जय पार्वती माता जय पार्वती माता ब्रह्म सनातन देवी शुभफल की दाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ अरिकुल पद्दं विनासनी जय सेवक त्राता, जगजीवन जगदंबा हरिहर गुणगाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ सिंह को वाहन साजे कुण्डल है साथा, देब बंधु जस गावत नृत्य करत ता था । ॥ जय पार्वती माता ॥ सतयुग रूपशील अति सुन्दर नाम सती कहलाता, हेमांचल घर जन्मी सखियन संग राता । ॥ जय पार्वती माता ॥ शुम्भ निशुम्भ विदारे हेमाचल स्थाता, सहस्त्र भुज तनु धारिके चक्र लियो हाथा । ॥ जय पार्वती माता ॥ सृष्टिरूप तुही है जननी शिवसंग रंगराता, नन्दी भृंगी बीन लही है हाथन मदमाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ देवन अरज करत तव चित को लाता, गावत दे दे ताली मन में रंग राता । ॥ जय पार्वती माता ॥ श्री कमल आरती मैया की जो कोई गाता , सदा सुखी नित रहता सुख सम्पति पाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ माँ पार्वती की आरती । Aarti Maa Parvati
कार्य सिद्धि करने का मन्त्र व विधि|
कार्य सिद्धि करने का मन्त्र व विधि इस प्रकार है| ॐ रक्तकोमलधारिणी महामृत वासिनी जटो भवन्तु कत्थ्यै कथ शीघ्रं शुडुं कुरु नमः|| कार्य सिद्धि करने का मन्त्र की विधि इस प्रकार है| इस मन्त्र का एक हजार जप नवरात्रि में किया जाये फिर पंचमेवा और गुग्गल से हवन करके नौ कुँवारी कन्याओं को भोजन करायें| इससे सब कार्य का शुभाशुभ फल प्रत्यक्ष ज्ञात होता है|
शुक्रवार व्रत (जय माँ संतोषी)|
इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ मे गुड व भुने चने रखें| विधि: इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ मे गुड व भुने चने रखें| संतोषी माता की जय !संतोषी माता की जय! मुख से बोलते जायें| कथा ख़तम होते ही हाथ का गुड चना गों माता को खिलाये| कलश मे रखा गुड चना सबको प्रशाद रूप मे बाँट दे| कथा से पहला कलश को जल से भर दे| उसके ऊपर गुड चने से भरा कटोरा रखें| कथा और आरती ख़तम होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगह छिडकें और बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में डाले| व्रत के उद्यापन में अडाये सेर खाजा, मोमनदार पुड़ी, खीर,चने का शाक, नैवेध रखें| घी का दीपक जला संतोषी माता की जय जयकारा बोल नारिअल फोड़े| इस दिन ना कोई खटाई खाए ना ही खाने दे| इस दिन ८ लड़को को भोजन कराये,पहल घर के लड़कों को दें| यथाशक्ति दक्षिणा भी दें| शुक्रवार संतोषीमाता की व्रतकथा: एक बुढ़िया थी और उसके सात पुत्र थे। छः कमाने वाले थे, एक निकम्मा था। बुढ़िया मां छहों पुत्रों की रसोई बनाती, भोजन कराती और पीछे से जो कुछ बचता सो सातवें को दे देती थी। परन्तु वह बड़ा भोला-भाला था, मन में कुछ विचार न करता था। एक दिन अपनी बहू से बोला – देखो, मेरी माता का मुझ पर कितना प्यार है। वह बोली – क्यों नही, सबका जूठा बचा हुआ तुमको खिलाती है। वह बोला – भला ऐसा भई कहीं हो सकता है, मैं जब तक आँखों से न देखूं, मान नहीं सकता। बहू ने हँसकर कहा – तुम देख लोगे तब तो मानोगे। कुछ दिन बाद बड़ा त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड़डू बने। वह जांचने को सिर-दर्द का बहाना कर पतला कपड़ा सिर पर ओढ़कर रसोई घर में सो गया और कपड़े में से सब देखता रहा। छहो भाई भोजन करने आय। उसने देखा माँ ने उनके लिये सुन्दर-सुन्दर आसन बिछाये है। सात प्रकार की रसोई परोसी है। वह आग्रह करके जिमाती है, वह देखता रहा। छहो भाई भोजन कर उठे तब माता ने उनकी जूठी थालियों में से लड़डुओं के टुकड़ों को उठाया और एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर बुढ़िया माँ ने पुकारा – उठो बेटा, छहों भाई भोजन कर गये अब तू ही बाकी है, उठ न, कब खायेगा। वह कहने लगा – माँ, मुझे भोजन नहीं करना। मैं परदेश जा रहा हूँ। माता ने कहा – कल जाता हो तो आज ही जा। वह बोला – हां-हां, आज ही जा रहा हूँ। यह कहकर वह घर से निकल गया। चलते समय बहू की याद आई। वह गोशाला में उपलें थाप रही थी, वहीं जाकर उससे बोला – हम जावें परदेश को आवेंगे कुछ काल । तुम रहियो संतोष से धरम आपनो पाल ।। वह बोली जाओ पिया आनन्द से हमरुं सोच हटाय । राम भरोसे हम रहें ईश्वर तुम्हें सहाय ।। देख निशानी आपकी देख धरुँ मैं धीर । सुधि हमारी मति बिसारियो रखियो मन गंभीर ।। वह बोला – मेरे पास तो कुछ नहीं, यह अंगूठी है सो ले और अपनी कुछ निशानी मुझे दे। वह बोली – मेरे पास क्या है यह गोबर से भरा हाथ है। यह कहकर उसकी पीठ में गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया। चलते-चलते दूर देश में पहुँचा। वहाँ पर एक साहूकार की दुकान थी, वहां जाकर कहने लगा – भाई मुझे नौकरी पर रख लो। साहूकार को जरुरत थी, बोला – रह जा। लड़के ने पूछा – तनखा क्या दोगे। साहूकार ने कहा – काम देखकर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली। वह सवेरे सात बजे से रात तक नौकरी बजाने लगा। कुछ दिनों में दुकान का सारा लेने-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना, सारा काम करने लगा। साहूकार ने 7-8 नौकर थे। वे सब चक्कर खाने लगे कि यह तो बहुत होशियार बन गया है। सेठ ने भी काम देखा और 3 महीने में उसे आधे मुनाफे का साझीदार बना लिया। वह 12 वर्ष में ही नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उस पर छो़ड़कर बाहर चला गया। अब बहू पर क्या बीती सो सुनो । सास-ससुर उसे दुःख देने लगे। सारी गृहस्थी का काम करके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर की रोटियों के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल के खोपरे में पानी। इस तरह दिन बीतते रहे। एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी कि रास्ते में बहुत-सी स्त्रियाँ संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दीं। वह वहाँ खड़ी हो कथा सुनकर बोली – बहिनों, यह तुम किस देवता का व्रत करती हो और इसके करने सेक्या फल ममिलता है। इस व्रत के करने की क्या विधि है। यदि तुम अपने व्रत का विधान मुझे समझाकर कहोगी तो मैं तुम्हारा अहसान मानूंगी। तब उनमें से एक स्त्री बोली – सुनो यह संतोषी माता का व्रत है, इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है और लक्ष्मी आती है। मन की चिंतायें दूर होती है। घर में सुख होने से मन को प्रसन्नता और शांति मिलती है। निःपुत्र को पुत्र मिलता है, प्रीतम बाहर गया हो तो जल्दी आवे। क्वांरी कन्या को मनपसन्द वर मिले । राजद्घार में बहुत दिनों से मुकदमा चलता हो तो खत्म हो जावे, सब तरह सुख-शान्ति हो, घर में धन जमा हो, पैसा-जायदाद का लाभ हो, वे सब इस संतोषी माता की कृपा से पूरी हो जावे। इसमें संदेह नहीं। वह पूछने लगी- यह व्रत कैसे किया जावे यह भी बताओ तो बड़ी कृपा होगी। स्त्री कहने लगी – सब रुपये का गुड़ चना लेना, इच्छा हो तो सवा पाँच रुपये का लेना या सवा ग्यारह रुपये का भी सहूलियत अनुसार लेना। बिना परेशानी, श्रद्घा, और प्रेम से जितना बन सके सवाया लेना। सवा रुपये से सवा पांच रुपये तथा इससे भी ज्यादा शक्ति और भक्ति के अनुसार लें। हर शुक्रवार को निराहार रह, कथा कहना – सुनना, इसके बीच क्रम टूटे नहीं, लगातार नियम पालन करना। सुनने वाला कोई न मिले तो घी का दीपक जला, उसके आगे जल के
आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए?
पूजा के अन्त में आरती की जाती है| पूजन में जो त्रुटि रह जाती है, आरती से उसकी पूर्ति होती है| पूजन मन्त्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी आरती कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है| आरती करने का ही नहीं, आरती देखने का भी बड़ा पुण्य होता है| जो धूप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह समस्त पीदियों का उद्धार करता है और भगवान् विष्णु के परमपत को प्राप्त होता है| आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए? इस प्रकार है: साधारणत: पाँच बत्तीयों से आरती की जाती है, इसे ‘ पंचप्रदिप’ भी कहते है| एक सात या उससे भी अधिक बत्तीयों से भी आरती की जाती है| कपूर से भी आरती होती है| कुमकुम, अगर, कपूर धुत और चन्दन, पाँच बत्तीयों अथवा दीए की ( रुई और घी की ) बत्तियाँ बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुआ आरती करनी चाहिए| आरती उतारते समय सवर्प्रथम भगवान् की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाएँ, दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंगों पर घुमाएँ| यथार्थ में आरती, पूजन के अन्त में इष्ट देवता की प्रसन्नता हेतु की जाती है| इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है|
इतनी शक्ति हमें देना दाता|
इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हर तरफ़ ज़ुल्म है, बेबसी है सहमा सहमा-सा हर आदमी है पाप का बोझ बढता ही जाये जाने कैसे ये धरती थमी है बोझ ममता का तू ये उठा ले तेरी रचना का ये अँत हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. दूर अज्ञान के हों अँधेरे तू हमें ज्ञान की रौशनी दे हर बुराई से बचते रहें हम जितनी भी दे भली ज़िन्दग़ी दे बैर हो न, किसी का किसी से भवना मन में बदले की हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हम न सोचें हमें क्या मिला है हम ये सोचें किया क्या है अर्पण फूल खुशियों के बाँटें सभी को सबका जीवन ही बन जाये मधुबन अपनी करुणा का जल तू बहाकर करदे पावन हरेक मनका कोना हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हम अँधेरे मे हैं रौशनी दे खो न दें खुद को ही दुश्मनी से हम सज़ा पायें अपने किये की मौत भी हो तो सह लें खुशी से कल जो गुज़रा है फिर से न गुज़रे आनेवाला वो कल ऐसा हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न…
मां सरस्वती चालीसा|
हिंदू धर्म में माता सरस्वती को ज्ञान की देवी कहा गया है। सरस्वती जी को वाग्देवी के नाम से भी जाना जाता है। सरस्वती जी को श्वेत वर्ण अत्यधिक प्रिय होता है। श्वेत वर्ण सादगी का परिचायक होता है। हिन्दू धर्म के अनुसार श्री कृष्ण जी ने सर्वप्रथम सरस्वती जी की आराधना की थी। सरस्वती जी की पूजा साधना में निम्न चालीसा का विशेष महत्त्व है। || चौपाई || जय श्रीसकल बुद्घि बलरासी । जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ॥ जय जय जय वीणाकर धारी । करती सदा सुहंस सवारी ॥ रुप चतुर्भुज धारी माता । सकल विश्व अन्दर विख्याता ॥ जग में पाप बुद्घि जब होती । तबहि धर्म की फीकी ज्योति ॥ तबहि मातु का निज अवतारा । पाप हीन करती महितारा ॥ बाल्मीकि जी थे हत्यारा । तव प्रसाद जानै संसारा ॥ रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि पदवी को पाई ॥ कालिदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥ तुलसी सूर आदि विद्घाना । और भये जो ज्ञानी नाना ॥ तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अमबा ॥ करहु कृपा सोई मातु भवानी । दुखित दीन निज दासहिं जानी ॥ पुत्र करइ अपराध बहूता । तेहि न धरइ चित एकउ माता ॥ राखु लाज जननी अब मेरी । विनय करउं भांति बहुतेरी ॥ मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदम्बा ॥ मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्घ विष्णु से ठाना ॥ समर हजार पांच में घोरा । फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा ॥ मातु सहाय कीन्ह तेहि काला । बुद्घि विपरीत भई खलहाला ॥ तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ॥ चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता ॥ रक्तबीज से समरथ पापी । सुर मुन हृदय धरा सब कांपी ॥ काटेउ सिर जिम कदली खम्बा । बार बार बिनवउं जगदंबा ॥ जगप्रसिद्घ जो शुंभ निशुंभा । क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा ॥ भरत-मातु बुद्घि फेरेउ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई ॥ एहि विधि रावन वध तू कीन्हा । सुन नर मुनि सबको सुख दीन्हा ॥ को समरथ तव यश गुन गाना । निगम अनादि अनंत बखाना ॥ विष्णु रुद्र जस सकैं न मारी । जिनकी हो तुम रक्षाकारी ॥ रक्त दन्तिका और शताक्षी । नाम अपार है दानवभक्षी ॥ दुर्गम काज धरा पर कीन्हा । दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥ दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥ नृप कोपित को मारन चाहै । कानन में घेरे मृग नाहै ॥ सागर मध्य पोत के भंगे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे ॥ भूत प्रेत बाधा या दुःख में । हो दरिद्र अथवा संकट में ॥ नाम जपे मंगल सब होई । संशय इसमें करइ न कोई ॥ पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई ॥ करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ॥ धूपादिक नैवेघ चढ़ावै । संकट रहित अवश्य हो जावै ॥ भक्ति मातु की करै हमेशा । निकट न आवै ताहि कलेशा ॥ बंदी पाठ करै सत बारा । बंदी पाश दूर हो सारा ॥ रामसागर बांधि हेतु भवानी । कीजै कृपा दास निज जानी ॥ ॥ दोहा ॥ मातु सूर्य कान्त तव, अन्धकार मम रुप । डूबन से रक्षा करहु परुं न मैं भव कूप ॥ बलबुद्घि विघा देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु । रामसागर अधम को आश्रय तू दे दातु ॥
श्री साईं जी की प्रार्थना|
साईं कृपा से व्रत कथा लिखवाई, भक्तों के हाथों में पहुंची| साईं गुरुवार व्रत करे जो कोई, उसका कल्याण तो हरदम होई| घर बार सुख शांति होवे, साईं ध्यान करे जो सोवे| भोग लगावे निसदिन बाबा को जोई उसके घर में कमी न होई| बाबा की प्रार्थना करिए, साईं मेरे दुःख को हरिए| शिरडी में बाबा की मूर्ति है प्यारी, भक्तों को लगे है न्यारी| मेरे साईं मेरे बाबा, मेरा मन्दिर मेरा काबा| राम भी तुम शाम भी तुम हो, शिवजी का अवतार भी तुम हो| हनुमान तुम ही हो साईं, तुम्ही ने थी लंका जलाई| कलियुग में तुम आए थे साईं, भक्तों का कल्याण हो जाई| भक्तिभाव से पड़े कथा जो, उसकी इच्छा पूरी हो जाती| बाबा मेरे आओ साईं हमको दर्शन दिखलाओ साईं| तुम बिन दिल नहीं लगता, आंसू का दरिया है निकलता| जब-जब देखें तेरी मूरत, तब-तब भीग जाए मेरी मूरत| अंधन को आंखे देते, दीन दुखी के दुख हर लेते| तुम सा नहीं है कोई सहाई, जपते रहें हम साईं साईं| नाम तुम्हारा मंगलकारी, भवसागर से भक्तों को तारी| बाबा मेरे अवगुण माफ कर देना, भक्ति मेरी को ही लेना| बाबा हम पर दया करना, अपने चरणों में ही रखना| चरणों में तुम्हारे शीतल छाया, बचे रहेंगे नहीं पड़ेगी मंद छाया| हमारी बुद्धि निर्मल करना, जग की भलाई हमसे करना| हमको साधन बना लो बाबा, दया कृपा क्षमा दो बाबा| अज्ञानी हम बालक मंदबुद्धि, तेरी दया से हो मन की शुद्धि| पाप ना कोई हमसे होने पाए, दुःख कोई जीव ना पाए| हरपल भला हम करते आए, गुणगान हरपल तेरे गांए| ||दोहा|| साईं हम पर कृपा करो, बालक हैं अनजान| मंदबुद्धि हम जीव हैं, हमको लो आन संभाल||१|| व्रत आपका कर रहे, दो आशीष यह आन| विध्न पड़े न इसमें कोई, कृपा करो दीनदयाल||२||
शिव भक्त मार्कंडेय|
एक बार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मृकंडु मुनि ने कठोर तपस्या की| उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए| मृकंडु ने उनसे विनती की – “हे प्रभु! मुझे पुत्र प्रदान करें|” शिव ने पूछा – “कैसा पुत्र चाहिए भक्त? ऐसा कि जिसकी आयु तो लंबी हो किंतु गुण कोई न हो, अथवा जो बुद्धिमान हो, गुणी हो किंतु जिसकी आयु मात्र सोलह वर्ष की हो|” मुनि ने कहा – “भगवान! मुझे गुणवान पुत्र चाहिए|” शिव ने कहा – “तथास्तु!” यह वरदान देकर शिव अंतर्धान हो गए| समय आने पर मृकंडु की पत्नी मरुद्वती ने पुत्र को जन्म दिया| अनेक ऋषि-मुनियों ने आकर प्रसन्नता जताई और बच्चे को आशीर्वाद दिया| ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में ही मृकंडु दंपति ने बालक का नाम रखा – मार्कंडेय| बालक मार्कंडेय बहुत मेधावी निकला| सोलह वर्ष की आयु से पहले ही उसने वैदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया| उसके आचार्यगण उसकी प्रशंसा करते न थकते| वे कहते-“मृकंडु! बहुत भाग्यशाली हो तुम, जो ऐसा होनहार बेटा मिला|” लेकिन मार्कंडेय के भाग्य को लेकर उसकी माता बहुत चिंतित रहती| मृकंडु जब उसे समझाते तो वह रोते हुए कहती – “स्वामी! मैं भूल नहीं पाती कि शीघ्र ही हमारा बेटा हमसे हमेशा के लिए दूर हो जाएगा|” एक दिन की बात है| कुमार मार्कंडेय पूजा के लिए फूल लेने वाटिका में गया हुआ था| लौटा तो उसने अपनी माता को रोते हुए देखा| समीप ही उदास भाव में उनके पिता बैठे हुए थे| माता को रोते हुए देख उसने पूछा – “मां! तुम रो क्यों रही हो?” मां कुछ न बोली, बस धीरे-धीरे सिसकियां भरती रही| इस पर मार्कंडेय ने पुन: पूछा – “मां! तुम बोलतीं क्यों नहीं| बोलो मां, बोलो| कौन-सा दुख है तुम्हें? कहीं ऐसा तो नहीं कि जो तुम चाहती हो, वह मैं नहीं कर पाऊंगा? पर देखो मां! अब मैं बालक नहीं रहा| कल पूरे सोलह वर्ष का हो जाऊंगा|” “तुम्हारी मां इसीलिए तो रो रही है, पुत्र!” पिता धीरे से बोले| मार्कंडेय ने उलझन भरे स्वर में पूछा – “क्यों? सोलह वर्ष का होने में क्या हानि है?” पिता बोले – “बताता हूं, सुनो|” तब मृकंडु ने उसके जन्म से संबंधित बातें उसे बताईं| सुनकर मार्कंडेय ने माता को धैर्य बंधाया, बोला – “रोओ मत मां! मैं नहीं मरूंगा| भगवान शिव मृत्युंजय हैं| मैं उनसे अमरत्व का वरदान प्राप्त करूंगा|” पिता ने आशीर्वाद देते हुए कहा – “मेरे बच्चे, शिव की कृपा से तुम्हें सफलता मिले|” मार्कंडेय माता-पिता से आशीर्वाद लेकर वन में चला गया| जाते समय माता ने शिव से प्रार्थना की – “हे सदाशिव, मृत्युंजय! मेरा पुत्र आपके आसरे है| हे देव! इसकी रक्षा करना|” अगले दिन प्रात:काल मार्कंडेय ने सागर तट पर जाकर गीली मिट्टी से शिवलिंग बनाया| उस पर पुष्प चढ़ाए और शिव का ध्यान लगाकर बैठ गया| रात होने पर वह प्रभु के सामने नाचने और गाने लगा| तभी अचानक यमराज वहां आ पहुंचे| बोले – “तुम्हारी आयु पूरी हुई| इस संसार से चलने के लिए तैयार हो जाओ|” मार्कंडेय बोले – “थोड़ी देर ठहरिए महाराज! जब तक मैं अपनी उपासना पूरी कर लेता हूं|” यमराज ने गुस्से से कहा – “मूर्ख! क्या तू जानता नहीं कि मृत्यु किसी का इंतजार नहीं करती| मार्कंडेय ने कहा – “कृपा कर मेरी उपासना में बाधा मत डालिए| मेरी उपासना पूरी होते ही आप मुझे अपने लोक ले चलना|” यमराज और भी क्रोधित होकर बोले – “मूर्ख! क्या तू समझता है कि शिव की शरण लेकर तू मुझसे बच जाएगा? तुझे अभी मालूम हो जाएगा कि काल के पाश से कोई नहीं बच सकता| यह कहकर जैसे ही यमराज पाश फेंकने को उद्यत हुए, तभी एक चमत्कार हुआ| एकाएक वहां शिव प्रकट हो गए| मृत्यु के स्वामी को देखकर यमराज ठिठक गए| मार्कंडेय शिव के चरणों में गिर गया| शिव ने उसके मन की इच्छा ताड़ ली और अमरत्व प्रदान कर दिया| आगे चलकर मार्कंडेय को प्रलय काल में स्वयं हरि ने दर्शन दिए और अपना मुख खोलकर उन्हें समूचे ब्रह्मांड के दर्शन कराए| कहा जाता है कि वे आज भी विद्यमान हैं और तीर्थों में आते-जाते रहते हैं नए-नए रूपों में|
गुरु पूर्णिमा के उत्सव के बारे में आने वाले भक्तों के लिए जरूरी सूचना
*जय माता दी जय माता दी जय माता दी* राजेश्वरी धाम मां देवी राज रानी वैष्णो मंदिर में गुरु पूर्णिमा के उत्सव के बारे में आने वाले भक्तों के लिए जरूरी सूचना | आप सब भक्तों को जानकर बहुत खुशी होगी कि हर साल की तरह इस साल भी गुरु पर्व मनाया जाएगा | इस शुभ अवसर पर दोपहर 12:00 से रात तक लंगर की सेवा चलती रहेगी जो भगत इस भंडारे में योगदान देना चाहते हैं वह हमारे मंदिर के मां के परम भक्त रामकृष्ण नानू जी को व दिए गए Code को स्कैन करके दे सकते हैं और दिए हुए दान की रसीद प्राप्त कर सकते हैं *मंदिर के लंगर इंचार्ज पवन नागपाल जी और रामकृष्ण नानू जी* *प्रधान : श्री कैलाश बब्बर व समूह सदस्य* संपर्क- 98142-53652, 98886-51501 राजेश्वरी धाम वैष्णो मंदिर देवी राजरानी जी बस्ती शेखर रोड जालंधर सभी भक्तों को सूचित किया जाता है कि मां देवी राज रानी जी के मंदिर में अष्टमी की चौकी 26.6.2023 सोमवार को रात 8:00 बजे शुरू होगी | जिसमें शहर की प्रसिद्ध भजन मंडलीया दीपू एंड पार्टी, पंकज ठाकुर एंड पार्टी मां के सुंदर भजनों का गुणगान करेंगे और लंगर रात 8:00 बजे आरंभ हो जाएगा | सभी भक्तों समय पर आकर मां जी का आशीर्वाद और प्रसाद ग्रहण करें *निवेदन करता : प्रधान श्री कैलाश बब्बर व समूह सदस्य*
श्री साईं जी के व्रत के लाभ|
श्री साईं बाबा व्रत के फलस्वरूप निम्नलिखित लाभ व फल प्राप्त हो सकते है: 1. पुत्र की प्राप्ति, 2. कार्य सिद्धि, 3. वर प्राप्ति, 4. वधु प्राप्ति, 5. खोया धन मिले, 6. जमीन जायदात मिले, 7. धन मिले, 8. साईं दर्शन, 9. मन की शान्ति, 10. शत्रु शांत होना, 11. व्यापार में वृद्धि, 12. बांझ को भी बच्चे की प्राप्ति हो, 13. इच्छित वास्तु की प्राप्ति, 14. पति का खोया प्रेम मिले, 15. परीक्षा में सफलता, 16. यात्रा का योग, 17. रोग निवारण, 18. कार्य सिद्धि, 19. सर्व मनोकामना पूर्ती, इत्यादि|