गोबिंद हम ऐसे अप्राधि – Gobind hum aise apradhi

गोबिन्द हम ऐसे अपराधी..
हम ऐसे अपराधी
जिन प्रभ जिओ पिंड था दिया
तिस की भाओ भगत नहीं साधी
गोबिन्द हम ऐसे अपराधी..
हम ऐसे अपराधी

कवन काज सिरजे जग भीतर
जनम कवन फल पाया
भव निध तरन तारन चिंतामन
इक निमख न इह मन लाया
इक निमख न इह मन लाया..
तिस की भाओ भगत नहीं साधी
गोबिन्द हम ऐसे अपराधी..
हम ऐसे अपराधी

जिन प्रभ जिओ पिंड था दिया
तिस की भाओ भगत नहीं साधी
गोबिन्द हम ऐसे अपराधी..
हम ऐसे अपराधी

पर धन पर तन पर ती निंदा
पर अपबाद न छूटै
आवा गवन होत है फुन फुन
इहु परसंग न तूटै
इहु परसंग न तूटै
हम ऐसे अपराधी
गोबिन्द हम ऐसे अपराधी..
हम ऐसे अपराधी

जिह घर कथा होत हर संतन
इक निमख न कीनों मैं फेरा
लॅंपट चोर दूत मतवारे
तिन संग सदा बसेरा
तिन संग सदा बसेरा
हम ऐसे अपराधी
गोबिन्द हम ऐसे अपराधी..
हम ऐसे अपराधी

काम क्रोध माया मद मत्सर
ए संपै मो माही
दया धर्म अर गुर की सेवा
ए सुपनन्तर नाही
ए सुपनन्तर नाही
हम ऐसे अपराधी
गोबिन्द हम ऐसे अपराधी..
हम ऐसे अपराधी

दीन दयाल कृपाल दमोदर
भगत बछल भै हारी
कहत् कबीर भीर जन राखहु
हर सेवा करो तुम्हारी
हम ऐसे अपराधी
गोबिन्द हम ऐसे अपराधी..
हम ऐसे अपराधी

 

गोबिंद हम ऐसे अप्राधि – Gobind hum aise apradhi