हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पूरे साल में कई सारे पूर्णिमा तिथि खास रूप में पूजे जाते हैं। इस दिन विशेष प्रकार के पकवान बनाकर लोग खाते हैं और भगवान को याद करके उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इसी तरह हर साल शरद पूर्णिमा का भी त्योहार मनाया जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल अश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा करने का खास महत्तव है। आइए जानते हैं कि 2023 में शरद पूर्णिमा कब है। इस साल अश्विन मास की पूर्णिमा तिथि 28 अक्टूबर 2023, शनिवार को है। इसी दिन शरद पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाएगा। इस खास दिन पर भगवान सत्यनारायण के साथ चंद्रदेव और माता लक्ष्मी की पूजा करने का बहुत महत्तव है। # शुभ मुहूर्त की बात करें तो: – पूर्णिमा तिथि की शुरूआत-28 अक्टूबर 2023 सुबह 04:17 बजे – पूर्णिमा तिथि खत्म-29 अक्टूबर 2023 सुबह 01:53 बजे – चंद्रोदय ता शुभ समय-28 अक्टूबर 2023 शाम 05:47 बजे 28 अक्टूबर 2023 को शरद पूर्णिमा के साथ ही साल का दूसरा चंद्रग्रहण भी लगने जा रहा है। 28 अक्टूबर को रात 1:05 बजे से चंद्रग्रहण शुरू होगा। क्योंकि ये ग्रहण भारत में नजर आएगा इसलिए इसका सूतक काल 28 अक्टूबर की शाम 4:05 बजे से ही लग जाएगा। इसके चलते न तो ठाकुर जी को स्पर्श किया जा सकेगा और न उन्हें किसी प्रकार का भोग लगेगा। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। साथ ही इस दिन आसमान से अमृत की बरसात होती हैं। इसलिए इस दिन खीर बनाने का और उसे रात के समय खुले आसमान के नीचे रखने का खास महत्तव है। बाद में इस खीर का सेवन किसी अमृत के सेवन जैसा माना जाता है। # पूजा की विधि: – इस दिन खीर बनाकर किसी कांच या मिट्टी के बर्तन में ही रखें। – व्रत करें और किसी के लिए मन में द्वेष की भावना ना लाएं। – इस दिन खीर का भोग भगवान श्री कष्ण को जरुर लगाएं। – चंद्र देव की पूजा करें और इस मंत्र का जाप भी जरुर करें,’ऊं सोम सोमाय नम:’. (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) चंद्र ग्रहण के साए में मनाई जाएगी शरद पूर्णिमा, जानिए 2023 में किस दिन है। Sharad purnima will be celebrated under the shadow of lunar eclipse, know which day it is in 2023
दिवाली दी रात दीवे बालियन – Diwali di raat diwey balian
दिवाली दी रात दीवे बालियन तारे जात सनात अंबर भालियन फुलां दी बागात चुण चुण चालियन तीर्थ जाती जात नैण निहालीयन हरि-चंदौरी झात् वसाये उचालियन गुरमुख सुख फल दात सबद समालियन दिवाली दी रात दीवे बालियन – Diwali di raat diwey balian
वैष्णो देवी चालीसा – Vaishno devi chalisa
॥ दोहा॥ गरुड़ वाहिनी वैष्णवी त्रिकुटा पर्वत धाम काली, लक्ष्मी, सरस्वती, शक्ति तुम्हें प्रणाम ॥ चौपाई ॥ नमो: नमो: वैष्णो वरदानी, कलि काल मे शुभ कल्याणी। मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी, पिंडी रूप में हो अवतारी॥ देवी देवता अंश दियो है, रत्नाकर घर जन्म लियो है। करी तपस्या राम को पाऊँ, त्रेता की शक्ति कहलाऊँ॥ कहा राम मणि पर्वत जाओ, कलियुग की देवी कहलाओ। विष्णु रूप से कल्कि बनकर, लूंगा शक्ति रूप बदलकर॥ तब तक त्रिकुटा घाटी जाओ, गुफा अंधेरी जाकर पाओ। काली-लक्ष्मी-सरस्वती माँ, करेंगी पोषण पार्वती माँ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारे, हनुमत, भैरों प्रहरी प्यारे। रिद्धि, सिद्धि चंवर डुलावें, कलियुग-वासी पूजत आवें॥ पान सुपारी ध्वजा नारीयल, चरणामृत चरणों का निर्मल। दिया फलित वर मॉ मुस्काई, करन तपस्या पर्वत आई॥ कलि कालकी भड़की ज्वाला, इक दिन अपना रूप निकाला। कन्या बन नगरोटा आई, योगी भैरों दिया दिखाई॥ रूप देख सुंदर ललचाया, पीछे-पीछे भागा आया। कन्याओं के साथ मिली मॉ, कौल-कंदौली तभी चली मॉ॥ देवा माई दर्शन दीना, पवन रूप हो गई प्रवीणा। नवरात्रों में लीला रचाई, भक्त श्रीधर के घर आई॥ योगिन को भण्डारा दीनी, सबने रूचिकर भोजन कीना। मांस, मदिरा भैरों मांगी, रूप पवन कर इच्छा त्यागी॥ बाण मारकर गंगा निकली, पर्वत भागी हो मतवाली। चरण रखे आ एक शीला जब, चरण-पादुका नाम पड़ा तब॥ पीछे भैरों था बलकारी, चोटी गुफा में जाय पधारी। नौ मह तक किया निवासा, चली फोड़कर किया प्रकाशा॥ आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी, कहलाई माँ आद कुंवारी। गुफा द्वार पहुँची मुस्काई, लांगुर वीर ने आज्ञा पाई॥ भागा-भागा भैंरो आया, रक्षा हित निज शस्त्र चलाया। पड़ा शीश जा पर्वत ऊपर, किया क्षमा जा दिया उसे वर॥ अपने संग में पुजवाऊंगी, भैंरो घाटी बनवाऊंगी। पहले मेरा दर्शन होगा, पीछे तेरा सुमिरन होगा॥ बैठ गई माँ पिण्डी होकर, चरणों में बहता जल झर झर। चौंसठ योगिनी-भैंरो बर्वत, सप्तऋषि आ करते सुमरन॥ घंटा ध्वनि पर्वत पर बाजे, गुफा निराली सुंदर लागे। भक्त श्रीधर पूजन कीन, भक्ति सेवा का वर लीन॥ सेवक ध्यानूं तुमको ध्याना, ध्वजा व चोला आन चढ़ाया। सिंह सदा दर पहरा देता, पंजा शेर का दु:ख हर लेता॥ जम्बू द्वीप महाराज मनाया, सर सोने का छत्र चढ़ाया । हीरे की मूरत संग प्यारी, जगे अखण्ड इक जोत तुम्हारी॥ आश्विन चैत्र नवरात्रे आऊँ, पिण्डी रानी दर्शन पाऊँ। सेवक’ कमल’ शरण तिहारी, हरो वैष्णो विपत हमारी॥ ॥ दोहा ॥ कलियुग में महिमा तेरी, है माँ अपरंपार धर्म की हानि हो रही, प्रगट हो अवतार वैष्णो देवी चालीसा – Vaishno devi chalisa
लोध्रुवा जैन मंदिर का इतिहास – History of lodhruva jain temple
लोध्रुवा जैन मंदिर, जिसे लोध्रुवा के जैन मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, भारत के राजस्थान राज्य में जैसलमेर शहर के पास स्थित एक ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण मंदिर है। यह मंदिर ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व रखता है, और यह जैन आस्था को समर्पित है। माना जाता है कि लोध्रुवा जैन मंदिर का निर्माण 12वीं-13वीं शताब्दी में चालुक्य राजवंश के शासनकाल के दौरान हुआ था, जो वर्तमान राजस्थान के कुछ हिस्सों पर शासन करता था। मंदिर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है, जो जैन धर्म में 23वें तीर्थंकर (आध्यात्मिक शिक्षक) हैं। यह जैनियों के लिए एक महत्वपूर्ण पूजा स्थल है और अपनी जटिल नक्काशी और स्थापत्य सुंदरता के लिए जाना जाता है। मंदिर क्लासिक राजस्थानी वास्तुकला का प्रदर्शन करता है, जिसमें जटिल नक्काशीदार बलुआ पत्थर के खंभे, दीवारें और गुंबद हैं। मंदिर की वास्तुकला उस समय की शिल्प कौशल और बिल्डरों की कलात्मक प्रतिभा को दर्शाती है। लोध्रुवा जैनियों के लिए धार्मिक महत्व रखता है, क्योंकि इसे एक पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है। भक्त भगवान पार्श्वनाथ को श्रद्धांजलि देने और धार्मिक समारोहों और अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए मंदिर जाते हैं। अपने धार्मिक महत्व के अलावा, मंदिर ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। ऐसा कहा जाता है कि यह जैन श्वेतांबर तेरापंथ संप्रदाय के भट्टारक (आध्यात्मिक प्रमुख) की मूल सीट थी, बाद में इसे किसी अन्य स्थान पर ले जाया गया। सदियों से, लोध्रुवा जैन मंदिर को मौसम और क्षय की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालाँकि, अधिकारियों और विरासत संगठनों द्वारा इसकी वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत को पुनर्स्थापित और संरक्षित करने के प्रयास किए गए हैं। आज, लोध्रुवा जैन मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण भी है। पर्यटक इसकी आश्चर्यजनक वास्तुकला और क्षेत्र के शांत रेगिस्तानी परिवेश की ओर आकर्षित होते हैं। मंदिर राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत का एक हिस्सा है, और यह क्षेत्र के ऐतिहासिक और धार्मिक पहलुओं में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। यह ध्यान देने योग्य है कि कई प्राचीन मंदिरों की तरह, लोध्रुवा जैन मंदिर भी सदियों से गिरावट, जीर्णोद्धार और नवीनीकरण के दौर से गुजरा होगा। मंदिर के संपूर्ण इतिहास से संबंधित विस्तृत ऐतिहासिक अभिलेख आसानी से उपलब्ध नहीं हो सकते हैं, लेकिन मंदिर का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व आज भी कायम है। लोध्रुवा जैन मंदिर का इतिहास – History of lodhruva jain temple
लामायुरू मठ का इतिहास – History of lamayuru monastery
लामायुरू मठ, जिसे युरु गोम्पा के नाम से भी जाना जाता है, लद्दाख में सबसे पुराने और सबसे प्रमुख मठों में से एक है, जो भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य के सबसे उत्तरी भाग में एक क्षेत्र है। यह अपने आश्चर्यजनक स्थान, तिब्बती बौद्ध वास्तुकला और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। लामायुरू मठ की स्थापना 11वीं शताब्दी में भारतीय विद्वान और योगी नरोपा ने की थी। किंवदंती है कि नरोपा ने कई वर्षों तक इस क्षेत्र में ध्यान किया था, और वे गुफाएँ जहाँ उन्होंने अभ्यास किया था, आसपास की पहाड़ियों में अभी भी मौजूद हैं। इन गुफाओं को पवित्र माना जाता है और ये मठ परिसर का अभिन्न अंग हैं। लामायुरू मठ तिब्बती बौद्ध धर्म की ड्रिकुंग काग्यू परंपरा का पालन करता है। यह परंपरा ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास पर ज़ोर देती है। यह मठ सदियों से काग्यू परंपरा के अध्ययन और अभ्यास का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। मठ की वास्तुकला तिब्बती बौद्ध मठों की विशिष्ट है, जिसमें सफेद धुली हुई इमारतें और प्रार्थना झंडे संरचनाओं को सुशोभित करते हैं। यह अपने खूबसूरती से सजाए गए प्रार्थना कक्षों, भित्ति चित्रों और थांगका (धार्मिक चित्रों) के लिए जाना जाता है जो विभिन्न बौद्ध देवताओं और दृश्यों को दर्शाते हैं। लामायुरू मठ ने लद्दाख क्षेत्र में तिब्बती बौद्ध संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित और प्रचारित किया है। यह धार्मिक शिक्षाओं का भी केंद्र रहा है और पिछले कुछ वर्षों में इसने कई आध्यात्मिक नेताओं और विद्वानों की मेजबानी की है। मठ वार्षिक उत्सवों का आयोजन करता है, जिनमें सबसे प्रसिद्ध लामायुरू मठ महोत्सव (युरु कबग्यात) है। इस त्योहार के दौरान, भिक्षु पवित्र मुखौटा नृत्य करते हैं, और स्थानीय समुदाय संगीत, नृत्य और प्रार्थना के साथ जश्न मनाने के लिए इकट्ठा होते हैं। हिमालय के नाटकीय परिदृश्य के बीच इसके शांत और एकांत स्थान के कारण कई भिक्षु और अभ्यासी आध्यात्मिक विश्राम और ध्यान के लिए लामायुरू आते हैं। मठ और इसकी प्राचीन पांडुलिपियों का संरक्षण और संरक्षण इसके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न संगठनों और संस्थानों द्वारा किया गया है। लामायुरू मठ अपनी अनूठी वास्तुकला, सुरम्य स्थान और सांस्कृतिक महत्व के कारण एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। पर्यटक अक्सर मठ के चारों ओर के ऊबड़-खाबड़ चंद्र परिदृश्य को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं। लामायुरू मठ न केवल पूजा स्थल है बल्कि ज्ञान, कला और संस्कृति का भंडार भी है। यह तीर्थयात्रियों, विद्वानों और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करते हुए, लद्दाख क्षेत्र के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। लामायुरू मठ का इतिहास – History of lamayuru monastery
मान्यतानुसार इस तरह से जलाना चाहिए घर में दीया, नहीं तो रूठ सकती हैं मां लक्ष्मी – According to belief, lamps should be lit in the house in this manner, otherwise goddess lakshmi may get angry
हिंदू धर्म में दीया जलाना बहुत शुभ माना जाता है। पूजा-पाठ से लेकर मंदिरों और घर में सुबह शाम दीया जलाने की परंपरा है। सुबह स्नान और पूजा के बाद घर के मंदिर में और शाम को घर के दरवाजे और तुलसी के चौरे पर दीया जलाया जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है। दिया को जलाने के भी कुछ नियम होते हैं। इन नियमों का ठीक से पालन नहीं करने से पूजा-अर्चना का फल प्राप्त नहीं होता है और साथ ही धन की देवी लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं। आइए जानते हैं दीया जलाने के कुछ नियमों के बारे में। # दीया जलाने के नियम: * दिया जलाने का सही समय: दीया कभी भी बेवक्त नहीं जलाना चाहिए। किसी खास पूजा-पाठ के बाद दिया जलाया जा सकता है लेकिन बाकी दिनों में सुबह 5 बजे से 10 बजे तक और शाम को 5 बजे से 7 बजे तक का समय दीया जलाने के लिए सबसे अच्छा है। * किस दिशा में रखें दीया: दीया को किस दिशा में रखना चाहिए इसके कई नियम हैं। अगर दीया जलाने के लिए तेल का इस्तेमाल किया जा रहा है तो दीये को भगवान की मृर्ति के बाईं तरफ रखना चाहिए। अगर दीया घी से जला रहे हैं तो दीया हमेशा भगवान की मूर्ति के दाहिनी ओर रखना चाहिए। दीये को कभी भी पश्चिम दिशा नहीं रखना चाहिए। इससे सेहत को नुकसान और आर्थिक हानि हो सकती है। * खंडित दिया वर्जित: पूजा-पाठ या दरवाजे पर रखने के लिए कभी भी खंडित दीये का उपयोग नहीं करना चाहिए। खंडित दीया जलाने से हानि हो सकती है. हमेशा साफ-सुथरा और अच्छे से बने दीये का उपयोग करना चाहिए। * बत्ती का रखें ध्यान: दीया जलाने के लिए बत्ती के उपयोग का भी नियम है। अगर दीया घी से जला रहे हैं तो बत्ती हमेशा रूई की होनी चाहिए और अगर दीया तेल से जला रहे हैं तो कलावे की बत्ती का उपयोग करना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) मान्यतानुसार इस तरह से जलाना चाहिए घर में दीया, नहीं तो रूठ सकती हैं मां लक्ष्मी – According to belief, lamps should be lit in the house in this manner, otherwise goddess lakshmi may get angry
वास्तु शास्त्र के अनुसार ये तस्वीरें लगाएं, घर में आएगी सुख-शांति और जीवन होगा खुशहाल – According to vastu shastra, hang these pictures, happiness, peace will come in the house and life will be happy
मनुष्य अपने जीवन में सुख, शांति और धन प्राप्ति के लिए न जाने कौन-कौन से मार्ग अपनाते हैं। लेकिन क्या हो अगर आपको पता चले कि केवल कुछ तस्वीरें आपके जीवन में सुख, समृद्धि और धन का मार्ग खोल सकती हैं। यहां आप जानेंगे कि आपको घर में किस तरह के चित्र लगाने चाहिए जिससे आपके जीवन में शांति, समृद्धि और खुशहाली के साथ-साथ धन की भी बरसात होने लगे। तो चलिए जानते हैं घर में किन तस्वीरों को लगाना शुभ माना जाता है। # इन तस्वीरों को लगाना है शुभ: * राम दरबार: घर में जब ज्यादा सदस्य होते हैं तो सबके बीच मन- मुटाव या विवाद होना आम बात है। इसलिए श्री राम दरबार की तस्वीर लगाएं इससे घर में प्रजातंत्र की भावना प्रबल होती है और सभी का मान सम्मान करने की भावना आती है और परिवार के सदस्य के बीच प्रेम बढ़ता है। * मां लक्ष्मी: मां लक्ष्मी धन, दौलत और वैभव की प्रतीक है। इसलिए अगर आप घर में मां लक्ष्मी की तस्वीर लगाते हैं तो आपको कभी भी धन दौलत की कमी नहीं होगी। मां की आप पर विशेष कृपा बनेगी। * दौड़ते घोड़े की तस्वीर: अगर आप अपने घर की खिड़की पर दौड़ते घोड़े की तस्वीर लगते हैं तो ये नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा लाने का काम करते हैं। * मां सरस्वती की तस्वीर: सनातन धर्म में देवी सरस्वती को विद्या, बुद्धि, ज्ञान और विवेक की देवी माना जाता है। ऐसे में अगर आप सरस्वती मां की तस्वीर घर में लगाएंगे तो आपका विवेक हमेशा बना रहेगा। * स्वान: अगर आप अपने घर में अपार धन और समृद्धि चाहते हैं तो हंस की बड़ी सी तस्वीर जरूर लगाएं। माना जाता है कि इससे व्यक्ति हमेशा खुश रहता है और धन प्राप्ति के मार्ग खुलते हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) वास्तु शास्त्र के अनुसार ये तस्वीरें लगाएं, घर में आएगी सुख-शांति और जीवन होगा खुशहाल – According to vastu shastra, hang these pictures, happiness, peace will come in the house and life will be happy
यशोदा का नंदलाला – Yashoda ka nandlala
यशोदा का नंदलाला, ब्रिज का उजाला हैं मेरे लाल से तो सारा, जग झीलमिलाए रात ठंडी ठंडी हवा गा के सुलाए भोर गुलाबी पलके झूम के जगाए यशोदा का नंदलाला… सोते सोते गहरी नींद में मुन्ना क्यू मुस्काये पुछो मुझसे मैं जानू इसको क्या सपना आए जुग जुग से ये लाल है अपना हर पल देखे बस यही सपना जूजू जूजू जू…. जब भी जनम ले मेरी गोद में आए मेरे लाल से तो सारा जग झील मिलाए यशोदा का नंदलाला… मेरी उंगली थाम के जब ये घर आँगन में डोले मेरे मन में सोई सोई ममता आँखे खोले चुपके चुपके मुझको देखे जैसे ये मेरे मन में झाँके जूजू जूजू जू…. चेहरे से आँखे नहीं हटती हटाए मेरे लाल से तो सारा जग झील मिलाए रात ठंडी ठंडी हवा, गा के सुलाए भोर गुलाबी पलके, झूम के जगाए यशोदा का नंदलाला… यशोदा का नंदलाला – Yashoda ka nandlala
अब्राम के साथ भगवान की वाचा की कहानी – The story of god’s covenant with abram
अब्राम के साथ भगवान की वाचा की कहानी बाइबिल के पुराने नियम में एक महत्वपूर्ण घटना है, विशेष रूप से उत्पत्ति की पुस्तक, अध्याय 15 और 17 में। यह उस वादे को रेखांकित करती है जो भगवान ने अब्राम से किया था, जो बाद में अब्राहम के रूप में जाना जाने लगा, और वह वाचा जिसने परमेश्वर और कुलपिता के बीच एक विशेष संबंध स्थापित किया। अब्राम एक धर्मी व्यक्ति था जिसे परमेश्वर ने एक महान राष्ट्र का पिता बनने के लिए चुना। उत्पत्ति 12 में, परमेश्वर ने अब्राम को अपनी मातृभूमि छोड़ने और उस देश में जाने के लिए बुलाया जो परमेश्वर उसे दिखाएगा। उत्पत्ति 15 में, जब अब्राम ने परमेश्वर के आह्वान का पालन करके महान विश्वास और आज्ञाकारिता प्रदर्शित की, तो प्रभु ने उसे एक दर्शन में दर्शन दिए। परमेश्वर ने अब्राम को आश्वासन दिया कि वह उसे आकाश के तारों के समान असंख्य वंशज प्रदान करेगा, भले ही अब्राम और उसकी पत्नी सारै निःसंतान और बुजुर्ग थे। अपने वादे की पुष्टि करने के लिए, परमेश्वर ने अब्राम को एक वाचा अनुष्ठान तैयार करने का निर्देश दिया। अब्राम ने विशिष्ट जानवरों को लिया, उन्हें आधे में काट दिया, और उन्हें पथ के रूप में व्यवस्थित किया। यह प्राचीन काल में अनुबंध करने का एक पारंपरिक तरीका था। जब अब्राम बँटे हुए जानवरों के टुकड़ों के पास इंतज़ार कर रहा था, तो उस पर गहरी नींद और भयानक अंधेरा छा गया। ईश्वर स्वयं उन टुकड़ों के बीच से गुजरे, जो वाचा की गंभीरता और अटूट प्रकृति का प्रतीक थे। इसका मतलब यह था कि अब्राम के कार्यों की परवाह किए बिना, परमेश्वर वाचा को पूरा करने की पूरी ज़िम्मेदारी ले रहा था। परमेश्वर ने अब्राम को अनेक वंशजों का वादा दोहराया और बताया कि उसके वंशज 400 वर्षों तक एक विदेशी भूमि में अजनबी रहेंगे, लेकिन अंततः वादा की गई भूमि के उत्तराधिकारी होंगे। उत्पत्ति 17 में, परमेश्वर अब्राम के सामने फिर से प्रकट हुए और एक वाचा बाँधी जिसमें नाम परिवर्तन भी शामिल था। परमेश्वर ने अब्राम का नाम बदलकर इब्राहीम रख दिया, जिसका अर्थ है “कई राष्ट्रों का पिता”, जो कई वंशजों के वादे की पूर्ति को दर्शाता है। परमेश्वर ने खतना को वाचा के चिन्ह के रूप में स्थापित किया। इब्राहीम के घर के प्रत्येक पुरुष का, जिसमें वह भी शामिल था, ईश्वर के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और वाचा में भागीदारी के बाहरी चिह्न के रूप में खतना किया जाना था। परमेश्वर ने यह भी वादा किया कि सारा, इब्राहीम की पत्नी, एक बेटे को जन्म देगी, भले ही वह बुजुर्ग थी। उन्हें उसका नाम इसहाक रखना था, और परमेश्वर की वाचा इसहाक के वंशजों के माध्यम से जारी रहेगी। इब्राहीम के साथ भगवान की वाचा की कहानी यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम सहित इब्राहीम धर्मों की नींव है। यह ईश्वर की विश्वसनीयता, उनके चुने हुए लोगों और ईश्वरीय वादे का प्रतिनिधित्व करता है जो बाइबिल की कथा में एक केंद्रीय भूमिका निभाता है। इब्राहीम की ईश्वर की पुकार पर भरोसा करने और उसका पालन करने की इच्छा को विश्वासियों के लिए विश्वास के एक मॉडल के रूप में भी देखा जाता है। अब्राम के साथ भगवान की वाचा की कहानी – The story of god’s covenant with abram
पार्श्वनाथ मंदिर का इतिहास – History of parshvanath temple
पार्श्वनाथ मंदिर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के खजुराहो शहर में स्थित एक महत्वपूर्ण जैन मंदिर है। यह खजुराहो के स्मारकों के समूह में से एक है, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है जो अपनी उत्कृष्ट मंदिर वास्तुकला और जटिल मूर्तियों के लिए जाना जाता है। पार्श्वनाथ मंदिर, खजुराहो के कई अन्य मंदिरों की तरह, चंदेल राजवंश के शासन के दौरान बनाया गया था, जो 9वीं और 13वीं शताब्दी के बीच फला-फूला। अनुमान है कि इसका निर्माण 10वीं शताब्दी में हुआ था। मंदिर पार्श्वनाथ को समर्पित है, जो जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर (आध्यात्मिक शिक्षक) हैं। जैनियों द्वारा पार्श्वनाथ को अहिंसा, सत्य और आत्म-अनुशासन की शिक्षाओं के लिए सम्मानित किया जाता है। यह मंदिर जैनियों का पूजा स्थल और तीर्थस्थल है। पार्श्वनाथ मंदिर नागर शैली की मंदिर वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसकी विशेषता इसके ऊंचे शिखर और जटिल पत्थर की नक्काशी है। मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर का उपयोग करके किया गया है, जो इस क्षेत्र में एक आम निर्माण सामग्री है, और इसमें एक गर्भगृह, एक बरोठा और एक मंडप (हॉल) है। गर्भगृह में पार्श्वनाथ की एक छवि है। मंदिर अपनी आश्चर्यजनक मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है जो इसकी दीवारों को सुशोभित करती हैं। मंदिर की बाहरी दीवारें जैन पौराणिक कथाओं के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती जटिल नक्काशी से सजी हैं, जिनमें तीर्थंकरों की छवियां, दिव्य प्राणी और तीर्थंकरों के जीवन के दृश्य शामिल हैं। कई प्राचीन स्मारकों की तरह, पार्श्वनाथ मंदिर में भी अपनी स्थापत्य और कलात्मक विरासत को संरक्षित करने के लिए वर्षों से जीर्णोद्धार और संरक्षण के प्रयास किए गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने खजुराहो में मंदिर परिसर और अन्य स्मारकों के रखरखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पार्श्वनाथ मंदिर खजुराहो में मंदिरों के बड़े परिसर का हिस्सा है, जिसमें हिंदू और जैन दोनों मंदिर शामिल हैं। ये मंदिर सामूहिक रूप से भारतीय कला और वास्तुकला के एक महत्वपूर्ण काल का प्रतिनिधित्व करते हैं और दुनिया भर से पर्यटकों और कला प्रेमियों को आकर्षित करते हैं। 1986 में, पार्श्वनाथ मंदिर सहित खजुराहो के मंदिरों को उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को पहचानते हुए यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित किया गया था। खजुराहो में पार्श्वनाथ मंदिर चंदेल राजवंश की वास्तुकला और कलात्मक उपलब्धियों और भारत में जैन धर्म की स्थायी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रमाण के रूप में खड़ा है। यह प्राचीन भारतीय कला और धर्म में रुचि रखने वालों के लिए तीर्थस्थल और प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। पार्श्वनाथ मंदिर का इतिहास – History of parshvanath temple