जय देने वाले, प्रभु यीशु को कोटि कोटि धन्यवाद जीवन देने वाले प्रभु यीशु को जीवन भर धन्यवाद हल्लेलुयाह, हल्लेलुयाह गायेंगे आत्मा से भर कर गायेंगे -2. यीशु ज़िदा है वो आने वाला है -2. शांति देने वाले प्रभु यीशु को कोटि कोटि धन्यवाद मुक्ति देने वाले प्रभु यीशु को जीवन भर धन्यवाद चंगा करने वाले प्रभु यीशु को कोटि कोटि धन्यवाद आनंद देने वाले प्रभु यीशु को जीवन भर धन्यवाद जीवन देने वाले प्रभु यीशु को कोटि कोटि धन्यवाद तृप्ति देने वाले प्रभु यीशु को जीवन भर धन्यवाद
मुक्ति दिलाये येशु नाम || Mukti dilaye yeshu naam
मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम चरणी में तूने जन्म लिया येशु, चरणी में तूने जन्म लिया येशु क्रूस पे हुआ बलिदान, क्रूस पे हुआ बलिदान मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम क्रूस पर अपना खून बहाया, क्रूस पर अपना खून बहाया सारा चुकाया दाम, सारा चुकाया दाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम येशु दया का बहता सागर, येशु दया का बहता सागर येशु है दाता महान, येशु है दाता महान मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम हम सब के पापों को मिटाने, हम सब के पापों को मिटाने येशु हुआ बलिदान, येशु हुआ बलिदान मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम हम पर भी येशु कृपा करना, हम पर भी येशु कृपा करना हम है पापी नादान, हम है पापी नादान मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम
खाटू श्याम जी की आरती || Khatu shyam ji ki aarti
ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे। खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ रतन जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे । तन केसरिया बागो, कुण्डल श्रवण पड़े ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ गल पुष्पों की माला, सिर पार मुकुट धरे । खेवत धूप अग्नि पर, दीपक ज्योति जले ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे । सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ झांझ कटोरा और घडियावल, शंख मृदंग घुरे । भक्त आरती गावे, जय-जयकार करे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ जो ध्यावे फल पावे, सब दुःख से उबरे । सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम-श्याम उचरे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे । कहत भक्त-जन, मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ जय श्री श्याम हरे, बाबा जी श्री श्याम हरे । निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥
संतोषी माता की आरती || Santoshi mata ki aarti
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता । अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हों । हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हों ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे । मंदर हंसत करूणामयी, त्रिभुवन मन मोहे ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारे । धूप, दीप,नैवैद्य,मधुमेवा, भोग धरें न्यारे ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामें संतोष कियो। संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही । भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई । विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै । जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ दुखी,दरिद्री ,रोगी , संकटमुक्त किए । बहु धनधान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो । पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे । संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे । ॠद्धिसिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
लक्ष्मी माता की आरती || Laxmi mata ki aarti
ॐ जय लक्ष्मी माता, तुमको निस दिन सेवत, मैया जी को निस दिन सेवत हर विष्णु विधाता || ॐ जय || उमा रमा ब्रम्हाणी, तुम ही जग माता ओ मैया तुम ही जग माता सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता || ॐ जय || दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पति दाता ओ मैया सुख सम्पति दाता जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता || ॐ जय || तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभ दाता ओ मैया तुम ही शुभ दाता कर्म प्रभाव प्रकाशिनी, भव निधि की दाता || ॐ जय || जिस घर तुम रहती तहँ सब सदगुण आता ओ मैया सब सदगुण आता सब सम्ब्नव हो जाता, मन नहीं घबराता || ॐ जय || तुम बिन यज्ञ न होता, वस्त्र न कोई पाता ओ मैया वस्त्र ना पाटा खान पान का वैभव, सब तुम से आता || ॐ जय || शुभ गुण मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि जाता ओ मैया क्षीरोदधि जाता रत्ना चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता || ॐ जय || धुप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो मैया माँ स्वीकार करो ज्ञान प्रकाश करो माँ, मोहा अज्ञान हरो || ॐ जय || महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता ओ मैया जो कोई गाता उर आनंद समाता, पाप उतर जाता || ॐ जय ||
लक्ष्मीनारायण मंदिर का इतिहास || History of laxminarayan temple
नई दिल्ली में स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण 1933 में शुरू हुआ था। इस मंदिर का निर्माण उद्योगपति और समाजसेवी बलदेव दास बिड़ला और बिड़ला परिवार के सदस्य उनके बेटे जुगल किशोर बिड़ला द्वारा किया गया था। इसी कारण इस मंदिर को बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की आधारशिला जाट महाराज उदयभानु सिंह ने रखी थी। मंदिर के निर्माण कार्य पंडित विश्वनाथ शास्त्री जी के दिशा निर्देश में हुआ। इस मंदिर का उद्घाटन सन 1939 ईस्वी महात्मा गांधी जी द्वारा किया गया था। उद्घाटन करते समय महात्मा गांधी जी ने एक शर्त रखी थी कि यह मंदिर उच्च जाति के हिंदुओं तक ही सीमित नहीं होगा इस मंदिर के अंदर सभी जतियों के लोग जा सकते है। यह मंदिर बिरलाओं द्वारा बनाया गया पहला मंदिर है। जिसे बिरला मंदिर भी कहा जाता ह लक्ष्मीनारायण मंदिर की वास्तुकला को हिंदू मंदिर वास्तुकला की नागर शैली के अनुसार बनाया गया है। मंदिर के प्रमुख वास्तुकार श्री चंद्र चटर्जी थे। जो आधुनिक भारतीय वास्तुकला आंदोलन के भी एक प्रमुख प्रस्तावक थे। लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर 7 एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ है। इस मंदिर में 3 मंजिलें हैं और मंदिर का सबसे ऊंचा शिखर लगभग 160 फीट ऊंचा है। मंदिर के ऊपर का चक्र सुंदर दृश्यों को दर्शाती हुई नक्काशीओं से सुशोभित है। यह मंदिर स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित था। इस मंदिर को बनाने के लिए आचार्य विश्वनाथ शास्त्री के नेतृत्व में सौ से अधिक कारीगरों ने बनाया था। बिड़ला मंदिर के मुख्य भगवान लक्ष्मी नारायण की मूर्तियों का निर्माण उच्च गुणवत्ता वाले संगमरमर से किया गया है, जो जयपुर से लाई गई थी। आगरा, कोटा और मकराना से लाये गए पत्थरों से इस मंदिर का निर्माण किया गया है। बिरला मंदिर के परिसर में अन्य भगवानों के मंदिर भी हैं। मंदिर परिसर में एक बहुत विशाल गीता भवन भी स्थित है, जिसका उपयोग व्याख्यान कक्ष के रूप में किया जाता है। इस परिसर में सुंदर उद्यान और झरने भी विराजमान हैं, जो इस मंदिर के आकर्षण को बढ़ाते हैं।
स्वर्ण मंदिर का इतिहास || History of golden temple
अमृतसर में स्थित विश्वप्रसिद्ध इस स्वर्ण मंदिर का इतिहास 400 से भी ज्यादा सालों से पुराना है। इस मंदिर के निर्माण के लिए चौथे सिख गुर रामदास साहिब जी ने कुछ जमीन दान दी थी, जबकि प्रथम सिख गुरु नानक और पांचवे सिख गुरु अर्जुन साहिब ने गोल्डन टेम्पल की अनूठी वास्तुकला की डिजाइन तैयार की थी। जिसके बाद 1577 ईसवी में इस मंदिर का निर्माण काम शुरु किया गया था। इसके बाद अर्जुन देव जी ने बाद में इसके अमृत सरोवर को पक्का करवाने का काम करवाया। आपको बता दें कि इस प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर का निर्माण पवित्र टंकी के बीचों-बीच यानि की तालाब के बीच किया गया है, जिसमें बाद में सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को भी स्थापित किया गया है। सिख धर्म के इस पवित्र तीर्थस्थल के अंदर ही एक अकाल तख्त भी स्थित है, जिसे सिख धर्म के छठवें गुरु हरगोविंद जी का घर माना जाता है। आपको बता दें कि 1604 ईसवी में इस मंदिर का निर्माण काम पूरा कर लिया गया था, हालांकि इस मंदिर पर कई बार आक्रमण किए गए, जिससे इस मंदिर की इमारत को काफी नुकसान पहुंचा। लेकिन बाद में फिर सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने इस मंदिर का फिर से निर्माण करवाया और इसे वर्तमान स्वरूप देने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपको बता दें आहूवालिया खालसा दल के कमांडर और मिसल के प्रमुख सरदार थे।
बंगला साहिब गुरुद्वारा का इतिहास || History of bangla sahib gurdwara
गुरुद्वारा बंगला साहिब असल में एक बंगला है, जो 17 वी शताब्दी के भारतीय शासक, राजा जय सिंह का था और जयसिंह पुर में, जयसिंहपुर पैलेस के नाम से जाना जाता था। इसके बाद कनौट पैलेस बनाने के लिये शासको ने अपने पडोसी राज्यों को ध्वस्त किया था। आठवे सिक्ख गुरु, गुरु हर कृष्ण 1664 में दिल्ली में रहते समय यहाँ रुके थे। इस समय, चेचक और हैजा की बीमारी से लोग पीड़ित थे और गुरु हर कृष्ण ने बीमारी से पीड़ित लोगो की सहायता उनका इलाज कर और उन्हें शुद्ध पानी पिलाकर की थी। जल्द ही उन्हें भी बीमारियों ने घेर लिया था और अचानक 30 मार्च 1664 को उनकी मृत्यु हो गयी। इस घटना के बाद राजा जय सिंह ने एक छोटे पानी के टैंक का निर्माण जरुर करवाया था। यह गुरुद्वारा और यहाँ का सरोवर सिक्खों के लिए एक श्रद्धा का स्थल है और हर साल गुरु हर कृष्ण की जयंती पर यहाँ विशेष मण्डली का आयोजन किया जाता है। इस भूमि पर गुरूद्वारे के साथ-साथ एक रसोईघर, बड़ा तालाबं एक स्कूल और एक आर्ट गैलरी भी है। और बाकी सभी दुसरे सिक्ख गुरुद्वारों की तरह यहाँ भी लंगर है, और सभी धर्म के लोग लंगर भवन में खाना खाते है। लंगर (खाने को) गुरसिख द्वारा बनाया जाता है, जो वहाँ काम करते है और साथ ही उनके साथ कुछ स्वयंसेवक भी होते है, जो उनकी सहायता करते है। गुरुद्वारा में दर्शनार्थियों को अपने सिर के बालो को ढँक देने के लिए और जूते ना पहनकर आने के लिए कहा जाता है। विदेशियों और दर्शनार्थीयो की सहायता के लिए गाइड भी होते है, जो बिना कोई पैसे लिए लोगो की सहायता करते है। गुरुद्वारा के बाहर सिर का स्कार्फ हमेशा रखा होता है, लोग उसका उपयोग अपने सिर को ढकने के लिए भी कर सकते है। स्वयंसेवक दिन-रात दर्शनार्थीयो की सेवा करते रहते है और गुरूद्वारे को स्वच्छ रखते है। वर्तमान में गुरूद्वारे और लंगर हॉल में एयर कंडीशनर भी लगाये गये है। और नये “यात्री निवास” और मल्टी-लेवल पार्किंग जगह का निर्माण भी किया गया है। वर्तमान में टॉयलेट की सुविधा भी उपलब्ध है। गुरूद्वारे के पिछले भाग को भी ढक दिया गया है, ताकि सामने से गुरुद्वारा काफी अच्छा दिखे।
हनुमान जी की आरती || Hanuman ji ki aarti
आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ जाके बल से गिरवर काँपे । रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई । संतन के प्रभु सदा सहाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ दे वीरा रघुनाथ पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाये ॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ लंका जारि असुर संहारे । सियाराम जी के काज सँवारे ॥ लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे । लाये संजिवन प्राण उबारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ पैठि पताल तोरि जमकारे । अहिरावण की भुजा उखारे ॥ बाईं भुजा असुर दल मारे । दाहिने भुजा संतजन तारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें । जय जय जय हनुमान उचारें ॥ कंचन थार कपूर लौ छाई । आरती करत अंजना माई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ जो हनुमानजी की आरती गावे । बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥ लंक विध्वंस किये रघुराई । तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
श्री रामचंद्र जी की आरती || Sri ramchandra ji ki aarti
श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं । नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥ कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं । पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नोमि जनक सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं । रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥ शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं । आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं । मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं ॥५॥ मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो । करुणा निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो ॥६॥ एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषित अली। तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥ जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल वाम अङ्ग फरकन लगे। रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास