचपन का नाम गोबिन्द राय था। इस स्थल पर न केबल गुरुजी का जन्म हुआ था बल्कि उनका बचपन भी यहीं बीता था। इस गुरुद्वारे में गुरुजी के बचपन का पालना, तलवार, तीर कमान, बघनख खंजर आदि संरक्षित हैं। इसके अलाबा नवम गुरु तेग बहादुर जी महाराज के खड़ाऊँ भी पटना हरमंदिर साहिब में रखी हुई है। प्रतिवर्ष लाखों की संखया में सिक्ख समुदाय के लोग व पर्यटक इस एतिहासिक गुरुद्वारा का दर्शन करने पटना आते हैं। हालांकि गुरु गोबिन्द सिंह जी के बचपन इस स्थान पर बीता है। लेकिन इस स्थल का इतिहास गुरु गोबिन्द सिंह जी के साथ अन्य गुरुओं से भी सम्बद्ध रहा है। कहते हैं की इस स्थल का इतिहास गुरु नानक देव जी और गुर तेग बहादुर सिंह जी की यात्रा से जुड़ा हुआ है। कहते हैं की गुर तेग बहादुर सिंह यहाँ असम और बंगाल की यात्रा के दौरान रुके थे। कहते हैं की यह एरिया कभी कुचा फरुख खान के नाम से प्रसिद्ध था। लेकिन वर्तमान में यह हरमंदिर मुहल्ला के नाम से जाना जाता है। जब गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म पटना में हुआ था उस बक्त उनके पिता गुर तेग बहादुर सिंह जी महाराज असम की यात्रा पर थे। जिसका वर्णन सिक्खों के पवित्र ग्रंथ में भी उल्लेखित है। महाराजा रंजीत सिंह ने अखंड भारत के कई शहरों में एतिहासिक गुरुद्वारे का निर्माण कराया है। इस गुरुद्वारे का निर्माण भी महाराजा रंजीत सिंह ने गुरु गोबिन्द सिंह जी की यादगार में कराया था। इस गुरुद्वारा के निर्माण उन्होंने सन 1837 से 1839 के बीच कराया था। यह स्थान गुरु गोबिंद सिंह जी की जन्मभूमि होने के कारण सिख समुदाय के लिए अति पावन है। गुरुद्वारा श्री हरिमंदर जी पटना साहिब अपने अनुपम स्थापत्य कला के कारण पर्यटक का ध्यान आकर्षित करता है। गुंबदशैली में बना यह गुरुद्वारा सिक्ख स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण पेश करता है। इसके अलावा पटना में ही एक और प्रसिद्ध गुरुद्वारा स्थित है जो गुरुद्वारा हांडी साहिब के नाम से जाना जाता है। कहते हैं की यह स्थल गुरु तेग बहादुर जी महाराज से जुड़ी हुई हैं। इस स्थल पर गुरुजी को हांडी में पकाया हुआ खिचड़ी परोसा गया था।
हेमकुंड साहिब का इतिहास || History of hemkund sahib
भारत के उत्तराखंड राज्य में चमोली नामक जिले में हेमकुंड साहिब बना हुआ है। हेमकुंड साहिब पूरे भारत में सिख धर्म के लोगों का एक बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध तीर्थ स्थल माना जाता है । हेमकुंड साहिब हिमालय के अंदर 4632 मीटर यानी कि 15200 फुट की खड़ी ऊंचाई पर बनी बर्फीली झील के किनारे सात बड़ी चट्टानों वाली पहाड़ों के बीच बना हुआ है। कहा जाता है कि इन साथ पहाड़ों पर निशान साहिब झूलते हैं । यहां पर चढ़ाई करने के लिए आपको अपने पैरों का ही सहारा लेना पड़ेगा क्योंकि यहां पर कोई भी वहीकल नहीं चल पाता है । हेमकुंड साहिब तक पहुंचने के लिए आपको ऋषिकेश से बद्रीनाथ रास्ते पर बने हुए गोविंदघाट से होकर ही पहुंचा जा सकता है। श्री हेमकुंड साहिब जी वास्तव में एक संस्कृत का शब्द है अगर इसका हिंदी में अर्थ देखा जाए तो हेम का मतलब बर्फ से है और कुंड माने कटोरा है | हेमकुंड साहिब के यहां बोली जाने वाली भाषाएं मुख्यतः दो प्रकार की ही है जिनमें हिंदी और पंजाबी सम्मिलित है। हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे में पर्यटक भारत के अलावा भी अन्य देशों से लोग घूमने के लिए यहां आते हैं। यहां गुरुद्वारा हरदम विभिन्न प्रकार की लाइटों से सुशोभित रहता है। हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे का वर्णन सिख धर्म के ग्रंथों में किया गया है। साथ ही साथ इनका उल्लेख श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखित दसम ग्रंथ मैं भी आता है। जो लोग दसम ग्रंथ में अपनी श्रद्धा रखते हैं वह लोग पूरे विश्वास के साथ इस गुरुद्वारे में हर साल मत्था टेकने आते हैं। प्राचीन समय में श्री हेमकुंड साहिब में एक मंदिर बना हुआ करता था । जिसका निर्माण भगवान राम के छोटे भाई भगवान लक्ष्मण ने करवाया था । उसके बाद सिख धर्म के दसवें गुरुजी श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने इस मंदिर में कुछ साल पूजा अर्चना व तपस्या की थी। बाद में इस प्राचीन मंदिर को एक गुरुद्वारे के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया गया । श्री हेमकुंड साहिब हरदम चारों तरफ से बर्फीली चट्टानों से घिरा रहता है । यहां पर एक विशालकाय झील भी बनी हुई है जिसके अंदर बर्फ की ऊंची चोटियों का रोमांस से भरा हुआ प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है जिसे देखने से दिल में सुकून मिल जाता है । इस झील में हाथी पर्वत और सप्त ऋषि पर्वत की बर्फीली पहाड़ियों से पानी आता है । इसके साथ-साथ यहां पर एक छोटी जलधारा भी इस झील से निकलती है । जिस जलधारा को हिमगंगा के नाम से जाना जाता है । यहां पर झील के किनारे पर भगवान राम के अनुज श्री लक्ष्मण जी का मंदिर बना हुआ है। जो हेमकुंड साहब पर घूमने आते हैं वह लोग भी इस मंदिर पर जरूर ही घूमने आते हैं । यहां की पहाड़ी की ऊंचाई बड़ी होने के कारण तकरीबन 7 से 8 महीनों के अंदर अंदर यहां झील के अंदर बर्फ जम जाती है और झील का पानी फर्श नुमा आकार ले लेता है। श्री हेमकुंड साहिब जी के इस स्थान को बहुत ही पवित्र, असामान्य, आस्था का प्रतीक माना जाता है | यहां पर स्थानीय लोग जो आस पास रहते हैं उन लोगों को लोकपाल कहा जाता है जिसका सामान्य भाषा में अर्थ निर्वाहक से है।