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गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा

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गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा :- एक समय की बात है राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता, लेकिन वे कच्चे रह जाते थे। एक पुजारी की सलाह पर उसने इस समस्या को दूर करने के लिए एक छोटे बालक को मिट्टी के बर्तनों के साथ आंवा में डाल दिया। उस दिन संकष्टी चतुर्थी का दिन था। उस बच्चे की मां अपने बेटे के लिए परेशान थी। उसने गणेशजी से बेटे की कुशलता की प्रार्थना की। दूसरे दिन जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा तो आंवा में उसके बर्तन तो पक गए थे, लेकिन बच्चे का बाल बांका भी नहीं हुआ था। वह डर गया और राजा के दरबार में जाकर सारी घटना बताई। इसके बाद राजा ने उस बच्चे और उसकी मां को बुलवाया तो मां ने सभी तरह के विघ्न को दूर करने वाली संकष्टी चतुर्थी का वर्णन किया। इस घटना के बाद से महिलाएं संतान और परिवार के सौभाग्य के लिए संकट चौथ का व्रत करने लगीं।   यह भी पड़े : गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा

November 3, 2022 / 0 Comments
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आईमा सदस्यों ने लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजन तथा हवन यज्ञ कर मनाया भगवान धन्वंतरि दिवस

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आईमा सदस्यों ने लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजन तथा हवन यज्ञ कर मनाया भगवान धन्वंतरि दिवस जालंधर : आल इंडिया नेशनल इंटीग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन (आईमा) द्वारा प्रधान जसजीत सिंह भोलावासिया की अध्यक्षता में भगवान धन्वंतरि दिवस पर लक्ष्मी नारायण मंदिर मॉडल हाउस जालंधर में भगवान धनवंतरी जी के पूजन का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम आईमा सदस्यों द्वारा भगवान धन्वंतरि जी का पूजन किया गया तत्पश्चात हवन यज्ञ किया गया। इस अवसर पर डॉ भोलावासिया ने कहा कि भगवान धन्वंतरि जी की बदौलत ही आज लोग बिमारियों से मुक्ति पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज जितनी भी दवाईयां मार्केट में उपलब्ध है वह सब भगवान धन्वंतरि जी की ही देन है। जिसमें डॉ पीसी चौहान, डॉ जसजीत सिंह भोलावासिया, डॉ रामेश कंबोज, डॉ जोगिंदर अरोड़ा, डॉ नरेश शर्मा, डॉ खन्ना, डॉ जसपाल कालड़ा, डॉ एच एस कालाडा, डॉ सविता कश्यप, डॉ राजवीर, डॉ दमन, डॉ सुशील अग्रवाल, डॉ पंकज डोगरा, डॉक्टर राजीव कालड़ा, डॉ सुरेंद्र शर्मा एवं आईमा के अन्य सदस्य उपस्थित हुए।

October 28, 2022 / 0 Comments
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तुलसी की पूजा करते समय कर लें ये 1छोटा सा काम, आपके ऊपर होगी मां लक्ष्मी मेहरबान

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तुलसी की पूजा करते समय कर लें ये 1छोटा सा काम, आपके ऊपर होगी मां लक्ष्मी मेहरबान हमारे देश में मां तुलसी को काफी पवित्र माना जाता है और हिंदुओं के घरों में रोजाना तुलसी के पौधे को जल दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि तुलसी के पौधे को जल देने से मां लक्ष्मी की अपार कृपा होती है और सुख सुविधा और संपत्ति घर में भरी रहती है। Tulsi Puja रविवार और एकादशी के दिन तुलसी में जल नहीं चढ़ाना चाहिए।तुलसी की नियमित पूजा करने से जीवन में चल रही परेशानियां दूर हो सकती हैं। देश में लगभग सभी घरों के आंगन में तुलसी का पौधा होता है। शास्त्रों के अनुसार मा तुलसी की पूजा करने से घर में धन-संपत्ति की वर्षा होती है और सुख सम्मान मिलता है। इतना ही कई देवी-देवताओं की पूजा अर्चना में भोग चढ़ाने के लिए तुलसी के पत्‍ते इस्तेमाल होते हैं। खासतौर पर इसके बिना श्री विष्णु जी की पूजा पूरी नहीं होती है। इसलिए आपको रोजाना तुलसी जी की पूजा जरूर करनी चाहिए। हालांकि तुलसी जी की पूजा के दौरान आपको कुछ चीजें जरूर करनी चाहिए। आइए जानते हैं। हालांकि तुलसी की पूजन के दौरान कुछ ऐसी चीज है जो नहीं करनी चाहिए तो आइए जानते हैं कौन है वह चीजें – Tulsi Puja तुलसी पूजा के वक्त जरूर करें ये छोटा सा काम नियमित रूप से सुबह तुलसी के पौधे की पूजा करने के बाद उसमें जल चढ़ाना चाहिए। रोजाना शाम को संध्‍यावंदन करने के बाद तुलसी के पौधे के नीचे दीपक जलाना चाहिए। ऐसा करने से घर में लक्ष्मी जी का वास होता है। हालांकि रविवार और एकादशी के दिन तुलसी में भूलकर भी जल नहीं चढ़ाना चाहिए और ना ही इस दिन इसकी पत्तियां तोड़नी चाहिए। अगर आपको इस दिन तुलसी की पत्तियों की जरूरत पड़े तो ऐसे में एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें। मान्यताओं के अनुसार, तुलसी की नियमित पूजा करने से जीवन में चल रही परेशानियां दूर हो सकती हैं। तुलसी जी की आरती जय जय तुलसी माता, मैय्या जय तुलसी माता . सब जग की सुख दाता, सबकी वर माता.. मैय्या जय तुलसी माता.. सब योगों से ऊपर, सब रोगों से ऊपर. रज से रक्ष करके, सबकी भव त्राता. मैय्या जय तुलसी माता.. बटु पुत्री है श्यामा, सूर बल्ली है ग्राम्या. विष्णुप्रिय जो नर तुमको सेवे, सो नर तर जाता. मैय्या जय तुलसी माता.. हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वंदित. पतित जनों की तारिणी, तुम हो विख्याता. मैय्या जय तुलसी माता.. लेकर जन्म विजन में, आई दिव्य भवन में. मानव लोक तुम्हीं से, सुख-संपति पाता. मैय्या जय तुलसी माता.. हरि को तुम अति प्यारी, श्याम वर्ण सुकुमारी. प्रेम अजब है उनका, तुमसे कैसा नाता. हमारी विपद हरो तुम, कृपा करो माता. मैय्या जय तुलसी माता..

October 23, 2022 / 0 Comments
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माँ देवी राज रानी जी का जन्म उत्सव एवम् मूर्ति स्थापना दिवस 2 अक्टूबर 2022 को

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श्री राजेश्वरी धाम माता राजरानी मंदिर बस्ती नौ जालंधर बड़े ही हर्ष के साथ सूचित किया जाता है कि माँ देवी राज रानी जी का जन्म उत्सव एवम् मूर्ति स्थापना दिवस 2 अक्टूबर 2022 को बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाएगा जिसमें रात्रि जागरण का कार्यक्रम भी किया जाएगा गायक कुमार लवली एंड पार्टी ऊना हिमाचल प्रदेश एवं महंत पंकज ठाकुर एंड पार्टी को जागरण में भजन कीर्तन के लिए आमंत्रित किया गया है , बड़ा ही शुभ अवसर है कि इस बार माता का जन्म उत्सव , मूर्ति स्थापना एवम् मासिक अष्टमी एक साथ मनाया जाएगा एवं लंगर भंडारे की व्यवस्था भी की गई है, 2 अक्टूबर 2022 को जागरण कीर्तन में आकर स्वयं एवम् परिवार जनों के जीवन को धन्य एवम् कृतार्थ करें, आप सभी भक्त जनों की उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है।। विशेष सूचना:- माँ देवी राज रानी जी का प्रथम नवरात्र दिनांक 26/09/2022 को मंदिर में दर्शन एवम् आशीर्वाद प्राप्त करें , नवरात्रि में नौ दिन कीर्तन उसके बाद रात्रि 10:00बजे आरती हुआ करेगी।। जय माता दी🙏 निवेदक :- प्रधान कैलाश बब्बर एवम् समस्त कमेटी सदस्य 98142- 53652,, 98886-51501

September 19, 2022 / 0 Comments
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मां देवी राज रानी जी का जन्म उत्सव एवं मूर्ति स्थापना दिवस 2 अक्टूबर 2022 सभी भक्तों को सादर आमंत्रण

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जय माता दी!  जय माता दी! श्री राजेश्वरी धाम, देवी राजरानी मंदिर, बस्ती शेख रोड, जालंधर  मां देवी राजरानी जी का जन्म उत्सव एवं मूर्ति स्थापना दिवस 2 अक्टूबर 2022 सभी भक्तों को सादर आमंत्रण है मां देवी राजरानी जी का जन्मदिन मूर्ति स्थापना दिवस में शामिल होकर मां का आशीर्वाद प्राप्त करें माँ का गुणगान करने पहुँच रही पार्टिया पंकज ठाकुर एंड पार्टी व् कुमार लव्ली एंड पार्टी ऊना (हिमाचल प्रदेश), झाकिया : वरुण शर्मा राजेश्वरी धाम देवी राजरानी मंदिर, बस्ती शेख रोड, जालंधर प्रधान- कैलाश बब्बर (98142-53652, 98886-51501) Facebook Page : – https://www.facebook.com/devirajrani

September 14, 2022 / 0 Comments
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गणेश चतुर्थी व्रत की पहली कथा

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गणेश चतुर्थी की पौराणिक एवं प्रचलित कथा : व्रत में सुनने से दूर होंगे सारे संकट, मिलेगा अपार सुख श्री गणेशाय नम:’ संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत करने से घर-परिवार में आ रही विपदा दूर होती है, कई दिनों से रुके मांगलिक कार्य संपन्न होते है तथा भगवान श्री गणेश असीम सुखों की प्राप्ति कराते हैं। माह की किसी भी चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणेश की पूजा के दौरान संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत की कथा पढ़ना अथवा सुनना जरूरी होता है। इससे संबंधित चार कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा :- पौराणिक एवं प्रचलित श्री गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेश जी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए, परंतु गणेश जी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिव जी ने श्री गणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा। यह भी पड़े : गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा तब गणेश ने कहा – ‘माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।’ यह सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। इस व्रत को करने से व्रतधारी के सभी तरह के दुख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। चारों तरफ से मनुष्य की सुख-समृद्धि बढ़ेगी। पुत्र-पौत्रादि, धन-ऐश्वर्य की कमी नहीं रहेगी।      

August 31, 2022 / 0 Comments
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गरुड़ पुराण तीसरा अध्याय

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गरुड़ पुराण तीसरा अध्याय | Garud Puran Adhyay 3 सूतजी बोले, हे शौनक! गरुड़ पुराण को भगवान विष्णु ने ब्रह्मा और शिव को सुनाया था। ब्रह्मा ने मुनिश्रेष्ठ व्यास को सुनाया था और व्यास जी ने मुझे सुनाया था। में आप लोगो को वही सुना रहा हु। इस पुराण में भगवान विष्णु की लीलाओं को विस्तार पूर्वक कहा गया है। भगवान विष्णु के सर्ग वर्णन, देवार्चन, तीर्थमहात्म्य, भुवनवृत्तान्त, मन्वंतर, वर्ण धर्म, आश्रम धर्म, दानधर्म, राजधर्म, व्यवहार व्रत, वंशानुचरित, आयुर्वेद, प्रलय, धर्म, काम ,अर्थ, और उत्तम ज्ञान का वर्णन इस पुराण में किया गया है। श्री गरुड़ जी भगवान विष्णु का वरदान पाकर इस गरुड़ पुराण के उपदेष्ठा रूप में सभी प्रकार से अति सामर्थ्यवान बन गए और भगवान विष्णु के ही वाहन बने, तथा इस संसार की स्थिति और प्रलय के कारण भी हो गए। गरुड़ जी ने अपनी माता को दानवों से जीतकर मुक्त करवाया था, तथा अमृत भी प्राप्त किया था। संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान विष्णु के उदर में विद्यमान है। श्री गरुड़ जी ने उनकी क्षुधा को भी शांत किया था। 16 घोर नरक गरुड़ पुराण के अनुसार – Narak Garud Puran यह गरुड़ पुराण को गरुड़ जी ने कश्यप ऋषि को सुनाया था। तब कश्यप ऋषि ने इस गरुड़ मंत्र के प्रभाव से जले हुए वृक्ष को भी जीवित कर दिया था। श्री हरिरूप गरुड़ जी के दर्शन मात्र से ही सर्पों का विनाश हो जाता है। हे शौनक ! में व्यास जी को प्रणाम करके इस अत्यंत पवित्र पुराण को सुनाता हु ,जिसका पवित्र पाठ करने से भी सब कुछ प्राप्त हो जाता है। कृपा करके आप सब इसे ध्यान से सुने।  

August 28, 2022 / 0 Comments
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गरुड़ पुराण दूसरा अध्याय

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गरुड़ पुराण दूसरा अध्याय – Garud Puran Adhyay 2 मृत्यु के बाद मरणासन्न व्यक्ति के कल्याण के लिए किए जाने वाले कर्म श्री कृष्ण ने गरुड़ जी से पुत्र की महिमा बताते हुए कहा था, अगर मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है, तो उसका पुत्र उसका नरक से उद्धार कर सकता है। उसके पुत्र और पौत्र को उसे कंधा देना चाहिए और उसको विधि पूर्वक अग्निदाह देना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले भूमि को गोबर से लिपना चाहिए। फिर उस स्थान पर तिल और कुश बिछाकर उस व्यक्तिंको कुशासन पर सुलाना चाहिए और उसके मुख में पंच रत्न डालने चाहिए। यह सब विधिपूर्वक करने से व्यक्ति अपने सारे पापो को जलाकर पापमुक्त हो जाता है। भूमि पर मंडल बनाने से इस मंडल में ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र,अग्नि, सारे देवता विराजमान हो जाते है। इसलिए यह मंडल का निर्माण करने का बहुत महत्व माना गया है। अगर भूमि पर मंडल का निर्माण नहीं किया हो और उस पर व्यक्ति प्राण त्याग कर देता है, तो उसे दूसरी योनि प्राप्त नहीं होती। उसकी आत्मा हवा के साथ भटकती रहती है। भगवान बोले, तिल और कुश की महत्ता बहुत है। तिल को बहुत पवित्र माना गया है, क्युकी तिल की उत्पत्ति मेरे पसीने से हुई है। तिल के प्रयोग से असुर, दानव और दैत्य को भगा सकते है।   पौराणिक कथा श्री कृष्ण ने गरुड़ जी से पुत्र की महिमा बताते हुए कहा था, अगर मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है, तो उसका पुत्र उसका नरक से उद्धार कर सकता है। उसके पुत्र और पौत्र को उसे कंधा देना चाहिए और उसको विधि पूर्वक अग्निदाह देना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले भूमि को गोबर से लिपना चाहिए। फिर उस स्थान पर तिल और कुश बिछाकर उस व्यक्तिंको कुशासन पर सुलाना चाहिए और उसके मुख में पंच रत्न डालने चाहिए। यह सब विधिपूर्वक करने से व्यक्ति अपने सारे पापो को जलाकर पापमुक्त हो जाता है। भूमि पर मंडल बनाने से इस मंडल में ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र,अग्नि, सारे देवता विराजमान हो जाते है। इसलिए यह मंडल का निर्माण करने का बहुत महत्व माना गया है। अगर भूमि पर मंडल का निर्माण नहीं किया हो और उस पर व्यक्ति प्राण त्याग कर देता है, तो उसे दूसरी योनि प्राप्त नहीं होती। उसकी आत्मा हवा के साथ भटकती रहती है। भगवान बोले, तिल और कुश की महत्ता बहुत है। तिल को बहुत पवित्र माना गया है, क्युकी तिल की उत्पत्ति मेरे पसीने से हुई है। तिल के प्रयोग से असुर, दानव और दैत्य को भगा सकते है। एक तिल का दान करने से स्वर्ण के बत्तीस सेर तिल के दान के बराबर माना जाता है। तिल का दान तर्पण, दान और होम में दिया जाता है, जो अक्षय होता है। कुश की उत्त्पति मेरे शरीर के रोमो से हुई है। कुश के मूल में ब्रह्मा, विष्णु और शिव है। यह तीनों देव कुश में प्रतिष्ठित है। कुश की आवश्यकता देवताओं की तृप्ति के लिए है, और तिल की आवश्यकता पितृओ की तृप्ति के लिए है। श्राद्ध की विधि के अनुसार ही मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु और पितृजनो को संतृप्त कर सकता है। ब्राह्मण, मंत्र, कुश, अग्नि तथा तुलसी का बार-बार उपयोग करने से भी वह बासी नही होते। संसार में लोगो के मुक्ति प्रदान करने के साधनों में विष्णु एकादशी व्रत, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गौ का समावेश होता है। मृत्यु काल के समय मरण पामे हुए व्यक्ति के दोनो हाथो में कुश को रखा जाता है। जिसे व्यक्ति को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। पितृ को लवणरस अतिप्रिय होता है, और इसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसीलिए भगवान विष्णु से शरीर से उत्पन्न हुए लवणरस का भी दान करना चाहिए। किसी व्यक्ति के लिए स्वर्ग के द्वार खोलने के लिए लवण का दान करने का बहुत महत्व है। उसके पास तुलसी का वृक्ष और शालग्राम की शीला को भी लाकर रखना चाहिए। उसके बाद विधिपूर्वक सूत्रों का पाठ करने से मनुष्य की मृत्यु मुक्तिदायक होती है। तत्पश्चात मरे हुए व्यक्ति के शरीर के विभिन्न स्थानों में सोने की शालाकाओ को रचने की विधि की जाती है। जिसमे एक शलाका मुख, एक-एक शलाका नाक के दोनो छिद्रों, दो-दो शलाकाए नेत्र और कान और एक शलाका लिंग तथा एक शलाका उसके ब्रह्मांड में रखनी चाहिए। व्यक्ति के दोनो हाथ और कंठ के भाग में तुलसी को रखा जाता है। उसके बाद व्यक्ति के शव को दो वस्त्रों से अच्छादित करके कुमकुम और अक्षत से पूजन करे। उसके बाद उसपे पुष्पों की माला चढ़ाई जाती है। तदनतर उसे बंधु बांधवों और पुत्र के साथ अन्य द्वार से ले जाए। पुत्र को अपने बंधावोंके साथ मिलकर मरे हुए पिता के शव को कंधे पर रख स्वयं ले जाना चाहिए। शव को शमशान ले जाकर पहले से ना जली हुई भूमि पर पूर्वाभिमुख या उत्तरा भिमुख चिता का निर्माण कराए। चिता बनाने में चंदन, तुलसी तथा पलाश और लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए। शव को लेजाते समय राम नाम सत्य है क्यों बोला जाता है? जब शव की इंद्रियों का समूह व्याकुल हो और शरीर उसका जड़ीभूत हो, तब शरीर से प्राण निकलकर यमराज के दूतो के साथ जाने लगते है। दुरात्मा प्राणी को यमदूत अपने पाशबंधो से जकड़कर मरते है। सुकृति मनुष्य को स्वर्ग के मार्ग में सुख पूर्वक ले जाते है। पापी लोगो को यमलोक के मार्ग में दुख जेलकर जाना पड़ता है। यमराज अपने लोक में चतुर्भुज रूप धारण करके शंख, चक्र, और गदा से साधुपुरुष का आचरण करते हैं। और पापियों के साथ दुर्व्यवहार करते हे, और उन्हे दंड देते है। यमराज प्रलय कालीन मेघ के समय गर्जना करने वाले है। वह बहुत बड़े भैंस पर सवार होते है। उनका स्वरूप अत्यंत भयंकर है, और स्वभाव से महाक्रोधी है। 16 घोर नरक गरुड़ पुराण के अनुसार – Narak Garud Puran यमराज का रूप भीमकाय है, और वह अपने हाथो में लोहे का दंड और पाश धारण करते है। पापी लोग उनके मुख तथा नेत्रों को देखने से ही डर जाते है। प्राणों से मुक्त चेष्टा हीन शरीर को देखने से मन में घृणा उत्पन्न होती है। वह तुरंत ही अस्पृश्य तथा दुर्गंधयुक्त होकर सभी प्रकार से निंदित हो जाता है। शरीर अंत में

August 27, 2022 / 0 Comments
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गरुड़ पुराण पहला अध्याय

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गरुड़ पुराण पहला अध्याय प्राचीन समय की बात है, कि नैमिषारण्य क्षेत्र में शोनक आदि ऋषियों ने अनेक महर्षियो के साथ 7000 वर्ष पर्यंत चलने वाले यज्ञ को प्रारंभ किया था, जिससे उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सके। उस क्षेत्र में सूत जी पधारे तब ऋषियों ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। क्योंकि सूत जी पौराणिक कथा कहने में सिद्धहस्त थे, और उन्होंने विभिन्न रूपों से अनुभव प्राप्त किया हुआ था। इसीलिए सारे ऋषियों ने उनसे कहा, आप हमे इस संसार, भगवान, यमलोक, तथा, दूसरे शुभ, अशुभ कर्मो के बारे में बताए, जिससे मनुष्य किस रूप को प्राप्त होता है ,इसका ज्ञान हमे देने की कृपया करे। सूतजी ने कहा, इस संसार जगत के निर्माता भगवान विष्णु है। वो जल में रहते हे, इसीलिए उनका नाम नारायण है। वह लक्ष्मी जी के पति है। भगवान विष्णु ने हर युग में भिन्न-भिन्न अवतार धारण करके पृथ्वी पर जन्म लिया है, ताकि वह अधर्म का नाश कर सके और पृथ्वी की रक्षा कर सके। भगवान विष्णु ने राम का अवतार लिया और लंका के राजा रावण का वध करके अधर्म को खत्म किया। उन्होंने नरसिंह रूप में राजा हिरण्यकश्यप का वध करके भक्त प्रहलाद एवं दूसरे प्रजा की रक्षा की। भगवान विष्णु ने वराहरूप में भी अवतार लिया ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सके और फिर मत्स्य रूप में अवतार लिया। वेदव्यास जी भगवान विष्णु के ही अंश है। वेदव्यास जी ने यह पुराणों की रचना की है। कहा जाता है की एक सर्वोत्तम वृक्ष भगवान विष्णु है, उसकी दृढ़, मूल धर्म है, उसकी शाखाएं वेद है, उस वृक्ष के फूल रूप में यज्ञ को माना गया है और फल के रूप में मोक्ष को माना गया है। वह सर्वोत्तम वृक्ष रूपी भगवान विष्णु ही सारे फल और मोक्ष को देते है। एक समय पर पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा था, आप खुद ही एक भगवान है,इस संसार के रचायता है, तो आप किस का ध्यान करते रहते है। यह सुनकर भगवान शिव ने कहा, में देवो और ऋषियों का ध्यान करता हुं उसमे विष्णु ही श्रेष्ठ है। इस संसार में परम ब्रह्म भगवान नारायण,विष्णु है और उन्ही का चिंतन करता हूं। भगवान विष्णु ही अनेक रूप में अवतार लेने वाले परम ब्रह्म है। भगवान विष्णु ही अनेक रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करते है। इस प्रकार भगवान शिव ने पार्वती जी को भगवान विष्णु की महिमा बताई थी। शिव पुराण पहला अध्याय || शिव पुराण अध्याय 1 तब ऋषियों को दूसरी बाते जानने की उत्सुकता हुई। ऋषियों ने सूतजी से कहा, हे प्रभु! आपने भगवान विष्णु के श्रेष्ठता के बारे में हमे जो भी ज्ञान दिया वह अत्यंत भयमुक्त करने वाला ज्ञान हे। इसके अतिरिक्त आप हमे यह बताइए की इस सृष्टि में आने के बाद भोगने वाले दुख और कष्ट को नाश कैसे किया जाता है? कृपा करके इसका उपाय हमे बताइए। आपके पास इस लोक एवं परलोक के दुखो का निवारण करने का ज्ञान है। हम यह जानना चाहते ही है, की यमराज के मार्ग तक पहुंचने में मनुष्य को किस प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। वचन बद्ध पौराणिक कथा प्राचीन समय की बात है, कि नैमिषारण्य क्षेत्र में शोनक आदि ऋषियों ने अनेक महर्षियो के साथ 7000 वर्ष पर्यंत चलने वाले यज्ञ को प्रारंभ किया था, जिससे उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सके। उस क्षेत्र में सूत जी पधारे तब ऋषियों ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। क्योंकि सूत जी पौराणिक कथा कहने में सिद्धहस्त थे, और उन्होंने विभिन्न रूपों से अनुभव प्राप्त किया हुआ था। इसीलिए सारे ऋषियों ने उनसे कहा, आप हमे इस संसार, भगवान, यमलोक, तथा, दूसरे शुभ, अशुभ कर्मो के बारे में बताए, जिससे मनुष्य किस रूप को प्राप्त होता है ,इसका ज्ञान हमे देने की कृपया करे। सूतजी ने कहा, इस संसार जगत के निर्माता भगवान विष्णु है। वो जल में रहते हे, इसीलिए उनका नाम नारायण है। वह लक्ष्मी जी के पति है। भगवान विष्णु ने हर युग में भिन्न-भिन्न अवतार धारण करके पृथ्वी पर जन्म लिया है, ताकि वह अधर्म का नाश कर सके और पृथ्वी की रक्षा कर सके। भगवान विष्णु ने राम का अवतार लिया और लंका के राजा रावण का वध करके अधर्म को खत्म किया। उन्होंने नरसिंह रूप में राजा हिरण्यकश्यप का वध करके भक्त प्रहलाद एवं दूसरे प्रजा की रक्षा की। भगवान विष्णु ने वराहरूप में भी अवतार लिया ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सके और फिर मत्स्य रूप में अवतार लिया। वेदव्यास जी भगवान विष्णु के ही अंश है। वेदव्यास जी ने यह पुराणों की रचना की है। कहा जाता है की एक सर्वोत्तम वृक्ष भगवान विष्णु है, उसकी दृढ़, मूल धर्म है, उसकी शाखाएं वेद है, उस वृक्ष के फूल रूप में यज्ञ को माना गया है और फल के रूप में मोक्ष को माना गया है। वह सर्वोत्तम वृक्ष रूपी भगवान विष्णु ही सारे फल और मोक्ष को देते है। एक समय पर पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा था, आप खुद ही एक भगवान है,इस संसार के रचायता है, तो आप किस का ध्यान करते रहते है। यह सुनकर भगवान शिव ने कहा, में देवो और ऋषियों का ध्यान करता हुं उसमे विष्णु ही श्रेष्ठ है। इस संसार में परम ब्रह्म भगवान नारायण,विष्णु है और उन्ही का चिंतन करता हूं। भगवान विष्णु ही अनेक रूप में अवतार लेने वाले परम ब्रह्म है। भगवान विष्णु ही अनेक रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करते है। इस प्रकार भगवान शिव ने पार्वती जी को भगवान विष्णु की महिमा बताई थी। तब ऋषियों को दूसरी बाते जानने की उत्सुकता हुई। ऋषियों ने सूतजी से कहा, हे प्रभु! आपने भगवान विष्णु के श्रेष्ठता के बारे में हमे जो भी ज्ञान दिया वह अत्यंत भयमुक्त करने वाला ज्ञान हे। इसके अतिरिक्त आप हमे यह बताइए की इस सृष्टि में आने के बाद भोगने वाले दुख और कष्ट को नाश कैसे किया जाता है? कृपा करके इसका उपाय हमे बताइए। आपके पास इस लोक एवं परलोक के दुखो का निवारण करने का ज्ञान है। हम यह जानना चाहते ही है, की यमराज के मार्ग तक पहुंचने

August 25, 2022 / 0 Comments
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महा शिव पुराण कथा

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महा शिव पुराण कथा शिव पुराण’ का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्रायः सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु ‘शिव पुराण’ में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है। शिवपुराण’ एक प्रमुख तथा सुप्रसिद्ध पुराण है, जिसमें परात्मपर परब्रह्म परमेश्वर के ‘शिव’ (कल्याणकारी) स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा एवं उपासना का सुविस्तृत वर्णन है[6]। भगवान शिवमात्र पौराणिक देवता ही नहीं, अपितु वे पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर हैं एवं निगमागम आदि सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं। वेदों ने इस परमतत्त्व को अव्यक्त, अजन्मा, सबका कारण, विश्वपंच का स्रष्टा, पालक एवं संहारक कहकर उनका गुणगान किया है। श्रुतियों ने सदा शिव को स्वयम्भू, शान्त, प्रपंचातीत, परात्पर, परमतत्त्व, ईश्वरों के भी परम महेश्वर कहकर स्तुति की है। ‘शिव’ का अर्थ ही है- ‘कल्याणस्वरूप’ और ‘कल्याणप्रदाता’। परमब्रह्म के इस कल्याण रूप की उपासना उटच्च कोटि के सिद्धों, आत्मकल्याणकामी साधकों एवं सर्वसाधारण आस्तिक जनों-सभी के लिये परम मंगलमय, परम कल्याणकारी, सर्वसिद्धिदायक और सर्वश्रेयस्कर है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि देव, दनुज, ऋषि, महर्षि, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व ही नहीं, अपितु ब्रह्मा-विष्णु तक इन महादेव की उपासना करते हैं। इस पुराण के अनुसार यह पुराण परम उत्तम शास्त्र है। इसे इस भूतल पर भगवान शिव का वाङ्मय स्वरूप समझना चाहिये और सब प्रकार से इसका सेवन करना चाहिये। इसका पठन और श्रवण सर्वसाधनरूप है। इससे शिव भक्ति पाकर श्रेष्ठतम स्थिति में पहुँचा हुआ मनुष्य शीघ्र ही शिवपद को प्राप्त कर लेता है। इसलिये सम्पूर्ण यत्न करके मनुष्यों ने इस पुराण को पढ़ने की इच्छा की है- अथवा इसके अध्ययन को अभीष्ट साधन माना है। इसी तरह इसका प्रेमपूर्वक श्रवण भी सम्पूर्ण मनोवंछित फलों के देनेवाला है। भगवान शिव के इस पुराण को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है तथा इस जीवन में बड़े-बड़े उत्कृष्ट भोगों का उपभोग करके अन्त में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है। यह शिवपुराण नामक ग्रन्थ चौबीस हजार श्लोकों से युक्त है। सात संहिताओं से युक्त यह दिव्य शिवपुराण परब्रह्म परमात्मा के समान विराजमान है और सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला है। रूद्र संहिता शिव पुराण हिंदू धर्म में अठारह पुराणों में सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला पुराण है। यह हिंदू भगवान शिव और उनकी पत्नी देवी पार्वती के चारों ओर केंद्रित है। भगवान शिव हिंदू धर्म में सबसे अधिक पूजे जाने वाले भगवानों में से एक हैं लेखक वेदव्यास देश भारत भाषा हिन्दी श्रृंखला पुराण विषय शिव भक्ति प्रकार हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ पृष्ठ २४,००० श्लोक शिव महापुराण में ७ (सात) ‘संहिता’ (छंदों का संग्रह) शामिल हैं जो भगवान शिव के जीवन के विभिन्न पहलुओं का एक ज्वलंत विवरण प्रदान करते हैं। शिवमहापुराण की दूसरी संहिता रुद्र संहिता है। रुद्र संहिता के पांच खंड यानि भाग है। प्रथम खंड में बीस अध्याय हैं। दूसरे खंड को सती खंड कहा गया है, जिसमें 43 अध्याय हैं। तीसरा खंड पार्वती खंड है, जिसमें 55 अध्याय हैं। चौथा खंड कुमार खंड के नाम से जाना जाता है, जिसमें 20 अध्याय हैं। इस संहिता का पांचवां खंड युद्ध खंड के नाम से जाना जाता है, इसमें कुल 59 अध्याय हैं। [2] इसी संहिता में ‘सृष्टि खण्ड’ के अन्तर्गत जगत् का आदि कारण शिव को माना गया हैं शिव से ही आद्या शक्ति ‘माया’ का आविर्भाव होता हैं फिर शिव से ही ‘ब्रह्मा’ और ‘विष्णु’ की उत्पत्ति बताई गई है।[3] इस पुराण में २४,००० श्लोक है तथा इसके क्रमश: ६ खण्ड है- विद्येश्वर संहिता, रुद्र संहिता, कोटिरुद्र संहिता, उमा संहिता, कैलास संहिता, वायु संहिता। रुद्र संहिता प्रथम भाग (सृष्टि खण्ड) रुद्र संहिता प्रथम भाग(सृष्टि खण्ड) में कुल २० अध्याय हैं। इस खंड में निम्न विषयों पर कथा देखी जा सकती है :- ऋषियों के प्रश्न के उत्तर में नारद-ब्रह्म-संवाद की अवतारणा करते हुए सूतजी का उन्हें नारदमोह का प्रसंग सुनाना; कामविजय के गर्व से युक्त हुए नारद का शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु के पास जाकर अपने तप का प्रभाव बताना मायानिर्मित नगर में शीलनिधि की कन्यापर मोहित हुए नारद जी का भगवान् विष्णु से उनका रूप माँगना, भगवान् का अपने रूप के साथ उन्हें वानर का-सा मुँह देना, कन्या का भगवान् को वरण करना और कुपित हुए नारद का शिवगणों को शाप देना नारदजी का भगवान् विष्णु को क्रोधपूर्वक फटकारना और शाप देना; फिर माया के दूर हो जाने पर पश्चात्तापपूर्वक भगवान् के चरणों में गिरना और शुद्धि का उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णु का उन्हें समझा-बुझाकर शिव का माहात्म्य जानने के लिये ब्रह्माजी के पास जाने का आदेश और शिव के भजन का उपदेश देना नारदजी का शिवतीर्थों में भ्रमण, शिवगणों को शापोद्धार की बात बताना तथा ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्माजी से शिवतत्त्व के विषय में प्रश्न करना महाप्रलयकाल में केवल सद्ब्रह्म की सत्ता का प्रतिपादन, उस निर्गुण-निराकार ब्रह्म से ईश्वरमूर्ति (सदाशिव) का प्राकट्य, सदाशिव द्वारा स्वरूपभूता शक्ति (अम्बिका) का प्रकटीकरण, उन दोनों के द्वारा उत्तम क्षेत्र (काशी या आनन्दवन) का प्रादुर्भाव, शिव के वामांग से परम पुरुष (विष्णु) का आविर्भाव तथा उनके सकाश से प्राकृत तत्त्वों की क्रमश: उत्पत्ति का वर्णन भगवान् विष्णु की नाभि से कमल का प्रादुर्भाव, शिवेच्छावश ब्रह्माजी का उससे प्रकट होना, कमलनाल के उद्गम का पता लगाने में असमर्थ ब्रह्मा का तप करना, श्रीहरि का उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्मा-विष्णु के बीच में अग्नि-स्तम्भ का प्रकट होना तथा उसके ओर-छोर का पता न पाकर उन दोनों का उसे प्रणाम करना ब्रह्मा और विष्णु को भगवान् शिव के शब्दमय शरीर का दर्शन[4] उमा सहित भगवान् शिव का प्राकट्य, उनके द्वारा अपने स्वरूप का विवेचन तथा ब्रह्मा आदि तीनों देवताओं की एकता का प्रतिपादन; श्रीहरि को सृष्टि की रक्षा का भार एवं भोग-मोक्ष-दान का अधिकार दे शिव का अन्तर्धान होना शिवपूजन की विधि तथा उसका फल भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन; शिवपूजन की सर्वोत्तम विधि का वर्णन विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादि की धाराओं से शिवजी की पूजा का माहात्म्य; सृष्टि का वर्णन स्वायम्भुव मनु और

August 12, 2022 / 0 Comments
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