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देवो के देव महादेव जी की कहानी

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देवो के देव महादेव जी की कहानी शंकर या महादेव आरण्य संस्कृति जो आगे चल कर सनातन शिव धर्म नाम से जाने जाते है में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है।[1] हिन्दू शिव घर्म शिव-धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय , अय्यपा और गणेश हैं, तथा पुत्रियां अशोक सुंदरी , ज्योति और मनसा देवी हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। यह शैव मत के आधार है। इस मत में शिव के साथ शक्ति सर्व रूप में पूजित है। अन्य नाम नीलकंठ, महादेव, शंकर, पशुपतिनाथ, नटराज, त्रिनेत्रधारी, भोलेनाथ, रुद्रशिव, कैलाशी , अर्धनारेश्नर, सिंघेश्वर, बैद्यनाथ , रुद्र , भैरव , विष्णु आदि संबंध हिन्दू देवता, परब्रह्म, परमात्मा, परमेश्वर निवासस्थान कैलाश पर्वत मंत्र ॐ नमः शिवाय अस्त्र त्रिशूल, पिनाक धनुष,डमरु, परशु और पशुपतास्त्र जीवनसाथी पार्वती (सती का पुनर्जन्म) और सती भाई-बहन सरस्वती (छोटी बहन) संतान कार्तिकेय ,गणेश , अशोकसुन्दरी , अय्यपा, मनसा देवी और ज्योति सवारी नंदी शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंंकर जी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदि स्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि इनके भक्त हुए है। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है। शिव के कुछ प्रचलित नाम, महाकाल, आदिदेव, किरात, शंकर, चन्द्रशेखर, जटाधारी, नागनाथ, मृत्युंजय [मृत्यु पर विजयी], त्रयम्बक, महेश, विश्वेश, महारुद्र, विषधर, नीलकण्ठ, महाशिव, उमापति [पार्वती के पति], काल भैरव, भूतनाथ, ईवान्यन [तीसरे नयन वाले], शशिभूषण आदि। भगवान शिव को रूद्र नाम से जाता है रुद्र का अर्थ है रुत दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला अतः भगवान शिव का स्वरूप कल्याण कारक है। रुद्राष्टाध्याई के पांचवी अध्याय में भगवान शिव के अनेक रूप वर्णित है रूद्र देवता को स्थावर जंगम सर्व पदार्थ रूप सर्व जाति मनुष्य देव पशु वनस्पति रूप मानकर के सराव अंतर्यामी भाव एवं सर्वोत्तम भाव सिद्ध किया गया है इस भाव से ज्ञात होकर साधक अद्वैत निष्ठ बनता है। पवित्र शिव पुराण एक लेख के अनुसार, कैलाशपति शिव जी ने देवी आदिशक्ति और सदाशिव से कहे है कि हे मात! ब्रह्मा तुम्हारी सन्तान है तथा विष्णु की उत्पति भी आप से हुई है तो उनके बाद उत्पन्न होने वाला में भी आपकी सन्तान हुआ। ब्रह्मा और विष्णु सदाशिव के आधे अवतार है, परंतु कैलाशपति शिव “सदाशिव” के पूर्ण अवतार है। जैसे कृष्ण विष्णु के पूर्ण अवतार है उसी प्रकार कैलाशपति शिव “ओमकार सदाशिव” के पूर्ण अवतार है। सदाशिव और शिव दिखने में, वेषभूषा और गुण में बिल्कुल समान है। इसी प्रकार देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती (दुर्गा) आदिशक्ति की अवतार है। शिव पुराण के लेख के अनुसार सदाशिव जी कहे है कि जो मुझमे और कैलाशपति शिव में भेद करेगा या हम दोनों को अलग मानेगा वो नर्क में गिरेगा । या फिर शिव और विष्णु में जो भेद करेगा वो नर्क में गिरेगा। वास्तव में मुझमे, ब्रह्मा, विष्णु और कैलाशपति शिव कोई भेद नहीं हम एक ही है। परंतु सृष्टि के कार्य के लिए हम अलग अलग रूप लेते है । शिव स्वरूप शंकर जी पृथ्वी पर बीते हुए इतिहास में सतयुग से कलयुग तक, एक ही मानव शरीर एैसा है जिसके ललाट पर ज्योति है। इसी स्वरूप द्वारा जीवन व्यतीत कर परमात्मा ने मानव को वेदों का ज्ञान प्रदान किया है जो मानव के लिए अत्यंत ही कल्याणकारी साबित हुआ है। वेदो शिवम शिवो वेदम।। परमात्मा शिव के इसी स्वरूप द्वारा मानव शरीर को रुद्र से शिव बनने का ज्ञान प्राप्त होता है। शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि पूजन शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, पुष्प, चन्दन का स्नान प्रिय हैं। इनकी पूजा के लिये दूध, दही, घी, गंगाजल, शहद इन पांच अमृत जिसे पञ्चामृत कहा जाता है, से की जाती है। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबंधित हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है। सावन सोमवार व्रत को काफी फलदायी बताया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है।[8] महाशिवरात्रि का व्रत अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए करते हैं। इस व्रत को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विधि से मनाया जाता है ॐ नमो शिवाय नमो नमः हर हर महादेव शिव शंभू

July 18, 2022 / 0 Comments
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माता ज्वाला जी मंदिर का इतिहास

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माता ज्वाला जी मंदिर का इतिहास हिन्दू लोग अपने सभी देवी देवताओं की पूजा बहुत ही श्रद्धा और विधि विधान से करते हैं । यह पर स्थित हर मंदिर की अपनी एक कहानी और अपना इतिहास है आज में आपको एक ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बताने जा रही हूँ । आज में जिस मंदिर के बारे में बताने जा रही हु यह मंदिर 51 शक्ति पीठो में से एक है और इस मंदिर का नाम है ज्वाला माता मंदिर। माता ज्वाला देवी का यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कागड़ा जिले में स्थित हैं । कहा जाता हैं कि जब माता सती का जला हुआ शरीर लेकर भगवान शिव ब्रह्माण्ड में इधर उधर घूम रहे थे तभी माता के शरीर से उनकी जीभा इसी स्थान पर गिरी थी इसी कारण से इस स्थान का नाम ज्वाला देवी मंदिर पडा । इस मंदिर को जोता वाली माता का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता हैं । इस मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवो को जाता हैं । मंदिर मैं माता की कोई भी मूर्ति स्थापित नहीं है अपितु माता यह स्वयं ज्वाला के रूप में उपस्थित है यहां पर माता का दर्शन ज्योति के रुप मे होते है ।जो हजारों सालों से यह इसी रूप में प्रज्वलित हैं । इस मंदिर से जुडी कुछ कथाए और मान्यताये है  कहानी कुछ इस तरह है की भगवान शिव की शादी माता सती से हुई थी माता सती के पिता का नाम राजा दक्ष था वो भगवान शिव को अपने बराबर नहीं मानता था | एक बार महाराज दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया उन्होंने सभी देवी देवताओं की निमंत्रण भेजा किन्तु भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा गया | यह देखकर माता सती को बहुत क्रोध आया और उन्होंने वह जाकर अपने पिता से इस अपमान का कारण पूछने के लिए उन्होंने शिव भगवान से वह जाने की आज्ञा मांगी किन्तु भगवान शिव ने उन्हें वह जाने से मना की किन्तु माता सती के बार बार आग्रह करने पर शिव भगवान ने उन्हें जाने दिया | जब बिना बुलाए यज्ञ में पहुंची तो उनके पिता दक्ष ने उन्हें काफी बुरा भला कहा और साथ ही साथ भगवान शिव के लिए काफी बुरी भली बातें कही जिसे माता सती सहन नहीं कर पाई और उन्होंने उसी यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी | यह देख कर भगवान शिव को बहुत क्रोध आया और उन्होंने माता सती का जला हुआ शरीर अग्नी कुंड से उठा कर चारों और तांडव करने लग गये जिस कारण सारे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया यह देख कर लोग भगवान विष्णु के पास भागे तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े किये ये टुकड़े जहाँ जहाँ गिरे वह पर शक्ति पीठ बन गए |इसी स्थान पर माता के शरीर से उनकी जीभा थी इसी कारण से इस स्थान का नाम ज्वाला देवी मंदिर पडा । इस मंदिर को जोता वाली माता का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता हैं । पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल मे माँ के एक बहुत ही प्रिय भक्त थे गुरु गोरखनाथ जी । जो माँ की पूजा अर्चना बहुत ही विधि विधान से ओर दिल से करता था एक बार गोरखनाथ को भूख लगी तब उसने माता से कहा कि आप आग जलाकर पानी गर्म करे , में भिक्षा मांगकर लाता हू। माँ ने भक्त के कहे अनुसार आग जलाकर पानी गर्म किया और गुरु गोरखनाथ का इंतजार करने लगी पर गोरखनाथ जी आज तक कभी लौट कर नही आए कहा जाता है कि माँ आज भी ज्वाला जलाकर अपने भक्त का इंतजार कर रही हैं । कहा जाता हैं कि कालांतर में इस स्थान को व्यवस्थित किया गुरु गोरखनाथ जी ने । यह पर प्रज्वलित माता की ये ज्वाला प्रकृति नही अपितु बहुत चमत्कारी है । माता के मंदिर के ऊपर की और जाने पर गुरु गोरखनाथ जी का मंदिर हैं जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है । माता के मंदिर माता के 51 शक्ति पीठो में से एक है । जिन सभी की उत्पत्ति की कथा एक ही है यह पर स्थित सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुए है । इन सभी स्थलो पर माता सती के अंग गिरे थे । इस मंदिर से जुड़ी एक और कथा है  कहा जाता हैं कि सतयुग में महाकाली के परम भगत राजा भूमिचन्द को माता का स्वपन में साक्षात्कार हुआ । जिसे प्रेरित होकर राजा ने यह पर एक सुंदर से मंदिर का निर्माण किया। बाद में महराजा रणजीत सिंह और रस्सज संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का निर्माण कराया । इस मंदिर के अंदर माता की नो ज्योतियां हैं जिनमें महाकाली , अनपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता हैं। माता से जुड़ी एक और कथा जो काफी प्रचलित है । कहा जाता हैं कि जब अकबर दिल्ली का राजा हुआ करता था । उस समय ध्यानु नाम का माता का एक भक्त था । जो माता की दिल से पूजा करता था वह अपने गांव में ध्यानूभक्त के नाम से जाना जाता था । एक बार वह अपने सभी गांव वालों के साथ माता के दर्शन करने के लिए ज्वाला जी की ओर निकला । जब वह माता का जे कारा लगाते हुए दिल्ली से होकर गुजरने लगे तो मुगल बादशाह अकबर के सिपाहियों ने उन्हें रोका और बादशाह के दरबार में पेश होने को कहा जब ध्यानु भक्त अपने सभी गांव वाशियों के साथ अकबर के दरबार मे पहुचे । दरबार मे पहुंच कर अकबर ने उनसे पूछा कि तुम सब कहा जा रहे हो तब ध्यानु भक्त ने उन्हें बताया कि वो सब ज्योति वाली माता रानी के दर्शन करने जा रहे हैं अकबर ने ध्यानु भक्त से पूछा कि तुम्हारी यह माँ क्या क्या कर सकती हैं तब ध्यानु भक्त ने बड़े प्यार से उन्हें उत्तर दिया कि है महाराज वो तो सारी जगत की माँ है वो बहुत शक्तिशाली और दयालु है ऐसा कोई भी कार्य नही है जो माता रानी नहीं कर सकती ।

July 17, 2022 / 0 Comments
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भगत कबीर जी का जन्म और इतिहास – Birth and History of Bhagat Kabir Ji

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भगत कबीर जी का जन्म और इतिहास भगत कबीर एक भक्त थे और आध्यात्मिक कवि उत्तर परदेश, भारत में रहते थे। वह एक सख्त एकेश्वरवादी और अनुयायी थे, शायद गुरमत के संस्थापक। गुरु ग्रंथ साहिब में 17 रागों में 227 पद और कबीर के 237 श्लोक है। कबीर का जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था। वह हिंदू, मुस्लिम और सिखों द्वारा पूजनीय है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक शिक्षक और समाज सुधारक की भूमिका निभाई। अन्य भक्तों की तरह, कबीर भी कर्मकांड, देवताओं की पूजा, ब्राह्मणवाद, जाति व्यवस्था और हिंदू और मुस्लिम पुजारियों की भ्रामक अवधारणाओं में विश्वास नहीं करते थे। कबीरपंथी संप्रदाय जो कबीर की शिक्षाओं का पालन करते है, उन्हें अपने गुरु के रूप में संदर्भित करते है। सिख भी कबीर की शिक्षाओं का पालन करते है, जैसे कि गुरमत, कबीर, नानक, रविदास, भट्ट सभी समान है और सभी को गुरु माना जाता है और सिख गुरु ग्रंथ साहिब के सामने झुकते है, जिसमें कई लोगों की शिक्षा शामिल है जो भगवान के बारे में समान विचार रखते थे। प्रारंभिक जीवन जन्म कबीर जी के जीवन इतिहास के बारे में इतिहासकारों के कई विचार है: यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि उनका जन्म 1398 ईस्वी (गुरु नानक से 71 वर्ष पहले) में हुआ था। कबीरपंथियों (कबीर के अनुयायी) का कहना है कि वह 120 वर्ष की आयु तक जीवित रहे और अपनी मृत्यु की तिथि 1518 बताते है, लेकिन हजारी प्रसेद त्रिवेदी के शोध पर भरोसा करते हुए, एक ब्रिटिश विद्वान चार्लोट वॉडेनविल इन तिथियों को श्रेय देने के इच्छुक है और उन्होंने सिद्ध किया कि 1448 संत कबीर के निधन की सही तिथि है। कबीर का जन्म बनारस में हुआ था और नीरू और उनकी पत्नी नीमा ने उन्हें गोद लिया था, जिन्होंने उनका नाम कबीर (सर्वोच्च) रखा। माता लोई से कबीर का एक पुत्र हुआ जिसका नाम उन्होंने कमल और एक पुत्री का नाम कमली रखा। परंपरा से हिंदू होते हुए भी वे पालन-पोषण करके मुसलमान थे। पेशे से एक बुनकर, कबीर ने कहा कि उन्हें स्वयं भगवान ने भेजा था। बनारस में ब्राह्मणवाद पंद्रहवीं शताब्दी में बनारस ब्राह्मण कट्टरपंथियों और उनके शिक्षा केंद्र की सीट थी। इस शहर में जीवन के सभी क्षेत्रों पर ब्राह्मणों की मजबूत पकड़ थी। इस प्रकार जुलाहा की निचली जाति के कबीर को अपनी विचारधारा का प्रचार करने के लिए बेहद कठिन समय से गुजरना पड़ा। कबीर और उनके अनुयायी नगर में एक स्थान पर एकत्रित होकर ध्यान करते थे। ब्राह्मणों ने वेश्याओं और अन्य निम्न जातियों को उपदेश देने के लिए उनका उपहास किया। कबीर ने व्यंग्य से ब्राह्मणों की निंदा की और इस तरह अपने आसपास के लोगों का दिल जीत लिया। इसमें कोई शक नहीं कि बनारस शहर का आज सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि संत कबीर है। भले ही वह बनारस (शिवपुरी) में थे, उन्हें गुरमत ज्ञान नहीं मिला था- शिवपुरी में उन्होंने जो कुछ पाया वह पाखंडियों का एक समूह था, (सगल जनम शिवपुरी गवाया), वहां उन्होंने बीजक लिखा। मगहर गए। वहां उन्होंने गुरमत (अर्थात् “पवित्र पुरुषों की संगति में”) की स्थापना की और फिर से बानी लिखी जो गुरु ग्रंथ साहिब में मौजूद है। बनारस लौटने पर उन्होंने वही बानी का उपदेश दिया। मगहर में उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि रामानंद जी उनके बाहरी गुरु थे, लेकिन अंततः कबीर ही थे जिन्होंने रामानंद जी को सच्चा ज्ञान दिया। वास्तव में, पिछले 3 युगों में, उन्होंने अपने नामों का खुलासा किया: सत सुकृत, मुनिंद्र और करुणामय। मुसलमानों ने बनारस पर आक्रमण किया बनारस अपने समय के दौरान एक मुस्लिम आक्रमणकारी तैमूर लंग या “तमूर द लंगड़ा” के हमले से तबाह हो गया था। कबीर ने मुल्लाओं और दिन में पांच बार काबा की ओर झुकने के उनके अनुष्ठानों की भी निंदा की। स्थापित और लोकप्रिय धर्मों की खुली निंदा के कारण, कबीर बनारस और उसके आसपास हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के क्रोध का पात्र बन गया। कबीर ने अपनी मान्यताओं का प्रचार करने के लिए बनारस और उसके आसपास यात्रा की। वह पहले पूर्ण गुरु है जिन्होंने पूरी सृष्टि के रहस्यों को बड़े पैमाने पर दुनिया के सामने प्रकट किया है (उनके दो छंद देखें, दोनों शीर्षक: “कर नैनों दीदार”)। उन्हें पंडितों और मौलवियों के समान विरोध का सामना करना पड़ा।सुल्तान सिकंदर लोदी ने उसे डूबने, आग से और हाथी के पैरों के नीचे रौंदने जैसे विभिन्न तरीकों से उसे दंडित करने का प्रयास किया। संत-मत के उच्चतम रहस्यों को समेटे हुए उनके छंद, स्पष्ट रूप से आज भी आम आदमी के दिल के करीब है। प्रचलित कर्मकांडों की निंदा करने के लिए वह अक्सर कठोर भाषा का प्रयोग करते है। उनकी रचनाओं में ‘बीजक’, ‘ग्रंथावली’, ‘शब्दावली’ और ‘अनुराग सागर’ है। उनके शिष्यों में बनारस का राजा भी था। उनके पास प्रसिद्ध शिष्यों की एक आकाशगंगा थी जैसे: धर्मदास जी, मीर तकी, गणक जी, पीपा जी, धन्ना जी और सदाना जी। मृत्यु ऐसा कहा जाता है कि, जब वह स्वर्ग के लिए अपने रास्ते का नेतृत्व किया, तो अंतिम संस्कार के प्रदर्शन के मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक झगड़ा हुआ। आखिरकार, महान कबीर की याद में, उनके मकबरे के साथ-साथ एक समाधि मंदिर का निर्माण किया गया, जो अभी भी मगहर में एक दूसरे के बगल में खड़ा है।

July 16, 2022 / 0 Comments
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श्री कृष्ण जी की जन्म कहानी

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श्री कृष्ण जी की जन्म कहानी श्रीकृष्ण, हिन्दू धर्म में भगवान हैं। वे विष्णु के 8वें अवतार माने गए हैं। कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी उनको जाना जाता है। कृष्ण निष्काम कर्मयोगी, आदर्श दार्शनिक, स्थितप्रज्ञ एवं दैवी संपदाओं से सुसज्जित महान पुरुष थे। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष, युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है। कृष्ण के समकालीन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तृत रूप से लिखा गया है। भगवद्गीता कृष्ण और अर्जुन का संवाद है जो ग्रंथ आज भी पूरे विश्व में लोकप्रिय है। इस उपदेश के लिए कृष्ण को जगतगुरु का सम्मान भी दिया जाता है। कृष्ण वसुदेव और देवकी की 8वीं संतान थे। देवकी कंस की बहन थी। कंस एक अत्याचारी राजा था। उसने आकाशवाणी सुनी थी कि देवकी के आठवें पुत्र द्वारा वह मारा जाएगा। इससे बचने के लिए कंस ने देवकी और वसुदेव को मथुरा के कारागार में डाल दिया। मथुरा के कारागार में ही भादो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनका जन्म हुआ। कंस के डर से वसुदेव ने नवजात बालक को रात में ही यमुना पार गोकुल में यशोदा के यहाँ पहुँचा दिया। गोकुल में उनका लालन-पालन हुआ था। यशोदा और नन्द उनके पालक माता-पिता थे। बाल्यावस्था में ही उन्होंने बड़े-बड़े कार्य किए जो किसी सामान्य मनुष्य के लिए सम्भव नहीं थे। अपने जन्म के कुछ समय बाद ही कंस द्वारा भेजी गई राक्षसी पूतना का वध किया , उसके बाद शकटासुर, तृणावर्त आदि राक्षस का वध किया। बाद में गोकुल छोड़कर नंद गाँव आ गए वहां पर भी उन्होंने कई लीलाएं की जिसमे गोचारण लीला, गोवर्धन लीला, रास लीला आदि मुख्य है। इसके बाद मथुरा में मामा कंस का वध किया। सौराष्ट्र में द्वारका नगरी की स्थापना की और वहाँ अपना राज्य बसाया। पांडवों की मदद की और विभिन्न संकटों से उनकी रक्षा की। महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई और रणक्षेत्र में ही उन्हें उपदेश दिया। 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद उन्होंने अपनी लीला समाप्त की। उनके अवतार समाप्ति के तुरंत बाद परीक्षित के राज्य का कालखंड आता है। राजा परीक्षित, जो अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा अर्जुन के पौत्र थे, के समय से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है। वयस्कता भागवत पुराण कृष्ण की आठ पत्नियों का वर्णन करता है, जो इस अनुक्रम में( रुक्मिणी , सत्यभामा, जामवंती , कालिंदी , मित्रवृंदा , नाग्नजिती (जिसे सत्य भी कहा जाता है),भद्रा और लक्ष्मणा (जिसे मद्रा भी कहते हैं) प्रकट होती हैं। डेनिस हडसन के अनुसार, यह एक रूपक है, आठों पत्नियां उनके अलग पहलू को दर्शाती हैं। जॉर्ज विलियम्स के अनुसार, वैष्णव ग्रंथों में कृष्ण की पत्नियों के रूप में सभी गोपियों का उल्लेख है, लेकिन यह सभी भक्ति एवं आध्यात्मिक सम्बन्ध का प्रतीक है। और प्रत्येक के लिए कृष्ण पूर्ण श्रद्धेय है। उनकी पत्नी को कभी-कभी रोहिणी , राधा , रुक्मिणी, स्वामीनिजी या अन्य कहा जाता है। कृष्ण-संबंधी हिंदू परंपराओं में, वह राधा के साथ सबसे अधिक चित्रित होते हैं। उनकी सभी पत्नियां को और उनके प्रेमिका राधा को हिंदू परंपरा में विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी के अवतार के रूप में माना जाता है। गोपियों को राधा के कई रूप और अभिव्यक्तियों के रूप में माना जाता है। कुरुक्षेत्र का महाभारत युद्ध महाभारत के अनुसार, कृष्ण कुरुक्षेत्र युद्ध के लिए अर्जुन के सारथी बनते हैं, लेकिन इस शर्त पर कि वह कोई भी हथियार नहीं उठाएंगे।दोनों के युद्ध के मैदान में पहुंचने के बाद और यह देखते हुए कि दुश्मन उसके अपने परिवार के सदस्य , उनके दादा, और उनके चचेरे भाई और प्रियजन हैं, अर्जुन क्षोभ में डूब जाते हैं और कहते है कि उनका ह्रदय उन्हें अपने परिजनों से लड़ने और मारने की अनुमति नहीं देगा। वह राज्य को त्यागने के लिए और अपने गाण्डीव (अर्जुन के धनुष) को छोड़ने के लिए तत्पर हो जाते है । कृष्ण तब उसे जीवन, नैतिकता और नश्वरता की प्रकृति के बारे में ज्ञान देते है। जब किसी को अच्छे और बुरे के बीच युद्ध का सामना करना पड़ता है तब , परिस्थिति की स्थिरता, आत्मा की स्थायीता और अच्छे बुरे का भेद ध्यान में रखते हुए , कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को निभाते हुए , वास्तविक शांति की प्रकृति और आनंद और विभिन्न प्रकार के योगों को आनंद और भीतर की मुक्ति के लिए ऐसा योध अनिवार्य होता है । कृष्ण और अर्जुन के बीच बातचीत को भगवद् गीता नामक एक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया गया है श्रीमद भगवद्गीता कुरु क्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था वह श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। सभी हिन्दू ग्रंथों में, श्रीमद भगवत गीता को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इसमें एक व्यक्ति के जीवन का सार है और इसमें महाभारत काल से द्वापर तक कृष्ण के सभी लीलाओ का वर्णन हैं। ऐसी मान्यता है की यह महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित है हालांकि, इसमें कोई प्रमाण नहीं है लेकिन भगवद गीता एक पुस्तक है जो अर्जुन और उनके सारथी श्री कृष्ण के बीच वार्तालाप पर आधारित है। गीता में सांख्य योग , कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग, एक ईश्वरावाद आदि पर बहुत ही सुंदर तरीके से चर्चा की गई है। संस्करण और व्याख्याएं कृष्ण की जीवन कथा के कई संस्करण हैं, जिनमें से तीन का सबसे अधिक अध्ययन किया गया है: हरिवंश , भागवत पुराण और विष्णु पुराण । ये सब मूल कहानी को ही दर्शाते है हैं लेकिन उनकी विशेषताओं, विवरण और शैलियों में काफी भिन्नता हैं। सबसे मूल रचना, हरिवंश को एक यथार्थवादी शैली में बताया गया है जो कृष्ण के जीवन को एक गरीब ग्वाले के रूप में बताता है, लेकिन काव्यात्मक और अलौकिक कल्पना से ओतप्रोत है । यह कृष्ण की अवतार समाप्ति के साथ समाप्त नहीं होती। कुछ विवरणों अनुसार विष्णु पुराण की पांचवीं पुस्तक हरिवंश के यथार्थवाद से दूर हो जाती है और कृष्ण को रहस्यमय शब्दों और स्तम्भों में आवरण करती है कई संस्करणों में विष्णु पुराण की पांडुलिपियां मौजूद हैं। भागवत पुराण की दसवीं और ग्यारहवीं पुस्तकों को व्यापक रूप से एक कविष्ठ कृति माना जाता

July 15, 2022 / 0 Comments
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अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा

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॥ अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा ॥ भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी। एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा। परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली: महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं। मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बाँटती फिरूं। साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्‌टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्‌टी चढ़ाकर कपड़े धोना, ऐसा करने से आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहाँ से आलोप हो गये। साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा। तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं। इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी। एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा: हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए। दासी रानी की बहिन के पास गई। उस दिन गुरुवार था और रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहिन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा। उधर, रानी की बहिन ने सोचा कि मेरी बहिन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी। कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहिन के घर आई और कहने लगी: हे बहिन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो दासी क्यों गई थी? रानी बोली: बहिन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई। उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहिन को विस्तार पूर्वक सुना दी। रानी की बहिन बोली: देखो बहिन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो। पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहिन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई। दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा। उसकी बहिन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई। सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहाँ से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे। चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया। उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी। तब दासी बोली: देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है। रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन

July 14, 2022 / 0 Comments
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गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

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गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:!  गुरु शाक्षात परंब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:!! कर्ता करे न कर सके, गुरु करे सो होय! तीन लोक नो खंड में, गुरु से बड़ा न कोय!! गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पांव! बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो मिलाये!! गुरु बिन ज्ञानी न उपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष! गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष!!   सुख, समृद्धि और शांति की मंगल कामना के साथ आपको और आपके परिवार को “गुरु पूर्णिमा” की हार्दिक शुभकामनाएं!!! 🚩🌹📖🔱🔆🔔🌹🚩 https://www.instagram.com/p/Cf7_nA0h5iW/?igshid=YmMyMTA2M2Y=   Maa Devi Raj Rani ji आप सब पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें

July 13, 2022 / 0 Comments
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हनुमान जी का जन्म की कहानी – story of birth of hanuman ji

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हनुमान जी का जन्म ज्योतिषीयों की गणना के अनुसार बजरंगबली जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था। हनुमानजी के पिता सुमेरू पर्वत के वानरराज राजा केसरी थे और माता अंजनी थी। ज्योतिषीयों की गणना के अनुसार बजरंगबली जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था। हनुमानजी के पिता सुमेरू पर्वत के वानरराज राजा केसरी थे और माता अंजनी थी। हनुमान जी को पवन पुत्र के नाम से भी जाना जाता है और उनके पिता वायु देव भी माने जाते है। राजस्थान के सालासर व मेहंदीपुर धाम में इनके विशाल एवं भव्य मन्दिर है। पुंजिकस्थली यानी माता अंजनी पुंजिकस्थली देवराज इन्द्र की सभा में एक अप्सरा थीं। एक बार जब दुर्वासा ऋषि इन्द्र की सभा में उपस्थित थे, तब अप्सरा पुंजिकस्थली बार-बार अंदर-बाहर आ-जा रही थीं। इससे गुस्सा होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें वानरी हो जाने का शाप दे दिया। पुंजिकस्थली ने क्षमा मांगी, तो ऋर्षि ने इच्छानुसार रूप धारण करने का वर भी दिया। कुछ वर्षों बाद पुंजिकस्थली ने वानर श्रेष्ठ विरज की पत्नी के गर्भ से वानरी रूप में जन्म लिया। उनका नाम अंजनी रखा गया। विवाह योग्य होने पर पिता ने अपनी सुंदर पुत्री का विवाह महान पराक्रमी कपि शिरोमणी वानरराज केसरी से कर दिया। इस रूप में पुंजिकस्थली माता अंजनी कहलाईं। वानरराज को ऋर्षियों ने दिया वर एक बार घूमते हुए वानरराज केसरी प्रभास तीर्थ के निकट पहुंचे। उन्होंने देखा कि बहुत-से ऋषि वहां आए हुए हैं। कुछ साधु किनारे पर आसन लगाकर पूजा अर्चना कर रहे थे। उसी समय वहां एक विशाल हाथी आ गया और उसने ऋषियों को मारना प्रारंभ कर दिया। ऋषि भारद्वाज आसन पर शांत होकर बैठे थे, वह दुष्ट हाथी उनकी ओर झपटा। पास के पर्वत शिखर से केसरी ने हाथी को यूं उत्पात मचाते देखा तो उन्होंने बलपूर्वक उसके बड़े-बड़े दांत उखाड़ दिए और उसे मार डाला। हाथी के मारे जाने पर प्रसन्न होकर ऋर्षियों ने कहा, ‘वर मांगो वानरराज।’ केसरी ने वरदान मांगा, ‘ प्रभु , इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, पवन के समान पराक्रमी तथा रुद्र के समान पुत्र आप मुझे प्रदान करें।’ ऋषियों ने ‘तथास्तु’ कहा और वो चले गए। मां अंजना का क्रोधित होना एक दिन माता अंजनी, मानव रूप धारण कर पर्वत के शिखर पर जा रही थी। वे डूबते हुए सूरज की खूबसूरती को निहार रही थीं। अचानक तेज हवाएं चलने लगीं। और उनका वस्त्र कुछ उड़-सा गया। उन्होंने चारों तरफ देखा लेकिन आस-पास के पृक्षों के पत्ते तक नहीं हिल रहे थे। उन्होंने विचार किया कि कोई राक्षस अदृश्य होकर धृष्टता कर रहा। अत: वे जोर से बोलीं, ‘कौन दुष्ट मुझ पतिपरायण स्त्री का अपमान करने की चेष्टा करता है?’ तभी अचानक पवन देव प्रकट हो गए और बोले, ‘देवी, क्रोध न करें और मुझे क्षमा करें। आपके पति को ऋषियों ने मेरे समान पराक्रमी पुत्र होने का वरदान दिया है। उन्हीं महात्माओं के वचनों से विवश होकर मैंने आपके शरीर का स्पर्श किया है। मेरे अंश से आपको एक महातेजस्वी बालक प्राप्त होगा। उन्होंने आगे कहा, ‘भगवान रुद्र मेरे स्पर्श द्वारा आप में प्रविस्ट हुए हैं। वही आपके पुत्र रूप में प्रकट होंगे।’ वानरराज केसरी के क्षेत्र में भगवान रुद्र ने स्वयं अवतार धारण किया। इस तरह श्रीरामदूत हनुमानजी ने वानरराज केसरी के यहां जन्म लिया। जय जय मंगलवीर हनुमान जी की

July 12, 2022 / 0 Comments
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भगवान श्रीराम की कथा और इतिहास – Story and history of Lord Shri Ram

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भगवान श्रीराम की कथा और इतिहास प्रभु श्री राम प्राचीन भारत में अवतरित हुए भगवान हैं। हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के 10 अवतारों में से भगवान श्रीराम सातवें नंबर पर थे। रामायण ग्रंथ में प्रभु श्रीराम के विषय में हम सब को संपूर्ण जानकारी मिलती है,भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता था हिंदू धर्म में भगवान श्रीराम को बहुत ही अधिक पूजनीय माना जाता है। भगवान श्री राम का जन्म अयोध्या के रघुकुल राज परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम कौशल्या और उनके पिता का नाम राजा दशरथ था। भगवान राम अपने तीन भाई के साथ जन्म लिए थे,जिनके नाम:- भरत शत्रुघ्न और लक्ष्मण था। प्रभु श्री राम के गुरु जी का नाम वशिष्ठ था। उनका विवाह राजा जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ था। दोस्तों हिंदू धर्म में भगवान श्रीराम और माता सीता की जोड़ी आज भी एक आदर्श जोड़ी मानी जाती है। आगे चलकर भगवान राम और उनकी पत्नी माता सीता जी के दो पुत्र हुए थे:-लव और कुश। हनुमान प्रभु श्रीराम के सबसे बड़े भक्त माने जाते हैं। प्रभु श्री राम और उनके तीनों भाई अर्थात लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न ने गुरु वशिष्ठ के गुरुकुल में अपनी शिक्षा संपूर्ण की थी। भगवान राम और उनके तीनों भाई गुरु वशिष्ठ जी के आश्रम में शिक्षा पाकर वेदों और उपनिषदों के बहुत बड़े ज्ञाता बन गए। गुरुकुल में भगवान राम और उनके भाईओं में ज्ञान प्राप्त करते हुए अच्छे मानवीय और सामाजिक गुणों का उनमें संचार हुआ। सभी भाई अपने अच्छे गुणों और ज्ञान प्राप्ति की ललक में अपने गुरुओं के प्रिय बन गए। दोस्तों हमारे इतिहास और पुराण बतलाते हैं कि भगवान राम का जन्म ईसा पूर्व 5114 हुए थे। अगर आज के हिसाब से यह आंकड़ा लगाया जाए तो 5114 + 2016 = 7130 साल पहले प्रभु श्री राम इस धरती पर अवतरित हुए थे। दोस्तों यह शोध महर्षि बाल्मीकि की रामायण में उल्लेख की गई राम जन्म के आधार पर किया गया है। प्रभु श्री राम पर यह शोध वैज्ञानिक संस्था “आई” ने किया है। दोस्तों इस शोध में मुख्य भूमिका भारत के अशोक भटनागर कुलभूषण मिश्रा और सरोज बाला ने निभाई थी। इन सभी शोधकर्ताओं के अनुसार 10 जनवरी 5114 को प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था। लेकिन कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि भगवान राम का जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था। भगवान श्री विष्णु जी ने राम अवतार अन्याय एवं दुष्ट राक्षस राजा रावण को खत्म करने के लिए और इस धरती को पाप से मुक्त कराने के लिए लिया था। राम अवतार में भगवान श्री विष्णु जी ने दुनिया के सामने विश्व पुत्र, भाई, पति और मित्र के गुणों को सामने रखा। श्री राम जी ने अपने पिता राजा दशरथ के कहने पर हंसते-हंसते 14 वर्ष का वनवास जाने के लिए तैयार हो गए। भगवान राम ने अपनी मित्रता का संदेश पूरी दुनिया को देते हुए बाली की हत्या कर अपने मित्र सुग्रीव का राज-पाठ उसे वापस दिलवाया। भगवान राम की कथा भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन में मर्यादाओं का पालन करने के लिए अपना राज्य, मित्र, माता-पिता यहां तक की अपनी पत्नी माता सीता को भी छोड़ दिया था। भगवान राम का परिवार आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान राम रघु कुल में जन्म लिए थे जिसकी परंपरा “प्राण जाए पर वचन न जाए” की थी। भगवान राम के पिता राजा दशरथ ने उनकी सौतेली माता कैकेयी को उनकी दो इच्छा (वर) पूरे करने का वचन दिया था। कैकेयी ने अपने इन दो वर के रूप में राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राजसिहांसन, और प्रभु श्री राम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगा। अपने पिता के वचन की रक्षा के लिए भगवान राम ने खुशी-खुशी 14 वर्ष का वनवास जाना स्वीकार कर लिया। प्रभु श्री राम के साथ उनके छोटे सौतेले भाई लक्ष्मण और उनकी आदर्श पत्नी सीता ने एक अच्छे भाई और अच्छी पत्नी होने का उदाहरण पेश करते हुए उनके साथ वन जाना पसंद किए थे। फिर भरत ने न्याय के लिए अपने माता कैकेयी का आदेश ठुकरा दिया, और अपने बड़े भाई प्रभु राम के पास वन में जाकर उनके चरण पादुका अर्थात (चप्पल) ले आए,और फिर वही चरण पादुका को राजगद्दी पर रखकर राजकाज किया। सोमनाथ मंदिर से जुड़े अनसुलझे रहस्य जब भगवान राम अपनी पत्नी सीता और अपने भाई लक्ष्मण के साथ वनवास का समय भोग रहे थे। तब पत्नी सीता को रावण हरण अर्थात (चुरा) कर लंका ले गया। प्रभु राम ने हनुमान और अपने मित्र सुग्रीव की सहायता से माता सीता को ढूंढा,और समुंद्र में पुल बनाकर लंका गए और अपनी पत्नी सीता के लिए रावण के साथ भयंकर युद्ध किया। और अंत में राक्षस राज रावण को मारकर अपनी पत्नी माता सीता को वापस लेकर आए। जंगल में ही प्रभु श्री राम को हनुमान जैसा दोस्त और भक्त मिले। जिन्होंने भगवान राम के सारे कार्य पूरे किए। प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौट जाने पर उनके भाई भरत ने अयोध्या का राज्य उनको ही सौंप दिया। प्रभु राम न्याय प्रिय राजा थे। प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन काल में बहुत अच्छा शासन किया, इसलिए आज भी लोग अच्छे शासन को रामराज्य की उपमा देते हैं। दोस्तों हिंदू धर्म में के कई व्रत और त्यौहार जैसे दशहरा और दीपावली राम की जीवन कथा से जुड़े हुए हैं। रामनवमी का पावन पर्व प्रभु श्री राम के जन्म उत्सव के रूप में मनाया जाता है। प्रेम से बोलिये “जय श्री राम

July 12, 2022 / 0 Comments
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माता चिंतपूर्णी जी का इतिहास

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माता चिन्तपूर्णी का मन्दिर हिमाचल प्रदेश देवी देवताओं की भूमि है। प्रदेश के कोने-कोने में बहुत से प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं, लेकिन ऊना जिला में स्थित प्रसिद्ध धर्मिक स्थल चिन्तपूर्णी काअपनी ही महत्व है। चिन्तपूर्णी अर्थात चिन्ता को दूर करने वाली देवी जिसे छिन्नमस्तिका भी कहा जाता है। छिन्नमस्तिका का अर्थ है-एक देवी जो बिना सर के है। कहा जाता है कि यहां पर पार्वती के पवित्र पांव गिरे थे। चिन्तपूर्णी जाने के लिए होशियारपुर, चंडीगढ़, दिल्ली, धर्मशाला, शिमला और बहुत से अन्य स्थानों से सीधे बसें यहां पहुंचती हैं। यहां पर वर्ष में तीन बार मेले लगते हैं। पहला चैत्रा मास के नवरात्रों में, दूसरा श्रावण मास के नवरात्रों में, तीसरा अश्विन मास के नवरात्रों में। नवरात्रों में यहां श्रधालुयों की काफी भीड़ लगी रहती है। चिन्तपूर्णी में बहुत सी धर्मशालाएं हैं, जो बस अड्डे के पास स्थित है और कुछ मन्दिर के निकट स्थित हैं। मन्दिर का इतिहास इस प्रकार से है। प्राचीन कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि 14वीं शताब्दी में माई दास नामक दुर्गा भक्त ने इस स्थान की खोज की थी। माई दास का जन्म अठूर गांव, रियासत पटियाला में हुआ था। माई दास जी के दो बड़े भाई थे-दुर्गादास व देवीदास। माई दास का अध्कितर समय पूजा-पाठ में ही व्यतीत होता था। इसलिए वह परिवार के कार्यों में हाथ नहीं बटा पाते थे। इस लिए भाईयों ने माई दास जी को परिवार से अलग कर दिया। माई दास ने अपना समय पूजा-पाठ व दुर्गा भक्ति में व्यतीत करना जारी रखा। एक दिन माई दास जी अपने ससुराल जा रहे थे। रास्ते में एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गए। इसी वट वृक्ष के नीचे आजकल दुर्गा भगवती जी का मन्दिर है। वहां घना जंगल था। तब इस जगह का नाम छपरोह था, जिसे आजकल चिन्तपूर्णी कहते हैं। थकावट के कारण माईदास की आंख लग गई और स्वप्न में उन्हें दिव्य तेजस्वी कन्या के दर्शन हुए, जो उन्हें कह रही थी कि माईदास! इसी वट वृक्ष के नीचे बीच में मेरी पिंडी बनाकर उसकी पूजा करो। तुम्हारे सब दुख दूर होंगे। माईदास को कुछ समझ न आया और वह ससुराल चले गए, ससुराल से वापस आते समय उसी स्थान पर माईदास जी के कदम फिर रुक गए। उन्हें आगे कुछ न दिखाई दिया। वह फिर उसी वट वृक्ष के नीचे बैठ गए और स्तुति करने लगे। उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की। हे दुर्गा मां यदि मैंने सच्चे मन से आपकी उपासना की है तो दर्शन देकर मुझे आदेश दो। बार-बार स्मृति करने पर उन्हें सिंह वाहनी दुर्गा के दर्शन हुए। देवी ने कहा कि मैं उस वट वृक्ष के नीचे चिरकाल से विराजमान हूं। लोग यवनों के आक्रमण तथा अत्याचारों के कारण मुझे भूल गए हैं। तुम मेरे परम भक्त हो। अतः यहां रहकर मेरी आराधना करो। यहां तुम्हारे वंश की रक्षा मैं करुंगी। माईदास जी ने कहा कि मैं यहां पर रहकर कैसे आपकी आराधना करुंगा। यहां पर घने जंगल में न तो पीने योग्य पानी है और न ही रहने योग्य उपयुक्त स्थान। मां दुर्गा ने कहा कि मैं तुमको निर्भय दान देती हूं कि तुम किसी भी स्थान पर जाकर कोई भी शिला उखाड़ो वहां से जल निकल आएगा। इसी जल से तुम मेरी पूजा करना। आज इसी वट वृक्ष के नीचे मां चिन्तपूर्णी का भव्य मन्दिर है और वह शिला भी मन्दिर में रखी हुई है, जिस स्थान पर जल निकला था वहां आज सुन्दर तालाब है। आज भी उसी स्थान से जल निकाल कर माता का अभिषेक किया जाता है। पुराणों के अनुसार यह स्थान चार महारुद्र के मध्य स्थित है। एक और कालेश्वर महादेव, दूसरी ओर शिववाड़ी, तीसरी ओर नारायण महादेव, चौथी ओर मुचकंद महादेव हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ऐसा विश्वास किया जाता है कि सती चंडी की सभी दुष्टों पर विजय के उपरांत, उनके दो शिष्यों अजय और विजय ने सती से अपनी खून की प्यास बुझाने की प्रार्थना की थी। यह सुनकर सती चंडी ने अपना मस्तिष्क छिन्न कर लिया। इसलिए सती का नाम छिन्नमस्तिका पड़ा।

July 11, 2022 / 0 Comments
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खाटू श्याम बाबा जी की कहानी

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खाटू श्याम बाबा जी की कहानी हिन्दू धर्म के अनुसार, खाटू श्याम जी ने द्वापरयुग में श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त किया था कि वे कलयुग में उनके नाम श्याम से पूजे जाएँगे। श्री कृष्ण बर्बरीक के महान बलिदान से काफ़ी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि जैसे-जैसे कलियुग का अवतरण होगा, तुम श्याम के नाम से पूजे जाओगे। तुम्हारे भक्तों का केवल तुम्हारे नाम का सच्चे दिल से उच्चारण मात्र से ही उद्धार होगा। यदि वे तुम्हारी सच्चे मन और प्रेम-भाव से पूजा करेंगे तो उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होगी और सभी कार्य सफ़ल होंगे। श्री श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे अति बलशाली गदाधारी भीम के पुत्र घटोत्कच और दैत्य मूर की पुत्री मोरवी के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ तथा श्री कृष्ण से सीखी। नव दुर्गा की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किये; इस प्रकार तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे। महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुए तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर चल पड़े। सर्वव्यापी श्री कृष्ण ने ब्राह्मण भेष धारण कर बर्बरीक के बारे में जानने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है; ऐसा सुनकर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिए पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तूणीर में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो पूरे ब्रह्माण्ड का विनाश हो जाएगा। यह जानकर भगवान् कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस वृक्ष के सभी पत्तों को वेधकर दिखलाओ। वे दोनों पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। बाण ने क्षणभर में पेड़ के सभी पत्तों को वेध दिया और श्री कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था; बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए अन्यथा ये बाण आपके पैर को भी वेध देगा। तत्पश्चात, श्री कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा; बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन को दोहराया और कहा युद्ध में जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा उसी को अपना साथ देगा। श्री कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की निश्चित है और इस कारण अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में चला जाएगा। अत: ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण ने वीर बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की। बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया और दान माँगने को कहा। ब्राह्मण ने उनसे शीश का दान माँगा। वीर बर्बरीक क्षण भर के लिए अचम्भित हुए, परन्तु अपने वचन से अडिग नहीं हो सकते थे। वीर बर्बरीक बोले एक साधारण ब्राह्मण इस तरह का दान नहीं माँग सकता है, अत: ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की। ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ गये। श्री कृष्ण ने बर्बरीक को शीश दान माँगने का कारण समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पूर्व युद्धभूमि पूजन के लिए तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय(राजपूत कुल) के शीश की आहुति देनी होती है; इसलिए ऐसा करने के लिए वे विवश थे। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अन्त तक युद्ध देखना चाहते हैं। श्री कृष्ण ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। श्री कृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न होकर बर्बरीक को युद्ध में सर्वश्रेष्ठ वीर की उपाधि से अलंकृत किया। उनके शीश को युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया; जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया था इस प्रकार वे शीश के दानी कहलाये। महाभारत युद्ध की समाप्ति पर पाण्डवों में ही आपसी विवाद होने लगा कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है? श्री कृष्ण ने उनसे कहा बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये और पहाड़ी की ओर चल पड़े, वहाँ पहुँचकर बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्री कृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उपस्थिति, युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो शत्रु सेना को काट रहा था। महाकाली, कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं। श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है। उनका शीश खाटू नगर (वर्तमान राजस्थान राज्य के सीकर जिला) में दफ़नाया गया इसलिए उन्हें खाटू श्याम बाबा कहाजाता है। एक गाय उस स्थान पर आकर रोज अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी। बाद में खुदाई के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिए एक ब्राह्मण को सूपुर्द कर दिया गया। एक बार खाटू नगर के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिए और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिए प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के

July 11, 2022 / 0 Comments
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