हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व होता है। इस दिन पूजा करने पर भगवान विष्णु की कृपा मिलती है। पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी पर मान्यतानुसार भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। कहतें हैं ऐसा करने पर जीवन से पाप ही नहीं दूर होते बल्कि माता लक्ष्मी की कृपा से घर में सुख-समृद्धि का निवास भी होता है। वहीं, एकादशी का व्रत रखने पर माना जाता है कि भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। * कब है उत्पन्ना एकादशी: इस साल पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह की एकादशी तिथि 8 दिसंबर, शुक्रवार सुबह 5 बजकर 6 मिनट पर शुरू होगी और 9 दिसंबर, शनिवार सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। उदया तिथि को ध्यान में रखते हुए उत्पन्ना एकादशी का व्रत 8 दिसंबर के दिन ही रखा जाएगा। इसी बीच पूजा की जाती है। * कैसे करें एकादशी की पूजा: एकादशी के दिन सुबह उठकर स्नान पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं। इसके पश्चात भक्त उत्पन्ना एकादशी के व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजा में भगवान विष्णु के समक्ष फल, फूल, तुलसी, दूध, दही, शहद, घी और चीनी आदि अर्पित किए जाते हैं। तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना जाता है इसीलिए एकादशी की पूजा और प्रसाद में तुलसी का उपयोग बेहद शुभ मानते हैं। धूप और दीप जलाए जाते हैं। एकादशी की असल पूजा शाम के समय होती है। भगवान विष्णु की आरती की जाती है, विष्णु सहस्त्रनाम और श्री हरि स्तोत्रम का पाठ होता है और भगवान विष्णु का आशीर्वाद मांगा जाता है। एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि पर किया जाता है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए कब रखा जाएगा उत्पन्ना एकादशी का व्रत, पूजा की विधि के बारे में – Know when the fast of utpanna ekadashi will be observed, about the method of worship
जानिए किस घर में कदम नहीं रखती हैं देवी लक्ष्मी, ऐसे लोगों को धन की देवी नापसंद करती हैं। Know in which house goddess lakshmi does not step, the goddess of wealth dislikes such people
हिंदू धर्म के शास्त्रों और पुराणों में मां लक्ष्मी को धन और वैभव की देवी कहा गया है। मान्यता है कि जिस घर पर मां लक्ष्मी की कृपा होती है वहां कभी भी धन-धान्य और वैभव की कमी नहीं होती। दीपावली के दिन भी लोग मां लक्ष्मी को अपने घर पर आमंत्रित करने के लिए घर को सजाते हैं और मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। लेकिन, कुछ घरों में मां लक्ष्मी पूजा-पाठ के बावजूद नहीं जाती हैं। दरअसल बुरी आदतों वाले कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मां लक्ष्मी को बिलकुल नहीं भाते और ऐसे घरों में मां लक्ष्मी कदम नहीं रखतीं। ऐसे घरों में हमेशा नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता का निवास रहता है। चलिए जानते हैं कि मां लक्ष्मी कैसे घरों और कैसी आदतों से नाराज हो जाती हैं। * इन लोगों से नाराज हो जाती हैं मां लक्ष्मी: – शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी का दिन माना जाता है। कहा जाता है कि जो लोग शुक्रवार के दिन उधार देते और लेते हैं, ऐसे लोग मां लक्ष्मी को बिलकुल पसंद नहीं आते। ऐसे घरों में मां लक्ष्मी कभी निवास नहीं करतीं। – जिन घरों में महिलाओं का सम्मान और इज्जत नहीं होती, मां लक्ष्मी अपनी कृपा ऐसे घरों में कभी नहीं बरसातीं। ऐसे घरों में हमेशा कलह, धन की कमी और नेगेटिविटी बनी रहती है। शास्त्रों में यूं भी महिलाओं को देवी का दर्जा दिया गया है और महिलाओं का अपमान करने पर शुक्र ग्रह भी कमजोर होता है। इसलिए घर में महिलाओं का सदा सम्मान करना चाहिए। – घर में उत्तर दिशा को मां लक्ष्मी की दिशा माना जाता है। इसे ही ईशान कोण कहा जाता है जिसे साफ रखना चाहिए। जिस घर में उत्तर दिशा में कूड़ा, गंदगी और बेकार का सामान भरा रहता है, मां लक्ष्मी ऐसे घरों में कभी नहीं जाती हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए किस घर में कदम नहीं रखती हैं देवी लक्ष्मी, ऐसे लोगों को धन की देवी नापसंद करती हैं। Know in which house goddess lakshmi does not step, the goddess of wealth dislikes such people
एलिय्याह को स्वर्ग तक ले जाने की कहानी – The story of elijah being taken to heaven
एलिय्याह को स्वर्ग में ले जाए जाने की कहानी बाइबिल में, विशेषकर पुराने नियम में एक महत्वपूर्ण घटना है। यह राजाओं की दूसरी पुस्तक में पाया जाता है, विशेष रूप से 2 राजाओं 2:1-18 में। यह घटना पैगंबर एलिय्याह के सांसारिक मंत्रालय के समापन और इस दुनिया से उनके नाटकीय प्रस्थान का प्रतीक है। एलिजा प्राचीन इज़राइल में उस समय ईश्वर का भविष्यवक्ता था जब राष्ट्र इज़राइल के उत्तरी राज्य और यहूदा के दक्षिणी राज्य में विभाजित था। एलीशा, उनके शिष्य और उत्तराधिकारी, को भविष्यवाणी मंत्रालय जारी रखने के लिए चुना गया था। कहानी एलिजा द्वारा एलीशा को यह घोषणा करने से शुरू होती है कि उसे प्रभु द्वारा स्वर्ग में ले जाने का समय आ गया है। वह जानता था कि उसका प्रस्थान आसन्न था, और वह एलीशा को परिवर्तन के लिए तैयार करना चाहता था। एलिजा और एलीशा गिलगाल से जॉर्डन नदी तक की यात्रा पर निकले। रास्ते में, एलिय्याह ने एलीशा के अनुरोध को स्वीकार करने की पेशकश करके उसके समर्पण का परीक्षण किया। एलीशा का अनुरोध एलिय्याह की आत्मा का दोगुना हिस्सा प्राप्त करने के लिए था, जो कि उसके गुरु की भविष्यसूचक विरासत को प्राप्त करने की उसकी इच्छा को दर्शाता था। जब वे यरदन नदी के तट पर पहुँचे, तो एलिय्याह ने अपना लबादा उतार दिया और पानी पर प्रहार किया, जिससे वे सूखी भूमि पर पार हो सके। जब वे चल रहे थे और बातें कर रहे थे, अचानक, अग्नि का रथ और अग्नि के घोड़े प्रकट हुए, जिन्होंने दोनों व्यक्तियों को अलग कर दिया। एलिजा को बवंडर में स्वर्ग में ले जाया गया, एलीशा ने असाधारण घटना देखी। एलिय्याह के प्रस्थान को देखने के बाद, एलीशा ने शोक के संकेत के रूप में अपने कपड़े फाड़ दिए, लेकिन एलिय्याह का लबादा भी उठाया, जो आकाश से गिर गया था। यह आवरण एलीशा को भविष्यवाणी के अधिकार और शक्ति के हस्तांतरण का प्रतीक था। इसके बाद एलीशा जॉर्डन नदी पर लौट आया और पानी पर हमला करने के लिए एलिजा के लबादे का इस्तेमाल किया, जैसा कि एलिजा ने पहले किया था। नदी एक बार फिर चमत्कारिक रूप से अलग हो गई, जिससे पुष्टि हुई कि एलीशा को वास्तव में अपने गुरु का आध्यात्मिक अधिकार विरासत में मिला था। एलीशा इसराइल में एक प्रमुख भविष्यवक्ता बन गया, उसने कई चमत्कार किए और एलिय्याह द्वारा शुरू किए गए भविष्यवाणी कार्य को आगे बढ़ाया। एलिय्याह को स्वर्ग तक ले जाए जाने की कहानी बाइबिल की कथा में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक भविष्यवाणी के अधिकार के संक्रमण पर प्रकाश डालती है। यह विश्वास की शक्ति और इज़राइल के आध्यात्मिक जीवन में पैगंबरों की भूमिका को भी रेखांकित करता है। आग के रथ पर एलिय्याह के प्रस्थान ने धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में एक स्थायी प्रभाव छोड़ा है, और उन्हें अक्सर विभिन्न धर्मों में बहुत महत्व का व्यक्ति माना जाता है। एलिय्याह को स्वर्ग तक ले जाने की कहानी – The story of elijah being taken to heaven
छठ पूजा के लिए आवश्यक नियम: व्रत के लाभ के लिए इन नियमों का पालन महत्वपूर्ण है। Essential rules for chhath puja: It is important to follow these rules for the benefits of fasting
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी तिथि से शुरू होकर चार दिन तक चलने वाला महापर्व छठ 17 नवंबर से शुरू होगा। महापर्व छठ में भगवान सूर्य और छठ माता के रूप में प्रकृति की पूजा होती है। इस व्रत को करने वाले 36 घंटे का निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। संतान, परिवार की सुख समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना लेकर किए जाने वाले इस व्रत में नियमों का ध्यान रखना जरूरी होता है। * साफ सफाई पर जोर: छठ में साफ सफाई का ध्यान रखना जरूरी है। छठ के लिए उपयोग में लाए जाने वाले सभी तरह के अनाज और फलों की अच्छे से सफाई करनी चाहिए। ठेकुआ बनाने के लिए गेहूं को घर में अच्छे से धोकर सुखाने के बाद पिसवाया जाता है। इस दौरान उन्हें चिड़ियों के झूठा करने से बचाना जरूरी होता है। प्रसाद बनाने के लिए रखे गए अनाज में भूलकर भी पैर नहीं लगाना चाहिए। * पवित्र चूल्हे का उपयोग: छठ का प्रसाद तैयार करने के लिए पवित्र चूल्हे का उपयोग किया जाता है। इसके लिए विशेष तौर पर मिट्टी के चूल्हे तैयार किए जाते हैं। अगर गैस स्टोव पर प्रसाद बनाया जाता है तो पूजा पाठ के लिए विशेष स्टोव का इस्तेमाल करना चाहिए। * प्राकृतिक चीजों का उपयोग: प्रसाद व पूजा सामग्री रखने के लिए प्राकृतिक व पवित्र धातुओं का उपयोग किया जाता है, छठ में बांस से तैयार सूप और टोकरी का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही प्रसाद बनाने के लिए विशेष तौर पर पीतल के बर्तनों का उपयोग किया जाता है। प्रसाद शुद्ध घी में बनाया जाता है। * प्रसाद बनाते समय पवित्रता का ध्यान: छठ का प्रसाद तैयार करते समय पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। प्रसाद तैयार करने का काम नहाने के बाद ही किया जाता है। दस दौरान हाथ या मुंह जूठा नहीं करना चाहिए और न ही ज्यादा बोलना चाहिए। छठ पूजा के लिए आवश्यक नियम: व्रत के लाभ के लिए इन नियमों का पालन महत्वपूर्ण है। Essential rules for chhath puja: It is important to follow these rules for the benefits of fasting
जन्मे है कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई – Janme hai krishn kanhaee, gokul mein dekho baaje badhai
बधाई हो बधाई.. जन्मे है कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई। बाजे बधाई, देखो बाजे बधाई, बाजे बधाई, देखो बाजे बधाई। जन्मे हैं कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई॥ हे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा। यमुना भी धन्य हुई, छूके चरण को। लेके वासुदेव चले, प्यारे ललन को॥ वो दिए कान्हा को ब्रज पहुंचाए। गोकुल में देखो बाजे बधाई॥ जन्मे हैं कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई॥ हे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा। धन्य हुई ये ब्रजभूमि सारी, त्रिलोकी नाथ जन्मे कृष्ण मुरारी। ओ सारी नगरी है आज हरषाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई॥ जन्मे हैं कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई॥ हे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा। अन्न धन लुटावे बाबा, पायल और छल्ला। लड्डूवा बटें और पेड़ा, बर्फी रसगुल्ला॥ देखो, मैया तो फूली ना समाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई। जन्मे हैं कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई॥ दाऊ लुटावे सोना, चांदी और जेवर। छाया आनंद आज, खुशियां है घर घर॥ वो देख देख हसते है कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई। जन्मे हैं कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई॥ जन्मे है कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई। बाजे बधाई देखो बाजे बधाई, बाजे बधाई देखो बाजे बधाई। जन्मे हैं कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई॥ जन्मे है कृष्ण कन्हाई, गोकुल में देखो बाजे बधाई – Janme hai krishn kanhaee, gokul mein dekho baaje badhai
कर बंदे तू बंदगी – Kar bande tu bandgi
कर बंदे तू बंदगी जिचर घट मेह सहो कर बंदे तू बंदगी जिचर घट मेह सहो कुदरत कीम न जानिये, वड्डा वे-परवाहो वड्डा वेपरवाहो, वड्डा वेपरवहो कर बंदे तू बंदगी जिचर घट मेह सहो मेहरवान साहब मेहरवान साहब मेरा मिहरवां जीआ सगल कौ देई दान कर बंदे तू बंदगी जिचर घाट मेह सहो.. तू कहे दोलेह प्रणिया तू काहे डोले प्राणिया तुध राखेगा सिरजन-हर जिन पैदैइस तू किआ जिन पैदायिश तू किया सोई देई आधार कर बंदे तू बंदगी जिचर घाट मेह सहो.. जिन उपायि मेदनी जिन उपायि मेदनी सोई करदा सार, सोई करदा सार घाट घाट मालिक दिला का घट-घट मालिक दिला का सच्चा पर्व सच्चा पर्वद्गार.. कर बंदे तू बंदगी जिचर घाट मेह सहो.. कुदरत कीम न जानिये कुदरत कीम न जानिये वड्डा वेपरवाहो वड्डा वेपरवाहो कर बंदे तू बंदगी जिचर घाट मेह सहो.. तू समरथ अकथ अगोचर तू समरथ अकथ अगोचर, जियो पिंड तेरी रास जियो पिंड तेरी रास रहम तेरी सुख पाया रहम तेरी सुख पाया, सदा नानक की अरदास सदा नानक की अरदास कर बंदे तू बंदगी जिचर घाट मेह सहो.. कर बंदे तू बंदगी – Kar bande tu bandgi
जानिए देव उठनी एकादशी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत के नियम के बारे में – Know about the date, auspicious time, worship method and fasting rules of dev uthani ekadashi
सनातन पंचांग के अनुसार, हर माह के दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी का व्रत रखा जाता है। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव उठनी एकादशी कहते हैं और इसका सनातन धर्म में बहुत अधिक महत्व है। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को भगवान विष्णु चार माह के विश्राम के बाद जागते हैं इसलिए इसे देव उठनी एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का खास विधान होता है। आइए जानते हैं देव उठनी एकादशी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत के नियम। * देवउठनी एकादशी की तिथि: इस वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि 22 नवंबर को रात 11 बजकर 30 मिनट से शुरू होकर 23 नवंबर को रात 9 बजकर 3 मिनट तक रहेगी। देवउठनी एकादशी का व्रत 23 नवंबर, गुरुवार को रखा जाएगा। व्रत के पारण का समय 24 नवंबर को सुबह 6 बजे से सुबह 8 बजकर 13 मिनट तक है। * देवउठनी एकादशी की पूजा: देवउठनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर घर की सफाई और स्नान के बाद पूजा की चौकी पर भगवान विष्णु की तस्वीर स्थापित करें। भगवान को चंदन, हल्दी और कुमकुम से तिलक लगाएं। घी का दिया जलाकर भोग लगाएं. भोग में तुलसी के पत्ते (Tulsi Leaves) जरूर डालें। व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। इस दिन तुलसी जी की पूजा करनी चाहिए। * देवउठनी एकादशी का व्रत के नियम: भगवान विष्णु को समर्पित देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। पूजा के लिए एक दिन पहले ही पत्ते तोड़ लें। देवउठनी एकादशी के दिन चावल नहीं खाया जाता है। वाद-विवाद से बचना चाहिए और भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। जरूरतमंद लोगों को केला, केसर या हल्दी का दान करना बहुत शुभ होता है। इस दिन फल जैसे आम, केला, अंगूर सूखे मेवे जैसे बादाम, पिस्ता का सेवन करना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए देव उठनी एकादशी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत के नियम के बारे में – Know about the date, auspicious time, worship method and fasting rules of dev uthani ekadashi
यीशु द्वारा शिष्यों के पैर धोने की कहानी – Story of jesus washes the disciples feet
यीशु द्वारा शिष्यों के पैर धोने की कहानी बाइबिल के नए नियम का एक प्रसिद्ध प्रकरण है, जो विशेष रूप से जॉन के सुसमाचार में जॉन 13:1-17 में पाया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण घटना है जो यीशु की विनम्रता और सेवक नेतृत्व को दर्शाती है। कहानी अंतिम भोज के दौरान घटित होती है, एक भोजन जिसे यीशु ने क्रूस पर चढ़ने से पहले की रात अपने शिष्यों के साथ साझा किया था। भोजन के दौरान, यीशु, अपने आसन्न विश्वासघात, गिरफ्तारी और सूली पर चढ़ने के बारे में पूरी तरह से जानते हुए, कुछ अप्रत्याशित किया। उसने अपना बाहरी वस्त्र उतार दिया, अपनी कमर के चारों ओर एक तौलिया बाँधा, और एक बेसिन में पानी डाला। फिर यीशु ने एक-एक करके अपने शिष्यों के पैर धोना शुरू किया। यह कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि उस समय की संस्कृति में, पैर धोना नौकरों के लिए आरक्षित एक छोटा कार्य था और इसे बड़ी विनम्रता का संकेत माना जाता था। जब यीशु अपने पैर धोने के लिए शमौन पतरस के पास आया, तो पतरस अचम्भित हो गया और पहले तो उसने यह कहकर इन्कार कर दिया, “तू मेरे पांव कभी न धोएगा।” पतरस को शायद लगा होगा कि यीशु, उनके प्रभु और शिक्षक, के लिए ऐसा कार्य करना अनुचित था। पतरस के प्रतिरोध के जवाब में, यीशु ने अपने कार्यों का प्रतीकात्मक अर्थ समझाया। उसने पतरस से कहा कि जब तक वह अपने पैर नहीं धोएगा, पतरस का उसके साथ कोई संबंध नहीं होगा। तब पतरस ने यीशु से न केवल उसके पैर, बल्कि हाथ और सिर भी धोने को कहा। यीशु ने समझाया कि जो लोग पहले ही नहा चुके हैं उन्हें केवल अपने पैर धोने की ज़रूरत है, जो इस बात का प्रतीक है कि वे साफ़ हैं, लेकिन सभी नहीं। वह आध्यात्मिक सफाई और पापों की क्षमा की आवश्यकता की ओर इशारा कर रहा था, उसके साथ सही रिश्ते में रहने के महत्व पर जोर दे रहा था। शिष्यों के पैर धोने के बाद, यीशु ने उनसे पूछा कि क्या वे समझ गए हैं कि उसने क्या किया है। उसने उन्हें बताया कि उसने, उनके प्रभु और शिक्षक ने, उनके अनुसरण के लिए एक उदाहरण स्थापित किया है, और उसने उन्हें विनम्रतापूर्वक एक-दूसरे की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित किया। यीशु ने यह कहकर अपनी बात समाप्त की, “मैं तुम से सच कहता हूं, कोई दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं, और न कोई दूत अपने भेजनेवाले से बड़ा है। अब जब कि तू ये बातें जानता है, तो यदि तू इन्हें करेगा, तो तू धन्य होगा।” यीशु द्वारा शिष्यों के पैर धोने की कहानी ईसाई धर्म के भीतर विनम्रता, दासत्व और पारस्परिक सेवा के महत्व पर एक शक्तिशाली सबक के रूप में कार्य करती है। यह यीशु के अपने अनुयायियों से विनम्र सेवा के उदाहरण का अनुसरण करते हुए एक-दूसरे से निस्वार्थ भाव से प्रेम करने और सेवा करने के आह्वान को रेखांकित करता है। यीशु द्वारा शिष्यों के पैर धोने की कहानी – Story of jesus washes the disciples feet
श्री रामायण जी की आरती – shri ramayan ji ki aarti
आरती श्री रामायण जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ॥ गावत ब्रहमादिक मुनि नारद । बाल्मीकि बिग्यान बिसारद ॥ शुक सनकादिक शेष अरु शारद । बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥ ॥ आरती श्री रामायण जी की..॥ गावत बेद पुरान अष्टदस । छओं शास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥ मुनि जन धन संतान को सरबस । सार अंश सम्मत सब ही की ॥ ॥ आरती श्री रामायण जी की..॥ गावत संतत शंभु भवानी । अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ॥ ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी । कागभुशुंडि गरुड़ के ही की ॥ ॥ आरती श्री रामायण जी की..॥ कलिमल हरनि बिषय रस फीकी । सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ॥ दलनि रोग भव मूरि अमी की । तात मातु सब बिधि तुलसी की ॥ आरती श्री रामायण जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ॥ श्री रामायण जी की आरती – shri ramayan ji ki aarti
जानिए अन्नपूर्णा जयंती कब है, इसका महत्व और पूजा विधि के बारे में – Know when is annapurna jayanti, its importance and worship method
अन्नपूर्णा जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। अन्नपूर्णा माता पार्वती का रूप है। इस दिन मुख्य रूप से अन्न की पूजा की जाती है। इस दिन देवी पार्वती की पूजा करने से घर में धन धान्य औऱ सुख समृद्धि आती है। इससे मां अन्नपूर्णा की कृपा दृष्टि बनी रहती है। इस दिन घर में चावल और कुछ मीठी चीज बनानी चाहिए। साथ ही दीपक को प्रज्वलित करना चाहिए। इससे घर में कभी खाने की कमी नहीं होती है। * अन्नपूर्णा जयंती कब है- अन्नपूर्णा जयंती 26 दिसंबर 2023 को मनाया जाएगा। * अन्नपूर्णा पूजन विधि: – इस जयंती के दिन आप सुबह उठकर स्नान करें फिर रसोई को साफ करें। इसके बाद पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें। फिर आप रसोई घर की पूर्व दिशा में लाल वस्त्र बिछाएं अब इसके ऊपर नव धान्य की ढेरी बनाकर उस पर मां अन्नपूर्णा देवी का चित्र स्थापित करिए। – ताम्र कलश में अशोक के पत्ते और नारियल रखिए। अब जिस चूल्हे या स्टोव पर खाना बनाती हैं उसकी पूजा करिए। फिर आप गाय के घी का दीपक जलाकर पूरे घर को सुगंधित धूप करें। – मां अन्नपूर्णा को रोली से टीका लगाएं फिर उन्हें लाल फूल अर्पित करिए। अब गैस चूल्हे को भी रोली लगाकर अक्षत और फूल चढ़ाकर पूजा करिए। इसके बाद आप मां अन्नपूर्णा देवी को धनिया की पंजीरी का भोग चढ़ाइए। – अन्नपूर्णा देवी का मंत्र – ओम ह्रींग अन्नपूर्णाय नमः, इस मंत्र का जाप आप 108 बार करें। फिर आप मन्त्र जाप करने के बाद मां अन्नपूर्णा का ध्यान करके उनसे प्रार्थना करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए अन्नपूर्णा जयंती कब है, इसका महत्व और पूजा विधि के बारे में – Know when is annapurna jayanti, its importance and worship method