सफलता पाना बहुत ही आसान है लेकिन इस एक बात का रखना होगा ध्यान एक संत और उनका एक शिष्य धर्म प्रचार के लिए गांव-गांव घूमते थे। उन्हें एक गांव में रहते हुए काफी दिन बीत गए। एक दिन संत ने शिष्य से कहीं और चलने के निर्देश दिए। शिष्य ने पूछा, ‘गुरुदेव, यहां तो बहुत चढ़ावा आता है और यहां के लोग भी अच्छे हैं। क्यों न कुछ दिन बाद चलें तब तक और चढ़ावा इकट्ठा हो जाएगा?’ संत बोले, ‘बेटा, हमें धन और वस्तुओं के संग्रह से क्या लेना-देना, हमें तो त्याग के रास्ते पर चलना है।’ गुरु की आज्ञा सुनकर शिष्य कुटिया को छोड़ चल दिया लेकिन चलते-चलते गुरु की आंखें बचाकर कुछ सिक्के चोरी से झोली में डाल लिए। दूसरे गांव में जाने के लिए उन्हें एक नदी पार करनी थी। जब वे नदी तट पर पहुंचे तो नाव वाले ने कहा कि मैं नदी पार कराने के दो सिक्के लेता हूं। संत के पास पैसे नहीं थे, इसलिए वे वहीं आसन लगा कर बैठ गए। सुबह से शाम हो गई न तो कोई भक्त आया और न ही नाव वाले का दिल पसीजा। अंधेरा होता देख शिष्य ने अपनी झोली से दो सिक्के निकाले और नाव वाले को देकर बोला कि अब हमें पहुंचाओ। उसे देख कर संत मुस्कुराते हुए बोले कि जब तक सिक्के तुम्हारे झोली में थे, हम कष्ट में रहे, तुमने त्यागा, हमारा काम बन गया।
These 5 mantras are effective to get rid of problems and worries, all problems will end.
हर परेशानी और पीड़ा से मुक्ति के मंत्रों को बहुत ही प्रभावी माना गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार मंत्रों में ईश्वरीय शक्ति होती है. इसलिए नियमित मंत्रों के जाप से लाभ होता है. सनातन हिंदू धर्म में मंत्रोच्चारण की परंपरा सदियों से चली आ रही है. पूजा-पाठ, यज्ञ और हवन से लेकर सभी धार्मिक अनुष्ठानों में मंत्रों का विशेष महत्व होता है. मंत्रों के जाप से न केवल देवी-देवता प्रसन्न होते हैं बल्कि इससे नकारात्मकता भी दूर होती है. ज्योतिष में तनावमुक्त जीवन और परेशानियों से मुक्ति के लिए भी मंत्रों को कारगर माना गया है. यदि आप परेशानियों से घिरे हैं, आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है या फिर घर पर नकारात्मकता का साया है तो, आपकी हर परेशानी का हल मंत्रों से संभव है. इन पांच मंत्रों के जाप से घर पर सुख-शांति का वास होगा और आप सभी परेशानियों से मुक्त रहेंगे. हालांकि इस बात का विशेष ध्यान रखें कि मंत्रों का उच्चारण हमेशा स्पष्ट तरीके से और शुद्ध होकर करें, तभी इसका लाभ मिलता है. ये 5 मंत्र दिलाएंगे तनावमुक्त जीवन ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ इस मंत्र का उच्चारण सुबह करना चाहिए. सुबह उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं. फिर पूजाघर में एक कलश में शुद्ध जल भरकर रखें. पूजा आरंभ करने से पहले हाथ जोड़कर इस मंत्र का जाप करें. इसके बाद सभी दिशाओं में अभिमंत्रित जल के छीटें मारे. इस विधि से मंत्रोच्चारण करने से घर पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है, परिवारिक कलह-क्लेश दूर होते हैं और सुख-शांति में वृद्धि होती है. ”ॐ बुद्धिप्रदाये नमः” इस मंत्र के जाप से बुद्धि तीव्र होती है. भगवान गणेश की पूजा के दौरान इस मंत्र का उच्चारण कम से कम 108 बार करना चाहिए. मंत्र के जाप से पहले भगवान गणेश की विधिवत पूजा करें और उन्हें मोदक, लाल गुलाब और दुर्वा चढ़ाएं. इसके बाद घी का दीपक जलाएं और फिर मंत्र का जाप करें. विशेषकर विद्यार्थियों के लिए इस मंत्र का जाप लाभकारी होता है. इससे बुद्धि तीव्र होती है, समझदारी बढ़ती है और विद्या की प्राप्ति होती है. जले रक्षतु वाराहः स्थले रक्षतु वामनः। अटव्यां नारसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः।। इस मंत्र का जाप आप सुबह और शाम दोनों ही समय कर सकते हैं. साथ ही रात्रि में सोने से पहले भी हाथ-पांव धोकर शुद्ध होकर इस मंत्र का जाप कर सकते हैं. इस मंत्र के माध्यम से आप भगवान से यह प्रार्थना करते हैं कि, वह सभी दिशाओं से आपकी रक्षा करे. ॐ नम: शिवाय यह शिवजी का सबसे प्रभावी और सरल मंत्र है. शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हुए इस मंत्र का जाप करना लाभकारी होता है. इससे व्यक्ति की सभी समस्याएं दूर होती है और वह तनावमुक्त जीवन व्यतीत करता है. साथ ही इससे निरोगी जीवन व अच्छे स्वास्थ्य की भी प्राप्ति होती है. कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम॥ सुबह उठने के बाद अपनी हथेली को देखते हुए इस मंत्र का उच्चारण करें. इससे पूरे दिन आपके द्वारा किए कार्य सफल होंगे.
अगर हो जाए पूजा में कोई भूल, तो इस मंत्र का करें उच्चारण
हम सभी किसी न किसी देवता की पूजा जरूर करते हैं. पूजा पाठ के कई नियम होते हैं अक्सर पूजा करते समय हमसे जाने-अनजाने भूल हो जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर आपसे पूजा पाठ में कोई भूल हो जाए तो इसके लिए शास्त्रों में क्षमा याचना मंत्र बताया गया गया हैं. इस मंत्र के उच्चारण से हम पूजा में कि गई गलतियों और भूल चूक के लिए ईश्वर से क्षमा मांगते हैं. क्षमायाचना का मंत्र और उसका अर्थ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्. पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर.. मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन. यत्पूजितं मया देव. परिपूर्ण तदस्तु मे.. अर्थात हे ईश्वर मैं आपका “आवाह्न” अर्थात् आपको बुलाना नहीं जानता हूं न विसर्जनम् अर्थात् न ही आपको विदा करना जानता हूं मुझे आपकी पूजा भी करनी नहीं आती है. कृपा करके मुझे क्षमा करें. न मुझे मंत्र का ज्ञान है न ही क्रिया का, मैं तो आपकी भक्ति करना भी नहीं जानता. यथा संभव पूजा कर रहा हूं, कृपा करके मेरी भूल को क्षमा कर दें और पूजा को पूर्णता प्रदान करें. मैं भक्त हूं मुझसे गलती हो सकती है, हे ईश्वर मुझे क्षमा कर दें. मेरे अहंकार को दूर कर दें. मैं आपकी शरण में हूं.
राजेश्वरी धाम देवी राज रानी की अध्यक्ष्ता में राजेश्वरी आश्रम हरिद्वार में हुआ शुभारंभ
राजेश्वरी धाम देवी राज रानी की तरफ से राजेश्वरी आश्रम पीपलवाली रानी गली 1 भूपतवाला हरिद्वार में हुआ शुभारंभ मां देवी राज रानी जी की पावन अध्यक्षता में हरिद्वार के भूपतवाला क्षेत्र में राजेश्वरी आश्रम का शुभारंभ गत दिनों प्रधान कैलाश बब्बर की देख रेख में किया गया। इस पावन कार्यक्रम का शुभारंभ हवन यज्ञ कर किया गया, सुयोग्य ब्राह्मणों द्वारा विधिवत पूजा अर्चना कर मुर्तियां स्थापित करवाई गई। मुर्ति स्थापना के पश्चात साधू संतो के लिए भोजन की बड़ी सुंदर व्यवस्था की गई थी जिस दौरान अलग-अलग पकवान साधू संतो को परोसे गए। उपरांत दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। Video Link – https://youtu.be/nqx4qXhHIes तत्पश्चात भजन कीर्तन किया गया। जिसमें प्रसिद्ध भजन गायक पंकज ठाकुर और महंत विजय सोढ़ी और उसके साथियों द्वारा पक्का भजन किया गया द्वारा अपनी प्रस्तुति से उपस्थित संगत को आनंद विभोर किया गया। इस दौरान शिव तांडव तथा विभिन्न प्रकार की झांकियां भी प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम के पश्चात संगत के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। जालंधर से विशाल जनसमूह इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए मंदिर की तरफ से ट्रेन की तीन बोगियां में स्वार होकर आश्रम में पहुंचे और उनके लिए खाने पीने और रहने की व्यवस्था मां देवी राज रानी जी की ओर से की गई लोगो ने खूब आनंद माना । जो लोग आश्रम में जाकर रहना चाहते है वो इन नंबरों पर संपर्क कर सकते है – 98974-93437,98142-53652, 94172-61008
राजेश्वरी धाम देवी राजरानी वैष्णो मंदिर मे अष्टमी कल 27 फ़रवरी को
💐 जय माता दी जय माता दी 💐 राजेश्वरी धाम देवी राजरानी वैष्णो मंदिर, बस्ती शेख रोड, जालंधर माता के सभी भक्तों को सूचित किया जाता है कि 27 फरवरी 2023 दिन सोमवार को अष्टमी बड़ी धूमधाम से देवी राज रानी जी मंदिर बस्ती शेख रोड, जालंधर में रात 8:00 बजे से मां देवी राज रानी जी की इच्छा तक मनाई जाएगी जिसमें लंगर एवं कीर्तन की व्यवस्था की गई है लंगर एवं कीर्तन रात्रि 8:00 बजे से प्रारंभ होगा | मां का गुणगान पंकज ठाकुर एंड पार्टी पक्के भजनों के साथ करेगी | सभी भक्तगण मां देवी राज रानी जी मंदिर मे पहुंचकर अपना एवं अपने परिवार जनों के कल्याण के भागीदार बने।। राजेश्वरी धाम वेलफेयर सोसायटी (रजि.) प्रधान श्री कैलाश बब्बर :98142-5365298882-2052970091-84188
28 जनवरी दिन शनिवार को राजेश्वरी धाम देवी राज रानी वैष्णो मंदिर में अष्टमी का आयोजन
जय माता दी जय माता दी राजेश्वरी धाम देवी राज रानी वैष्णो मंदिर, बस्ती शेख रोड, जालंधर में 28 जनवरी दिन शनिवार को मां की पावन अष्टमी का रात 8:00 बजे से लेकर माँ की इच्छा तक कीर्तन का आयोजन किया जाएगा | मां का गुणगान पंकज ठाकुर एंड पार्टी की और से किया जाएगा | कीर्तन दौरान मां का लंगर अटूट लगाया जाएगा | विशेष सूचना : जो लोग मंदिर निर्माण कार्य के लिए और डिस्पेंसरी जो मां देवी राज रानी जी के आशीर्वाद से चलायी जा रही है उसमें अपनी सेवा डालना चाहते हैं तो व अपनी सेवा देकर रसीद प्राप्त कर सकते हैं मंदिर कमेटी के प्रधान श्री कैलाश बब्बर कैशियर : विजय दुआ, एसएम नय्यरलंगर इंचार्ज : पवन नागपाल, रामकिशन नानू सतीश बब्बर, ज्योति बब्बर,जतिन बब्बर व सदस्य संपर्क :98142-53652, 9888651-501, 98551-76800, 93161-92099
शिवरात्रि की पूजा कैसे करनी चाहिए जाने पूरी विधि
शिवरात्रि की पूजा कैसे करनी चाहिए जाने पूरी विधि शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, पुष्प, चन्दन का स्नान प्रिय हैं। इनकी पूजा के लिये दूध, दही, घी, गंगाजल, शहद इन पांच अमृत जिसे पञ्चामृत कहा जाता है, से की जाती है। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबंधित हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है। सावन सोमवार व्रत को काफी फलदायी बताया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है।[8] महाशिवरात्रि का व्रत अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए करते हैं। इस व्रत को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विधि से मनाया जाता है ॐ नमो शिवाय नमो नमः हर हर महादेव शिव शंभू
आज लगेगा चंद्र ग्रहण, शुरू हुआ सूतक काल, इन नियमों का अवश्य करें पालन, नही तो हो सकता भारी नुकसान
आज लगेगा चंद्र ग्रहण, शुरू हुआ सूतक काल, इन नियमों का अवश्य करें पालन, नही तो हो सकता भारी नुकसान नई दिल्ली : आज यानी 8 नवंबर को साल का आखिरी चंद्र ग्रहण लग रहा है। वैदिक ज्योतिष गणना के अनुसार सूर्य ग्रहण होने पर सूतक काल ग्रहण के शुरू होने से 12 घंटे पहले जबकि चंद्र ग्रहण होने पर 9 घंटे पहले से सूतक शुरू हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण पर सूतक काल को शुभ नहीं माना जाता है। सूतक काल के दौरान पूजा-पाठ और शुभ कार्य वर्जित होता है। शाम 05 बजकर 20 मिनट से शाम 06 बजकर 20 मिनट तक वास्तविक ग्रहण काल है। 9 ग्रहण के समय पालनीय नियम *1. ग्रहण के समय भगवान का चिंतन, जप, ध्यान करने पर उसका लाख गुना फल मिलता है, ग्रहण के समय हज़ार काम छोड़ कर मौन और जप करिए। *ग्रहण के समय सोने से रोग बढ़ते हैं। *ग्रहण के समय सम्भोग करने से सुअर की योनि मिलती है। ” *ग्रहण के समय मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए, दरिद्रता आती है।” *4. ग्रहण के समय धोखाधड़ी और ठगाई करने से सर्पयोनि मिलती है।” *5. ग्रहण के समय शौच नहीं जाना चाहिए, वर्ना पेट में कृमि होने लगते हैं। *6. ग्रहण के समय जीव-जंतु या किसी की हत्या हो जाय तो नारकीय योनि में जाना पड़ता है।” *7. ग्रहण के समय भोजन व मालिश करने वाले को कुष्ट रोग हो जाता है। 18. ग्रहण के समय पत्ते, तिनके, लकड़ी, फूल आदि नहीं तोड़ने चाहिए। 1 *9. स्कन्द पुराण के अनुसार ग्रहण के समय दूसरे का अन्न खाने से 12 साल का किया हुआ जप, तप, दान स्वाहा हो जाता है। *10. ग्रहण के समय अपने घर की चीज़ों में कुश, तुलसी के पत्ते अथवा तिल डाल देने चाहिए ।” *11. ग्रहण के समय रुद्राक्ष की माला धारण करने से पाप नाश हो जाते हैं। *12. ग्रहण के समय दीक्षा अथवा दीक्षा लिए हुए मंत्र का जप करने से सिद्धि हो जाती है।’ चन्द्रग्रहण में ग्रहण से 3 प्रहर (9 घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए । बूढ़े वालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ** ग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुन्तुद नरक में वास करता है ।” • सूतक से पहले पानी में कुशा, तिल या तुलसी पत्र डाल के रखें ताकि सूतक काल में उसे उपयोग में ला सकें। ग्रहणकाल में रखे गये पानी का उपयोग ग्रहण के बाद नहीं करना चाहिए ।” ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते । पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए ।””• ग्रहण वेध के प्रारम्भ में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही करना चाहिए और ग्रहण शुरू होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिए । ग्रहण पूरा होने पर स्नान के बाद सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो उसका शुद्ध बिम्ब देखकर अर्घ्य दे कर भोजन करना चाहिए ।’ • ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए। स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं।” • • ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए। ग्रहण के स्नान में गरम जल की अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा जमीन में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, (साधारण) बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है । ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरूरतमंदों को वस्त्रदान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है । • ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ने चाहिए। बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिए व दंतधावन नहीं करना चाहिए ।” • ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल-मूत्र का त्याग, मैथुन और भोजन ये सब कार्य वर्जित हैं । • • ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए ।’ ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है । गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए । भगवान वेदव्यासजी ने परम हितकारी वचन कहे हैं सामान्य दिन से ग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) दस लाख गुना यदि गंगाजल पास में हो तो ग्रहण में 10 करोड़ गुना फलदायी होता है । • • ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम-जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है । • ग्रहण के समय उपयोग किया हुआ आसन, माला, गोमुखी ग्रहण पूरा होने के बाद गंगा जल में धो लेना चाहिए ।” • • ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है । (स्कन्द पुराण) * ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिए । (देवी भागवत) *
गणेश चतुर्थी व्रत की चौथी कथा
गणेश चतुर्थी की पौराणिक एवं प्रचलित कथा : व्रत में सुनने से दूर होंगे सारे संकट, मिलेगा अपार सुख चौथी कथा : – श्री गणेश चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव तथा माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव से समय व्यतीत करने के लिए चौपड़ खेलने को कहा। शिव चौपड़ खेलने के लिए तैयार हो गए, परंतु इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा, यह प्रश्न उनके समक्ष उठा तो भगवान शिव ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका एक पुतला बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर दी और पुतले से कहा- ‘बेटा, हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, परंतु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है इसीलिए तुम बताना कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता?’ उसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का चौपड़ खेल शुरू हो गया। यह खेल 3 बार खेला गया और संयोग से तीनों बार माता पार्वती ही जीत गईं। खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया, तो उस बालक ने महादेव को विजयी बताया। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और क्रोध में उन्होंने बालक को लंगड़ा होने, कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। बालक ने माता पार्वती से माफी मांगी और कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश ऐसा हुआ है, मैंने किसी द्वेष भाव में ऐसा नहीं किया। बालक द्वारा क्षमा मांगने पर माता ने कहा- ‘यहां गणेश पूजन के लिए नागकन्याएं आएंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे।’ यह कहकर माता पार्वती शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं। एक वर्ष के बाद उस स्थान पर नागकन्याएं आईं, तब नागकन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालूम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा से गणेश जी प्रसन्न हुए। उन्होंने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए कहा। उस पर उस बालक ने कहा- ‘हे विनायक! मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वे यह देख प्रसन्न हों।’ इतनी वार्ता कर ही रहे थे कि किसी एक ने सुझाव दिया- यदि गणेश जी आ भी जाएं तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे कि आप घर की याद रखना। आप तो चूहे पर बैठकर धीरे-धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे। यह सुझाव भी सबको पसंद आ गया, तो विष्णु भगवान ने भी अपनी सहमति दे दी। होना क्या था कि इतने में गणेश जी वहां आ पहुंचे और उन्हें समझा-बुझाकर घर की रखवाली करने बैठा दिया। बारात चल दी, तब नारद जी ने देखा कि गणेश जी तो दरवाजे पर ही बैठे हुए हैं, तो वे गणेश जी के पास गए और रुकने का कारण पूछा। गणेश जी कहने लगे कि विष्णु भगवान ने मेरा बहुत अपमान किया है।नारद जी ने कहा कि आप अपनी मूषक सेना को आगे भेज दें, तो वह रास्ता खोद देगी जिससे उनके वाहन धरती में धंस जाएंगे तब आपको सम्मानपूर्वक बुलाना पड़ेगा अब तो गणेश जी ने अपनी मूषक सेना जल्दी से आगे भेज दी और सेना ने जमीन पोली कर दी। जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिए धरती में धंस गए। लाख कोशिश करें, परंतु पहिए नहीं निकले। सभी ने अपने-अपने उपाय किए, परंतु पहिए तो नहीं निकले, बल्कि जगह-जगह से टूट गए। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। तब तो नारद जी ने कहा- आप लोगों ने गणेश जी का अपमान करके अच्छा नहीं किया। यदि उन्हें मनाकर लाया जाए तो आपका कार्य सिद्ध हो सकता है और यह संकट टल सकता है। शंकर भगवान ने अपने दूत नंदी को भेजा और वे गणेश जी को लेकर आए। गणेश जी का आदर-सम्मान के साथ पूजन किया, तब कहीं रथ के पहिए निकले। अब रथ के पहिए निकल को गए, परंतु वे टूट-फूट गए, तो उन्हें सुधारे कौन? पास के खेत में खाती काम कर रहा था, उसे बुलाया गया। खाती अपना कार्य करने के पहले ‘श्री गणेशाय नम:’ कहकर गणेश जी की वंदना मन ही मन करने लगा। देखते ही देखते खाती ने सभी पहियों को ठीक कर दिया। तब खाती कहने लगा कि हे देवताओं! आपने सर्वप्रथम गणेशजी को नहीं मनाया होगा और न ही उनकी पूजन की होगी इसीलिए तो आपके साथ यह संकट आया है। हम तोमूरख अज्ञानी हैं, फिर भी पहले गणेश जी को पूजते हैं, उनका ध्यान करते हैं। आप लोग तो देवतागण हैं, फिर भी आप गणेश जी को कैसे भूल गए? अब आप लोग भगवान श्री गणेश जी की जय बोलकर जाएं, तो आपके सब काम बन जाएंगे और कोई संकट भी नहीं आएगा। ऐसा कहते हुए बारात वहां से चल दी और विष्णु भगवान का लक्ष्मी जी के साथ विवाह संपन्न कराके सभी सकुशल घर लौट आए हे गणेश जी महाराज! आपने विष्णु को जैसो कारज सारियो, ऐसो कारज सबको सिद्ध करजो। बोलो गजानन भगवान की जय। श्री गणेश चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव तथा माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव से समय व्यतीत करने लिए चौपड़ खेलने को कहा। शिव चौपड़ खेलने के लिए तैयार हो गए, परंतु इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा, यह प्रश्न उनके समक्ष उठा तो भगवान शिव ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका एक पुतला बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर दी और पुतले से कहा- ‘बेटा, हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, परंतु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है इसीलिए तुम बताना कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता उसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का चौपड़ खेल शुरू हो गया। यह खेल 3 बार खेला गया और संयोग से तीनों बार माता पार्वती ही जीत गईं। खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया, तो उस बालक ने महादेव को विजयी बताया। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और क्रोध में उन्होंने बालक को लंगड़ा होने, कीचड़ में पड़े रहने
गणेश चतुर्थी व्रत की तीसरी कथा
गणेश चतुर्थी की पौराणिक एवं प्रचलित कथा : व्रत में सुनने से दूर होंगे सारे संकट, मिलेगा अपार सुख श्री गणेशाय नम:’ तीसरी कथा :- एक समय की बात है कि विष्णु भगवान का विवाह लक्ष्मीजी के साथ निश्चित हो गया। विवाह की तैयारी होने लगी। सभी देवताओं को निमंत्रण भेजे गए, परंतु गणेश जी को निमंत्रण नहीं दिया, कारण जो भी रहा हो। अब भगवान विष्णु की बारात जाने का समय आ गया। सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह समारोह में आए। उन सबने देखा कि गणेशजी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब वे आपस में चर्चा करने लगे कि क्या गणेशजी को नहीं न्योता है? या स्वयं गणेश जी ही नहीं आए हैं? सभी को इस बात पर आश्चर्य होने लगा। तभी सबने विचार किया कि विष्णु भगवान से ही इसका कारण पूछा जाए। विष्णु भगवान से पूछने पर उन्होंने कहा कि हमने गणेश जी के पिता भोलेनाथ महादेव को न्योता भेजा है। यदि गणेशजी अपने पिता के साथ आना चाहते तो आ जाते, अलग से न्योता देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थीं। दूसरी बात यह है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिनभर में चाहिए। यदि गणेशजी नहीं आएंगे तो कोई बात नहीं। दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना-पीना अच्छा भी नहीं लगता। इतनी वार्ता कर ही रहे थे कि किसी एक ने सुझाव दिया- यदि गणेश जी आ भी जाएं तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे कि आप घर की याद रखना। आप तो चूहे पर बैठकर धीरे-धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे। यह सुझाव भी सबको पसंद आ गया, तो विष्णु भगवान ने भी अपनी सहमति दे दी। होना क्या था कि इतने में गणेश जी वहां आ पहुंचे और उन्हें समझा-बुझाकर घर की रखवाली करने बैठा दिया। बारात चल दी, तब नारद जी ने देखा कि गणेश जी तो दरवाजे पर ही बैठे हुए हैं, तो वे गणेश जी के पास गए और रुकने का कारण पूछा। गणेश जी कहने लगे कि विष्णु भगवान ने मेरा बहुत अपमान किया है। नारद जी ने कहा कि आप अपनी मूषक सेना को आगे भेज दें, तो वह रास्ता खोद देगी जिससे उनके वाहन धरती में धंस जाएंगे, तब आपको सम्मानपूर्वक बुलाना पड़ेगा। अब तो गणेश जी ने अपनी मूषक सेना जल्दी से आगे भेज दी और सेना ने जमीन पोली कर दी। जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिए धरती में धंस गए। लाख कोशिश करें, परंतु पहिए नहीं निकले। सभी ने अपने-अपने उपाय किए, परंतु पहिए तो नहीं निकले, बल्कि जगह-जगह से टूट गए। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। तब तो नारद जी ने कहा- आप लोगों ने गणेश जी का अपमान करके अच्छा नहीं किया। यदि उन्हें मनाकर लाया जाए तो आपका कार्य सिद्ध हो सकता है और यह संकट टल सकता है। शंकर भगवान ने अपने दूत नंदी को भेजा और वे गणेश जी को लेकर आए। गणेश जी का आदर-सम्मान के साथ पूजन किया, तब कहीं रथ के पहिए निकले। अब रथ के पहिए निकल को गए, परंतु वे टूट-फूट गए, तो उन्हें सुधारे कौन? पास के खेत में खाती काम कर रहा था, उसे बुलाया गया। खाती अपना कार्य करने के पहले ‘श्री गणेशाय नम:’ कहकर गणेश जी की वंदना मन ही मन करने लगा। देखते ही देखते खाती ने सभी पहियों को ठीक कर दिया। तब खाती कहने लगा कि हे देवताओं! आपने सर्वप्रथम गणेशजी को नहीं मनाया होगा और न ही उनकी पूजन की होगी इसीलिए तो आपके साथ यह संकट आया है। हम तो मूरख अज्ञानी हैं, फिर भी पहले गणेश जी को पूजते हैं, उनका ध्यान करते हैं। आप लोग तो देवतागण हैं, फिर भी आप गणेश जी को कैसे भूल गए? अब आप लोग भगवान श्री गणेश जी की जय बोलकर जाएं, तो आपके सब काम बन जाएंगे और कोई संकट भी नहीं आएगा। ऐसा कहते हुए बारात वहां से चल दी और विष्णु भगवान का लक्ष्मी जी के साथ विवाह संपन्न कराके सभी सकुशल घर लौट आए। हे गणेश जी महाराज! आपने विष्णु को जैसो कारज सारियो, ऐसो कारज सबको सिद्ध करजो। बोलो गजानन भगवान की जय।